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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

२८ गरीबदास जी की बानी
भगित हेत गृह आइया धरा सरूप हजाम१॥ ६ ॥
पीपा को परचा हुआ मिले भक्त भगवान ।
सीता मग जोवत रही द्वारावती निधान२ ॥ ७ ॥
धना भगत की धुन लगी बीज दिया जिन्ह आन ।
सूखा खेत हरा हुआ कंकर बोये जान३ ॥ ८ ॥
रैदास रँगीला रंग है दिये जनेऊ तोड़ ।
जग्य ज्योनार चोले धरे इक रैदास इक गौड़४ ॥ ९ ॥
(१) किसी राजा के यहाँ सेना नाऊ भक्त हजामत बनाने की नौकरी पर था।
एक दिन हजामत बनाने के लिए जा रहा था कि राह में साधू लोग मिल गये और
वह साधु-सेवा में लग गया, उसके बदले भगवान आप उस राजा की हजामत
बना आये।
(२) पीपा जी मागरौनगढ़ के राजा थे जो अपनी सीता नामक रानी के साथ साधू
हो गये और स्वामी रामानन्द जी से उपदेश लिया । इनकी प्रचण्ड भक्ति और महिमा
का भक्तमाल में बहुत वर्णन लिखा है । जिस कथा का गरीबदास जी की इस साखी में
इशारा है वह इस तरह पर है कि पीपाजी जी और उनकी स्त्री सीता द्वारका को गये और
वहाँ असली दिब्य द्वारका में पहुँच कर (जो समुद्र में डूब गई है) साक्षात् श्रीकृष्ण
का दर्शन पाने के हेतु एक दिन सीता के साथ समुद्र तट पर पहुँचे । यहाँ सीता को खड़ी
कर पीपा जी आप समुद्र में कूद कर गायब हो गये और सात दिन तक दर्शन का रस
और भगवान की प्रसादी छाप अपने शरीर पर लेकर आज्ञानुसार समुद्र से बाहर निकले
जहाँ सीता उनका रास्ता देख रही थी। पीपा जी ने यह छाप मंदिर के पुजारियों को
सौंप कर आज्ञा की कि जो लोग इस छाप को अपने शरीर पर लगावेंगे वह भगवत
पद पावेंगे।
(३) धना भक्त के पिता ने अपने पुत्र को खेत बोने के लिये बीज देकर भेजा। उसी
समय कुछ भूखे साधू आ गये, उन्हें धना ने सब बीज दे दिया और बाप के डर के मारे
खेत में कंकड़ बो दिये (एक जगह ऐसा लिखा है कि साधुओं के तुम्बों के बीज बो दिये)
फिर जाकर पिता को खबर दी कि खेत बो दिया। कुछ दिन पीछे पिता को नौकरों से
असल हाल मालूम हो गया और बड़े क्रोध में खेत पर गये पर वहाँ पहुँच कर क्या देखा
कि अन्न का खेत खूब लहलहा रहा है।
(४) चित्तौड़ की रानी ने जो रैदास जी की चेली थी एक बार काशी में किसी उत्सव
पर गौड़ ब्राह्मणों को न्योता दिया। ब्राह्मणों ने इनकार किया कि वह चमार की चेली
है हम उसके यहाँ भोजन नहीं कर सकते। इस पर रैदास जी ने उन लोगों को समझाया
कि राज धान्य में कुछ दोष नहीं है और हम कुछ उसे छूने न जायँगे फिर कौन सा
झगड़ा है। ब्राह्मण लोग काइल होकर राजी हो गये। जब खाने को बैठे और थोड़ा बहुत
खा चुके तो देखते क्या हैं कि पंगत में हर ब्राह्मण के इधर उधर एक एक रैदास (चमार)
हैं। ब्राह्मणों ने घबरा कर खाने से हाथ खींच लिया उस पर रैदास जी ने समझाया कि

भक्ति का अंग २६
माँझी मरद कबीर है जगत करै उपहास।
केसो बनजारा भया भगत बड़ाई दास१ ॥१०॥
सोहं ऊपर और है सत्त सुकृत इक नाम।
सब हंसों का बंस है सुन वस्ती नहिं गाम ॥११॥
सोहं ऊपर और है सुरत निरत का नाँव।
सोहं अंतर पैठ कर सत्त सुकृत लौ लाव ॥१२॥
सोहं ऊपर और है बिना मूल का फूल।
जा की गंध सुगंध है ता को पलक न भूल ॥१३॥
सोहं ऊपर और है बिन बोली का कंद।
नाम रसायन पीजिये अविचल अति आनंद ॥१४॥
सोहं ऊपर और है कोउ का जाने भेव।
गोप गोसाईं गैब धुन ता की कर ले सेव ॥१५॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत धुन ध्यान।
चार जुगन की बन्दगी एक पलक परमान ॥१६॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस ठौर।
संकर बकसा मिहर कर अमर भई तब गौर ॥१७॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस माहिं।
एक पलक तहँ संचरै कोटि पाप अध जाहिं ॥१८॥
अविगत की अविगत कथा अविगत है सब ख्याल।
अविगत सों अविगत मिलै कर जोरै तब काल ॥१६॥

