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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 186 में से

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पृष्ठ 62

५४ गरीबदास जी की बानी
साँचे साँईं संत जन झूठे हैं सब लोक ।
मेढक मछली तड़फड़ै ज्यों ओछे जल जोंक ॥१३॥
साँचे सदा मसंद१ पर उस चंगे दरबार ।
झूठों के जूती पड़े जम किंकर की मार ॥१४॥
झूठे कपटी जीव सब साँचे संत सुजान ।
तिरबाचा छूटै नहीं झूठों ना कर कान ॥१५॥
साँचों के संग चालिये झूठों संग न जाह ।
रावन मिलता है नहीं बीभीखन की बाँह ॥१६॥
बीभीखन लंका दई रावन कटिहै मूड़ ।
साँचे साधू भँवर हैं झूठे गोबर भूढ़२ ॥१७॥
झूठा कंसा मारिये फिर चानूर चमार ।
रुकमिन कूँ ब्याहन गया सीस कटा सिसुपाल ॥१८॥
बालि सहस्राबाहु से मारे छाती तोर ।
साँचा जन प्रहलाद है झूठी जल गइ होरि३ ॥१६॥
हिरनाकुस के उदर कूँ नख से गेरा फार ।
निरगुन सूँ सरगुन भये धर नरसिंघ औतार ॥२०॥
द्रोपदि चीर बधाइया४ पीतांबर पटनाल ।
दूसासन से पच गये कौरों पड़ा जवाल५ ॥२१॥
दुर्जोधन की मेदनी होगई खंड बिहंड ।
द्रोनाचार्ज भीषम पिता बचे न धर सिर दंड ॥२२॥
गज अरु ग्राह उवारिया पसू जूनि सूँ संत ।
दान मेड़ छाँड़ी नहीं करन तुड़ाये दंत६ ॥२३॥
(१) तकिया मसनद । (२) गुजुवा । (३) होलका जो अग्नि से अमर समझी
जाती थी अपने भतीजे प्रहलाद भक्त को जलाने के लिये गोद में लेके आग में बैठी सो
आप ही जल गई और प्रह्लाद बच गये । (४) बढ़ाया । (५) खराबी । (६) राजा करन
के दान के समय सोना कम हो जाने पर अपना दाँत तोड़ डाला कि उसमें से जड़ा हुआ
सोना निकाल कर दान कर सकें ।