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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

४२ गरीबदास जी की बानी
अनंत कोटि ब्रह्मांड का चरबन कर लेई ।
महा काल की दाढ़ में आवे सब कोई ॥१३४॥
काल डरै करतार से कर बंधन जोड़ी ।
संख असंखौ चल गये सिव बिस्नु करोड़ी ॥१३५॥
अकल पुरुष साहब धनी अविगत अविनासी ।
गरीबदास सरना लिया काटो जम फाँसी ॥१३६॥
॥ कुसंगत का अंग ॥
कमल फूल मन भँवर है काँटा कर्म कुसंग ।
पाँच विषय सूँ बँध रहा कैसे लागे रंग ॥१॥
काया सरवर मीन मन दसौ दिसा कूँ जाय ।
विषय लहर दिल देह में भगति न रंच१ सुहाय ॥२॥
कुटिल बासना कमल२ में पावत नहीं मुराद ।
मरजीया३ मन कूँ करै जहँ पथ अगम अगाध ॥३॥
सुरभी४ बँधी चमार के ब्राह्मन बोई भाँग ।
चंदन खर के लेपिये कुंदन बदले राँग ॥४॥
कर्म कटारी बाँध के करै भारथी जंग५ ।
अपने सिर लेवै नहीं प्राछित सौंपै गंग ॥५॥
तरन तारनी बकस दे हमरे प्राछित काट ।
पारब्रह्म सूँ ऊलमै परभी न्हावै घाट ॥६॥
बगुला हंसा एक सर एकै रूप रसाल ।
वह सरवर मोती चुँगै वह मच्छी का काल ॥७॥
सीप पियत है स्वाँति कूँ बिच है खारी नीर ।
माहें मोती नीपजै करनी बंध सरीर ॥८॥
(१) कुछ । (२) हृदय । (३) गोताखोर । (४) गाय । (५) महाभारत
सरीखी लड़ाई ।