डरो मत और नाखून से अपने कांधे की चमड़ी चीर कर दिव्य जनेऊ दिखा कर हँसते
हुए वहाँ से चल दिये । इस महिमा को देख कर ब्राह्मणों ने फिर भोजन किया - (देखो
जीवन-चरित्र रैदास जी बानो में) ।
(१) काशी के पंडित जो कबीर साहब से बहुत द्वेष रखते थे उन्होंने एक बार नगर
भर में यह मशहूर कर दिया कि आज कबीर के यहाँ सब भूखों और कंगलों को पाँच
पाँच सेर अन्न बटेगा, यह सुनकर हज़ारों आदमी की भीड़ उनके दरवाजे पर जमा
हुई। कबीर साहब चुपचाप किसी बहाने से बाहर चले गये और उनके पीछे भगवान
बनजारे का रूप धरे बहुत से बैल अन्न से लदे हुए वहाँ छोड़ गये जो कंगलों को उनकी
आशा से अधिक बाँटा गया ।
५

३० गरीबदास जी की बानी
अमर अनूपम आप है और सकल है खंड।
सूच्छम से सूच्छम मही पूरन पद परचंड ॥२०॥
अधम उधारन भगित है अधम उधारन नाँव।
अधम उधारन संत हैं जिनके मैं बल जावँ ॥२१॥
गज गनिका अरु भीलनी सेवरी प्रेम सहेत।
केते पतित उधारिया सतगुरु गावै नेत ॥२२॥
राम रसायन पीजिये यहि औसर यहि दाव।
फिर पीछे पछतायगा चला चली हो जाव ॥२३॥
राम रसायन पीजिये चोखा फूल चुवाय।
सुन्न सरोवर हंस मन पीया प्रेम अघाय ॥२४॥
कहता दास गरीब है बाँदी-जाद१ गुलाम।
तुम हो तैसी कीजिये भक्ति हिरंबर नाम ॥२५॥
॥ बिनती का अंग॥
साहब मेरी बीनती सुनो गरीब निवाज।
जल की बूँद महल रचा भला बनाया साज ॥ १ ॥
साहब मेरी बीनती सुनिये अर्स अवाज।
मादर पिदर करीम तू पुत्र पिता को लाज ॥ २ ॥
साहब मेरी बीनती कर जोरैं करतार।
तन मन धन कुरबान है दीजै मोहिं दीदार ॥ ३ ॥
पाँच तत्त के महल में नौ तत का इक और।
नौ तत से इक अगम है पारब्रह्म की पौर ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पवन कूँ करो एकत्तर२ यार।
द्वादस उलट समोय ले दिल अंदर दीदार ॥ ५ ॥
चार पदारथ महल में सुरत निरत मन पौन।
सिव द्वारा खुलि है जबै दरसै चौदह भौन ॥ ६ ॥
(१) ख़ानाज़ाद् । (२) इकट्ठा ।

बिनती का अंग ३१
सील संतोष बिबेक बुध दया धर्म इकतार ।
अकल यकीन इमान रख गही बस्तु निज सार ॥ ७ ॥
साहब तेरी साहबी कैसे जानी जाय ।
त्रिसरेणू१ से भीन है नैनौँ रहा समाय ॥ ८ ॥
अनँत कोटि ब्रह्मांड का रचनहार जगदीस ।
ऐसा सूच्छम रूप धर आन बिराजा सीस ॥ ६ ॥
साहब पुरुष करीम तूँ अविगत अपरंपार ।
पल पल माँहैं बंदगी निरधारौँ आधार ॥१०॥
दरदमंद दरवेस तूँ दिल दाना महबूब ।
अचल बिसंभर बस रहा सूरत मूरत खूब ॥११॥
साँस सुरत के मद्ध है न्यारा कभी न होय ।
ऐसा साछीभूत है सुरत निरंतर जोय ॥१२॥
सुरत निरत से भीन है जगन्नाथ जगदीस ।
त्रिकुटी छाजै पुर रहै है ईसन का ईस ॥१३॥
कोटि जग्य असुमेध कर एक पलक धर ध्यान ।
षट दल के री बन्दगी नहीं जग्य उनमान ॥१४॥
जित सेतीं दम ऊचरै सुरत तहाँई लाय ।
नाभी कुंडल नाद है त्रिकुटि कमल समाय ॥१५॥
अठसठ तीरथ भरमना भटक मुआ संसार ।
बारह बानी२ ब्रह्म है जाका करो बिचार ॥१६॥
अठसठ तीरथ जाइये मेले बड़ा मिलाप ।
पत्थर पानी पूजते साध संत मिल जाप ॥१७॥
सनकादिक सेवन करै सुकदे बोलै साख ।
कोटि ग्रन्थ का अरथ है सुरत ठिकाने राख ॥१८॥
( १ ) तीन परमाणु का एक त्रिसरेणु होता है। ( २ ) छः कमल पिण्ड के और छः
ब्रह्मांड के।

