गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० गरीबदास जी की बानी
पाँच पचीसो भून कर बिरह अगिन तन जार ।
सो अबिनासी ब्रह्म है खेलै अधर अधार ॥१४॥
त्रिकुटी आगे झूलता बिनहीं बाँस¹ बरंत² ।
अजर अमर आनंद पद परखै सुरत निरंत ॥१५॥
यह महिमा कासे कहूँ नैनों माहीं नूर ।
पल पल में दीदार है सुरत सिंधु भरपूर ॥१६॥
झीना दरसै दास को पुहुप रूप परमान ।
बिन ही बेली गहबरे³ है सो अकल⁴ अमान ॥१७॥
अकल अभूमी⁵ आदि है जा के नाहीं अंत ।
दिलही अंदर देव है निर्मल निर्गुन तंत ॥१८॥
तन मन सेती दूर है माहैं मंझ मिलाप ।
तरवर छाया बिरिछ में है सो आपै आप ॥१६॥
नौ तत के तो पाँच हैं पाँच तत्त के आठ ।
आठ तत्त का एक है गुरू लखाई बाट ॥२०॥
चार पदारथ एक कर सुरत निरत मन पौन ।
असल फकीरी जोग यह गगन मॅडल कूँ गौन ॥२१॥
पंछी घाला आलना⁶ तरवर छाया देख ।
गरभ जून के कारने मन में किया विवेक ॥२२॥
जैसे पंछी बन रमा संझा ले बिसराम ।
प्रात समय उड़ जात है सो कहिये निःकाम ॥२३॥
जा के नाद न बिंदु है घट मठ नहीं मुकाम ।
गरीबदास सेवन करै आदि अनादं राम ॥२४॥
॥ लै का अंग ॥
लै⁷ लागी तब जानिये जग सँ रहै उदास ।
नाम रटै निरभय कला हर दम हीरा स्वाँस ॥ १ ॥
(१) खंभा । (२) रस्सी । (३) घने पेड़ । (४) अकाल । (५) बेठौर । (६) खोता लगाया । (७) लौ ।