३३ गरीबदास जी की बानी
साहब तेरी साहबी कहा कहूँ करतार ।
पलक पलक की दीठ में पूरन ब्रह्म हमार ॥१९॥
एते करता कहाँ हैं वह तो साहब एक ।
जैसे फूटी आरसी टूक टूक में देख ॥२०॥
करौं बीनती बंदगी साहब पुरुष सुभान१ ।
संख असंखों बरन है कैसे रचा जहान ॥२१॥
साहब तेरी साहबी समझ परै नहिँ मोहिँ ।
एता रूप जहान जग कैसे सिरजा तोहिँ ॥२२॥
एक बीज इक बिंदु है एक महल इक द्वार ।
चरन कमल कुरबान जाँ सिरजे रूप अपार ॥२३॥
मौला जल से थल करै थल से जल कर देत ।
साहब तेरी साहबी स्याम कहूँ की सेत ॥२४॥
साहब मेरा मिहरबाँ सुनिये अरस अवाज ।
पंजा राखो सीस पर जसहीँ होत तिरास ॥२५॥
मादर पिदर परान तँू साहब समरथ आप ।
रोम रोम धुन होत है सब्द सिंधु परकास ॥२६॥

बिनती का अंग ३३
ओं अरु सोहं सार है मूल फूल परबेस ।
सिव ब्रह्मादिक रटत हैं ध्यान धरत है सेस ॥३२॥
मैं समरथ के आसरे दमक दमक करतार ।
गफ़लत मेरी दूर कर खड़ा रहूँ दरबार ॥३३॥
सुनो पुरुष मेरी बीनती साहब दीन-दयाल ।
पतित-उधारन साइयाँ तुम हो नजर निहाल ॥३४॥
समरथ का सरना लिया ताहि न चाँपै काल ।
पारब्रह्म का ध्यान धर होत न बाँका बाल ॥३५॥
नागदमन¹ निरगुन जड़ी ऐसा तुम्हरा नाम ।
तच्छक तीछा डरत है हर दम जप ले नाम ॥३६॥
आतम इंद्री कारने मत भटकावै मोहिं ।
जगन्नाथ जगदीस गुरु सरना आया तोहिं ॥३७॥
चरन कमल के ध्यान से कोटि बिघन टल जाहिं ।
राजा होवै लोक का जहाँ परै हुम² छाँहि ॥३८॥
हुमा छाँह जा पर परै पिरथी-नाथ कहाय ।
पसु पंछी आदम सबै सनमुख परखै ताय ॥३६॥
दिब्य-दृष्टि देवा दयाल सतगुरु संत सुजान ।
तिरलोकी के जीव कूँ परख लेत परवान ॥४०॥
अगले पिछले जन्म कूँ जानत है जगदीस ।
मुंडमाल सिव के गले पहिर रहे ज्यों ईस³ ॥४१॥
करुनामई करीम जप अलह अलख का ध्यान ।
सत्त पुरुष सुख सिंधु में जपत समाने प्रान ॥४२॥
दम सूँ दम कूँ समझ ले उठत बैठ आराध ।
रंचक ध्यान समान सुध पूरन सकल मुराद ॥४३॥
(१) नाम साँप की जड़ी का । (४) हुमा चिड़िया जिसकी निसबत कहते हैं कि उसका
साया पड़ने से आदमी बादशाह हो जाता है । (३) एक समय पारवती जी ने शिवजी से
पूछा कि यह मुंडमाल जो आप पहिने हुए हैं उसमें किन किन के सिर हैं । शिव जी

३४ गरीबदास जी की बानी
अर्ध नाम कुंजर जपा भया ग्राह से पार१।
उभय घड़ी खट्वाँग जप ऐसा नाम उच्चार२ ॥४४॥
अनंत कोटि ब्रह्मांड में बटक३ बीज विस्तार ।
सुरत सरूपी पुरुष है तन मन धन सब वार ॥४५॥
सुन्न सपेदा स्याम है भूर भद्र बैराट ।
तिल प्रमान में पैठ कर उतरो औघट घाट ॥४६॥
रतन अमोली फूल है सो साहब के सीस ।
जो रंग नहीं स्रिष्टि में देखा बिस्वे बीस ॥४७॥
कोटि ध्यान असनान कर कोटि जोग बैराग ।
कोटि कुटुम्ब गृह तज गये दरसत ना अनुराग ॥४८॥
राग४ रूप रघुबीर है छाँह धूप से न्यार ।
सात स्वर्ग पर सो तपै कैसे हो दीदार ॥४६॥
सतगुरु अर्थ५ बिवान है हिरदे बैठा आय ।
जब वा खोलै चाँदनी पल में देह लखाय ॥५०॥
सतगुरु के सदके करूँ अनंत कोटि ब्रह्मांड ।
निरगुन नाम निरंजना मेटत है जम दंड ॥५१॥
सतगुरु के सदके करूँ तन मन धन कुरबान ।
दिल के अन्दर देहरा तहाँ मिले भगवान ॥५२॥
दिल के अन्दर देहरा जा देवल में देव ।
हरदम साखी-भूत है करो तासु की सेव ॥५३॥
जल का महल बनाइया धन समरथ साँई ।
कारीगर कुरबान जाँ कुछ कीमत नाँई ॥५४॥


बोले कि तुम हमको इतनी प्रिय हो कि जितने जन्म तुमने धरे हैं तुम्हारे हर एक शरीर
का मुंड मैंने अपने गले में डाल रक्खा है।
(१) देखो नोट पृष्ठ २० । (२) राजा खट्वांग से किसी समय में देवता लोगों ने
अति प्रसन्न होकर कहा कि जो चाहो सो बरदान माँगो । राजा बोले पहिले यह बतलाइये
मेरी उमर कितनी बाकी है। देवताओं ने कहा सिर्फ दो घड़ी और जियोगे। यह सुन कर
राजा ने अपने चित्त को एकाग्र कर परमेश्वर का नाम जपना शुरू किया और दोही घड़ी
में अपना काम बना लिया। (३) बड़ का पेड़ । (४) प्रेम । (५) बस्तु ।

बिन्ती का अंग २५
कोट जतन कर राखिया जठरा के माईं।
गर्भबास की बीनती सुनि पुरुष गुसाईं ॥५५॥
नैन नाक मुख स्रवन लै सब साज बनाया।
दस्त चरन चिन्तामनी परिपूरन काया ॥५६॥
कली कली कर जोड़िया नाड़ी निरवाना।
दस सहस्र का बन्ध लाय नाभी असथाना ॥५७॥
तालू कंठ भिरकुटी रसना मुख माईं।
दाढ़ अरु दंत बनाइया धन अलख गुसाईं ॥५८॥
पलकों के छज्जे बने मुँह महल मुँडेरे।
जै जै जै जगदीस तूँ धन साहब मेरे ॥५६॥
ग्रीवा१ हाड़ी रुधिर में ले संधि मिलाई।
ऊपर चाम लपेट कर नख रोम बनाई ॥६०॥
तलुवे एड़ी आँगुली पिंडरी परवाना।
जोड़े जाँघ बनाइया कादिर कुरबाना ॥६१॥
कमर करंक२ करीम ने क्या जोड़ लगाई।
नस नाड़ी का बँध दे गिरह गाँठ बँधाई ॥६२॥
पेट पीठ पूरन किये परमानन्द स्वामी।
भुजा खवे कुहनी बनी समरथ धन नामी ॥६३॥
आँत उदर में राख कर क्या परदा कीन्हा।
एक द्वार दो देहरी अन जल का सीना ॥६४॥
अष्ट कमल दल आरती हरदम हर होई।
नाभि कमल में प्रान नाथ राखे निरमोई ॥६५॥
माया की बुरकी३ पड़ी मारग नहिं पावै।
दस इंद्री लारै लगी अब कौन छुटावै ॥६६॥
बड़वा नल का द्वार है नाभी के नीचे।
जो सतगुरु भेदी मिलै तहँ अमृत सींचे ॥६७॥
(१) गरदन। (२) हड्डी का पिंजरा। (३) परदा।

३६ गरीबदास जी की बानी
जठर अगिन जा कूँ कहैं जो छूधा लावै ।
जल से तिरखा ना मिटै कोई भेदी पावै ॥६८॥
तीन पेच हैं कुँहलिनी नाभी के पासा ।
जा के मुख से नीकले जल अगिन अकासा ॥६६॥
मल मूतर की कोथली१ दो न्यारी कीन्ही ।
दम का दगड़ा२ गगन कूँ ऐसा परबीनी ॥७०॥
मन माया मौजूद है काया गढ़ माहीं ।
बीच पुरंजन३ बसत है सो पावै नाहीं ॥७१॥
पाँच भार४ जो आदि है जा के सँग डोलै ।
तीन लोक कूँ खा गई मुख से नहिं बोलै ॥७२॥
बड़ी कुसंगन सुपचनी५ सुध बुध बिसरावै ।
चिंता चेरी चूहरी५ नित नाद बजावै ॥७३॥
महा दरिद्र की गाँठ बाँध आगे धर देवै ।
तीन लोक के चिंत कूँ निस बासर सेवै ॥७४॥
काम क्रोध रसिया जहाँ मद मोह मवासी ।
[L17

बिनती का अंग ३७
तीन लोक की मेदनी१ सब हाजिर होई ।
मन रंगी के रंग में रंगा सब कोई ॥८०॥
आसन असथल उठ गये कुछ पिंड न प्राना ।
फेर पुरंजन आनकर घाला घमसाना ॥८१॥
दुरमति दूती और है इक दारुन माया ।
जैसे काँजी२ दूध में घृत खंड कराया ॥८२॥
द्वादस कोटि कटक चढ़े कुछ गिनती नाहीं ।
लालच नीचन की बहै जिन फौजाँ माहीं ॥८३॥
संसा सोच सराय में सूतक दिन राती ।
जीवतही जूती परैं जम तोरै छाती ॥८४॥
रहजन कोटि अनंत हैं काया गढ़ माहीं ।
ममता माया बिस्तरी तिर्गुन तन माहीं ॥८५॥
बाँकी फौज पुरंजना कुछ पार न पावै ।
मन राजा के राज में क्या भगति करावै ॥८६॥
मन के मारे मुनि बहे नारद से ज्ञानी ।
सिंगी रिषि पारासरा कीन्हे रजधानी ॥८७॥
चढ़े पुरंजन इंद्र पर कर धाई धाई ।
गौतम रिषि की इस्तरी सँग कीन्हा जाई३ ॥८८॥
नारि अहल्या सूँ रते सुरपति से देवा ।
इंद्र सहस भग होगये कुछ ख्याल न भेवा३ ॥८६॥
(१) पृथ्वी । (२) सिरका ।
(३) एक बार देवराज इन्द्र का मन गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या को देख कर
मोहित हो गया । विचार किया कि यह सुन्दरी हम को कैसे प्राप्त हो क्योंकि सिवाय बड़े
तड़के स्नान के हेतु और कभी ऋषि जी घर से बाहर जाते नहीं । तब आधी रात को
मुरगा का रूप धर कुकरूँकूँ की आवाज दी । ऋषि जी यह समझ कर कि सबेरा हो गया
घबरा कर जागे और गंगा स्नान करने चले गये । इन्द्र गौतम का रूप धारण करके
अहिल्या के पास आये और कहा कि अभी रात बहुत है स्नान की बेला नहीं है इस लिये
हम लौट आये, यह कह कर अहिल्या के संग भोग किया । जाते समय गौतम जी भी
६

४० कबीरदास जी की बानी
प्रान अपान१ समान कर सुरती लौ लाई ।
दुहु बर कोट ढहाइया अरु तहँ बड़ खाई ॥११०८॥
भरम बुरज भाने सबै सोलह सुर धाई ।
सतरह सुरती हंसिनी सब खबरैं लाई ॥११०६॥
चढ़ा बिहंगम नाद भर निरगुन निरखानी ।
सिव साहब के लिंग पर गिर गंगा आनी ॥१११०॥
मान तलाई मालवे२ तिरबेनी तालं ।
गंगा जमुना सरसुती जब छुटी दयालं ॥११११॥
सिव साहब के लिंग पर तिरबेनी बूड़े ।
कलमष३ कसमल कट गये सब बंधन छूटे ॥१११२॥
परा नंद नित बूझहीं दरबार हमारे ।
अमृत की भाठी भरै कलमष कूँ जारै ॥१११३॥
ब्रह्म-रंध्र४ का घाट है घट मठ से न्यारा ।
सुरति हंसनी चढ़ गई लख पूरब द्वारा ॥१११४॥
सतगुरु मेरा महरमी काया धर आया ।
जिन्ह माटी के महल में निज ब्रह्म लखाया ॥१११५॥
बाहर भीतर एक है पल जोड़े प्रानी ।
हिरदे ही में देख ले वह अगम निसानी ॥१११६॥
सुन्न सलहला५ पंथ है पद पारख लीजै ।
जटा कुंडली जाइये अमृत रस पीजै ॥१११७॥
जटा कुंडली पर बसै सतपुरुष बनानी ।
जहँ समरथ का तख्त है धुन अनहद बानी ॥११८॥
जहँ वहँ रहन कबीर की निज मंदिर महली ।
चढ़ै सही गिर गिर परै वह पंथ सलहली ॥११६॥
पैड़ी पंथ न पग धरन कैसे कर जाऊँ ।
मिला रहै अरु ना मिलै कहँ सुरत लगाऊँ ॥१२०॥
(१) नीचे की वायु । (२) उपजाऊ देश । (३) पाप । (४) तीसरा तिल । (५) रपटीला ।

बिनती का अंग ४१
ऊँची भुमि अकास मठ जहँ जाय न कोई।
सुरत निरत से अगम है धुन ध्यान समोई ॥१२१॥
दरस परस देवल धजा फरकै दिन राती।
जोत अखंडित जगमगै दीपक बिन बाती ॥१२२॥
नभ से न्यारा नूर है झीने से झीना।
ज्ञान ध्यान की गम नहीं परखै परबीना ॥१२३॥
संख कलप जुग होगये जो टरै न टारा।
खड़ग बान बेधे नहीं है अधर अधारा ॥१२४॥
पत्थर में हीरा चलै धन धरती जानै।
लाख लोग पासै खड़े दरसत पाषानै ॥१२५॥
सात आवरण बेधिहै जो पावै हीरा।
काया में से उड़ चले पलकों के तीरा ॥१२६॥
उरगन¹ हीरा गह लिया सुरती घर आना।
सेत धजा देवल खिमै² जहँ कोट निसाना ॥१२७॥
कमल रूप करतार है नैनों के माहीं।
सातो कमल सरीर में वह न्यारा साँई ॥१२८॥
जागत सोवत है नहीं कछु खाय न पीवै।
चिरंजीव चिंतामनी जो बहु जुग जीवै ॥१२९॥
काल कर्म आगे खड़े लावै जिस लागै।
भगली भगल उचारिहै बिद्या अनुरागै ॥१३०॥
काल कर्म आगे खड़े नित नाच कराहीं।
भगली भावै सो करै जा की गम नाहीं ॥१३१॥
पलक बीच पैमाल³ है सब खंड ब्रह्मंडा।
अजब नबेली मेदनी⁴ छिन में परचंडा ॥१३२॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस से कँपैं दिन राती।
निर्दावै⁵ सोई भये जिस काल न खाती ॥१३३॥
(१) साँप । (२) झलकै । (३) नाश (४) पृथ्वी (५) निर्भय ।

४२ गरीबदास जी की बानी
अनंत कोटि ब्रह्मांड का चरबन कर लेई ।
महा काल की दाढ़ में आवे सब कोई ॥१३४॥
काल डरै करतार से कर बंधन जोड़ी ।
संख असंखौ चल गये सिव बिस्नु करोड़ी ॥१३५॥
अकल पुरुष साहब धनी अविगत अविनासी ।
गरीबदास सरना लिया काटो जम फाँसी ॥१३६॥
॥ कुसंगत का अंग ॥
कमल फूल मन भँवर है काँटा कर्म कुसंग ।
पाँच विषय सूँ बँध रहा कैसे लागे रंग ॥१॥
काया सरवर मीन मन दसौ दिसा कूँ जाय ।
विषय लहर दिल देह में भगति न रंच१ सुहाय ॥२॥
कुटिल बासना कमल२ में पावत नहीं मुराद ।
मरजीया३ मन कूँ करै जहँ पथ अगम अगाध ॥३॥
सुरभी४ बँधी चमार के ब्राह्मन बोई भाँग ।
चंदन खर के लेपिये कुंदन बदले राँग ॥४॥
कर्म कटारी बाँध के करै भारथी जंग५ ।
अपने सिर लेवै नहीं प्राछित सौंपै गंग ॥५॥
तरन तारनी बकस दे हमरे प्राछित काट ।
पारब्रह्म सूँ ऊलमै परभी न्हावै घाट ॥६॥
बगुला हंसा एक सर एकै रूप रसाल ।
वह सरवर मोती चुँगै वह मच्छी का काल ॥७॥
सीप पियत है स्वाँति कूँ बिच है खारी नीर ।
माहें मोती नीपजै करनी बंध सरीर ॥८॥
(१) कुछ । (२) हृदय । (३) गोताखोर । (४) गाय । (५) महाभारत
सरीखी लड़ाई ।

नग फूटा बिकता नहीं सारा लीजै सोध ।
हीरा पत्थर में बसै धन धरती ले खोद ॥९॥
कदली माँह कपूर है गज मोती अँदरून ।
चुभक चिड़ैया चोंच भर पैठे गज नाखून ॥१०॥
यौ तो सतसँग तुझ कहा कुसँग कहूँ भय भीत ।
स्वाँति पड़े जो सरप मुख करता जहर अनीति ॥११॥
भूम पड़े जैसा फलै सुर की संगत कीन ।
नीचन मुख नहि देखना ना कोइ मिलै कुलीन ॥१२॥
लोहे चुम्बक प्रीतड़ी¹ दोनौँ जड़ जगदीस ।
चेतन चेतन तें मिलै ल्हीस मिलत है ल्हीस ॥१३॥
रूमी² बस्तर अंतरा लोहा पारस बीच ।
चार जुगन मेला नहीं रहते निकट नगीच ॥१४॥
ऐसा नीच न जान दे साहब के दरबार ।
समझत नहिं अज्ञान बुध लग रहे करम लगार ॥१५॥
करम भरम भारी लगे मनसा चंचल चाव ।
बुध बेधै नहिं सुरत सत महल न लगे लगाव ॥१६॥
पिंग

४६ गरीबदास जी की बानी
ज्यों कुंजर सिर धुनत है अगला१ जनम सुभंत ।
अबकी हेले२ नर करे तो सेऊँ पूरे संत ॥१८॥
राज दुवारे जाय कर रापत३ रोवै काहि ।
पग जंजीर न डारिये कजली बन कूँ जाहि ॥१९॥
सीस महावत बसत है अंकुस मोड़ समोड़ ।
बचन फिरत है पलक में साँईं नहीं लोड़४ ॥२०॥
ऐसा हाफिज५ फील है रहत गयंद गियान ।
राज दुवारे बन्धिया बिन साँईं के ध्यान६ ॥२१॥
सुन्न समुद जो मन रहै तो नहि भरमै प्रान ।
अरस कुरस से भिन्न है देखे अकल अमान ॥२२॥
सुन्न सरोवर सिखर सर सूभर७ तालम ताल ।
मन मरजीया छोड़िये लावै हीरा लाल ॥२३॥
सुन्न सरोवर सैर कर गगन उड़ाना मन्न ।
अगम भूमि भूलै नहीं लावै नाम रतन ॥२४॥
सुन्न सिखर संगत करै मूलै खोज न पंथ ।

संगत का अंग ४७
जनम पुरबला सूझई जरिहैं बारंबार ।
बिषय बासना उर बसै तक कूँ करिहैं छार ॥२९॥
सती न संका जरन की काम लुब्ध१ घट बीच ।
सकल सखी झूलन चलीं जैसे सावन तीज ॥३०॥
जनम इकीस जो सँग जरै तौ स्वर्गापुर बास ।
मन इच्छा फल पावहीं पुरुष समीप निवास ॥३१॥
नारी पुरुष पिरेम सँू बैठे स्वर्ग अकास ।
नव करोर दिब२ बरस लग पुरवत मन की आस ॥३२॥
करनी भरनी भुगत कर पैठत हैं मृत लोक ।
बिना भगित भावै नहीं सब संगत में दोष ॥३३॥
तपी तपै तन कूँ दहै पाँचो इंद्री साध ।
नहिं इच्छा दीदार की भूले आदि अनाद ॥३४॥
लाख बज्र कूँ झेल कर सूरे जूझैं खेत ।
बादी जोगी हठ करें चिनगी बरखै रेत ॥३५॥
बादी जोगी बँध रहा मन इच्छा बड़ राज ।
अंत बेर यों मारिये ज्यों तीतर पर बाज ॥३६॥
तन तो बाँबी हो गया मन की गई न बान ।
स्वर्ग पहुँच दोजख गये सतगुरु लगे न कान ॥३७॥
तन की तारी लावई मनसा जरै मसाल ।
राज पाय नरकै परै बाँधी पोट जवाल३ ॥३८॥
पाँचो इंद्री मन लठा फिरता डाँवाँडोल ।
सप्तपुरी का राज तज लगे तपस्या झोल ॥३९॥
तप से धीर न होत है यह मन रंगा राज ।
साहब की नहिं बंदगी साजा झूठा साज ॥४०॥
(१) लोभ । (२) देवताओं का बरस । (३) खराबी ।

४४ गरीबदास जी की बानी
सतगुरु संगत सार है सकल कुसँंग सब जीव ।
पानी में निकसै नहीं अनेक जतन कर घीव ॥२२॥
परमानंद से बिछुड़ता यह मन हंसा काग ।
मुक्ति नहीं सतगुरु बिना कहाँ छिपै लै दाग ॥२३॥
कमरी के रंग ना चढ़ै कोइला नहीं सफेद ।
सतगुरु बिन सूझै नहीं कहा पढ़त है बेद ॥२४॥
कौड़ी बदले जात है यह मानिक नग हंस ।
पाँचो सेती बँध रहा जुग जुग होत बिधंस ॥२५॥
पाँच पचीस कुसंगनी सुन्न सिखर नहिं न्हाहिं ।
सतगुरु सूँ मेला नहीं यों चौरासी जाहिं ॥२६॥
सतगुरु सूरत नगर से आये हैं बड़ काज ।
काम कदर जानै नहीं हंसा चढ़ै जहाज ॥२७॥
कस्तूरी को बासना मिरगा लेत सुबास ।
निरख परख आवै नहीं बहुरि ढँढोरै घास ॥२८॥
कस्तूरी महकंत है साहब है संबूह ।
नौका चढ़ै न नाम की अंधे डूबत कूँह ॥२६॥
॥ संगत का अंग ॥
संगत कीजै साध की संसारी भटकंत ।
पिंजर सूआ बसत है किस कूँ बूझै पंथ ॥ १ ॥
सतगुरु की संगत भली हंसा थीर मुकाम ।
जुगन जुगन के बीछुरे परसे लोक निदान ॥ २ ॥
साधौँ की संगत करै बड़ भागी बड़ देव ।
आपन तौ संसा नहीं और उतारै खेव ॥ ३ ॥
संगत सुर की कीजिये असुर न आवै होस ।
बुध भ्रष्टी सूँ संग क्या उलटा देही दोस ॥ ४ ॥
संगत सुर की कीजिये असुरन सूँ क्या हेत ।
डार मूल पावै नहीं ज्यों मूली का खेत ॥ ५ ॥

संगत का अंग ४५
संगत सुर की जो रहै असुरों की है गंध।
सुर हैं स्वर्गलोक के असुर मलीने जिंद ॥६॥
सूआ सतगुरु कहत है पिंजरे परे परान।
खिड़की खुलते उड़ गया मंतर लगा न कान ॥७॥
अंतर हेत न प्रीत पद सूए ज्यों संसार।
पिंजरा खाली तासु का उड़ गया बनों मँझार ॥८॥
सत गुर दत दाता१ कहै बानी बड़ी बलंद।
मुख बोले क्या होत है अंतर हेत न अंध ॥६॥
सुअटा खाली रह गया पार पहुँचा नाहिं।
राम राम प्रानी कहै जम की नगरी जाहिं ॥१०॥
सुअटा पढ़ै सुभान गत अंतर नहीं उचार।
कुंज२ कुरल३ अंड पोखहीं कोसन सहस हजार ॥११॥
कुरल अंड हर हेत जप अललपच्छ गहि तार।
हिरदा सुद्ध सरीर सर४ कच्छप दृष्ट निहार ॥१२॥
ऐसी संगत जो मिलै तौ सांई सूँ भेट।
ऊपरली बरबाद है जम मारैगा फेट ॥१३॥
कुरला कच्छप अलल कूँ किन समझाया ज्ञान।
आड़ा परदा है नहीं हिरदे अंतर ध्यान ॥१४॥
ऐसी संगत जो मिलै भगत गर्भ प्रहलाद५।
नारद से सतगुरु मिलैं सूझै अगम अगाध ॥१५॥
सुकदे गर्भ जोगेश्वर५ ध्रुव का ध्यान अमान।
लाख बरस के बह गये पाँच बरस परवान ॥१६॥
जैसे मीन समुद्र में दसो दिसा कूँ जाय।
हृदय कमल में पैठ कर जो खोजै सो पाय ॥१७॥
(१) तोता के पढ़ाने की बोली। (२) कुंजबन चिड़िया। (३) कोक चिड़िया।
(४) तालाब। (५) कहते हैं कि प्रहलाद और सुकदेव माँ के पेट से भक्त पैदा हुए।
७

४६ गरीबदास जी की बानी
ज्यों कुंजर सिर धुनत है अगला१ जनम सुझंत ।
अबकी हेले२ नर करे तो सेऊँ पूरे संत ॥१८॥
राज दुआरे जाय कर रापत३ रोवै काहि ।
पग जंजीर न डारिये कजली बन कूँ जाहि ॥१९॥
सीस महावत बसत है अंकुस मोड़ समोड़ ।
बचन फिरत है पलक में साँईं नाहीं लोड़४ ॥२०॥
ऐसा हाफिज५ फील है रहत गयंद गियान ।
राज दुआरे बन्धिया बिन साँईं के ध्यान६ ॥२१॥
सुन्न समुद जो मन रहै तो नहि भरमै प्रान ।
अरस कुरस से भिन्न है देखे अकल अमान ॥२२॥
सुन्न सरोवर सिखर सर सूभर७ तालम ताल ।
मन मरजीया छोड़िये लावै हीरा लाल ॥२३॥
सुन्न सरोवर सैर कर गगन उड़ाना मन्न ।
अगम भूमि भूलै नहीं लावै नाम रत्न ॥२४॥
सुन्न सिखर संगत करै मूलै खोज न पंथ ।
फेर उलट हटिहै नहीं रावत जेहा दंत८ ॥२५॥
सती पुकारै सर९ चढ़ी मुख बोलत है राम ।
कौतुक देखन सो गये जिनके मन सहकाम ॥२६॥
सती जरै अरु सर जरै कौतुक१० देखनहार ।
धाम जहाँ का तहाँ है मिलै रूप संसार ॥२७॥
सती बहुर उपजै नहीं घर जाने की प्रीत ।
सती रटत है राम कूँ कौतुक गावै गीत ॥२८॥
(१) पुरवला । (२) बार । (३) हाथी । (४) इच्छा । (५) कुरान को याद किये हुए ।
(६) मशहूर है कि हाथी को अपना पिछला जन्म याद रहता है कि मैं कौन था और
भगवन्त को भूल जाने से पशु जोनि पाई इसी सोच में हाथी खड़ा खड़ा अपना शरीर
और सिर धुनता है और प्रण करता है कि अगले जन्म में जो दया से मनुष्य तन पाऊँगा
तो मालिक को कभी न बिसारूँगा । (७) शुभ्र = प्रकाशमान । (८) जैसे हाथी के दाँत
बाहर निकले हुए फिर भीतर नहीं पैठते । (९) चिता । (१०) तमाशाई ।

संगत का अंग ४७
जनम पुरबला सूझई जरिहैं बारंबार ।
बिषय बासना उर बसै तक कूँ करिहैं छार ॥२६॥
सती न संका जरन की काम लुब्ध१ घट बीच ।
सकल सखी झूलन चलीं जैसे सावन तीज ॥३०॥
जनम इक्कीस जो सँग जरै तौ स्वर्गापुर बास ।
मन इच्छा फल पावहीं पुरुष समीप निवास ॥३१॥
नारी पुरुष पिरेम सँू बैठे स्वर्ग अकास ।
नव करोर दिब२ बरस लग पुरवत मन की आस ॥३२॥
करनी भरनी भुगत कर पैठत हैं मृत लोक ।
बिना भगित भावै नहीं सब संगत में दोष ॥३३॥
तपी तपै तन कूँ दहै पाँचो इंद्री साध ।
नहिं इच्छा दीदार की भूले आदि अनाद ॥३४॥
लाख बज्र कूँ झेल कर सूरे जूझैं खेत ।
बादी जोगी हठ करें चिनगी बरखै रेत ॥३५॥
बादी जोगी बँध रहा मन इच्छा बड़ राज ।
अंत बेर यों मारिये ज्यों तीतर पर बाज ॥३६॥
तन तो बाँबी हो गया मन की गई न बान ।
स्वर्ग पहुँच दोजख गये सतगुरु लगे न कान ॥३७॥
तन की तारी लावई मनसा जरै मसाल ।
राज पाय नरकै परै बाँधी पोट जवाल३ ॥३८॥
पाँचो इंद्री मन छठा फिरता डाँवाँडोल ।
सप्तपुरी का राज तज लगे तपस्या झोल ॥३६॥
तप से धीर न होत है यह मन रंगा राज ।
साहब की नहिं बंदगी साजा झूठा साज ॥४०॥
(१) लोभ । (२) देवताओं का बरस । (३) खराबी ।