गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती का अंग ३१
सील संतोष बिबेक बुध दया धर्म इकतार ।
अकल यकीन इमान रख गही बस्तु निज सार ॥ ७ ॥
साहब तेरी साहबी कैसे जानी जाय ।
त्रिसरेणू१ से भीन है नैनौँ रहा समाय ॥ ८ ॥
अनँत कोटि ब्रह्मांड का रचनहार जगदीस ।
ऐसा सूच्छम रूप धर आन बिराजा सीस ॥ ६ ॥
साहब पुरुष करीम तूँ अविगत अपरंपार ।
पल पल माँहैं बंदगी निरधारौँ आधार ॥१०॥
दरदमंद दरवेस तूँ दिल दाना महबूब ।
अचल बिसंभर बस रहा सूरत मूरत खूब ॥११॥
साँस सुरत के मद्ध है न्यारा कभी न होय ।
ऐसा साछीभूत है सुरत निरंतर जोय ॥१२॥
सुरत निरत से भीन है जगन्नाथ जगदीस ।
त्रिकुटी छाजै पुर रहै है ईसन का ईस ॥१३॥
कोटि जग्य असुमेध कर एक पलक धर ध्यान ।
षट दल के री बन्दगी नहीं जग्य उनमान ॥१४॥
जित सेतीं दम ऊचरै सुरत तहाँई लाय ।
नाभी कुंडल नाद है त्रिकुटि कमल समाय ॥१५॥
अठसठ तीरथ भरमना भटक मुआ संसार ।
बारह बानी२ ब्रह्म है जाका करो बिचार ॥१६॥
अठसठ तीरथ जाइये मेले बड़ा मिलाप ।
पत्थर पानी पूजते साध संत मिल जाप ॥१७॥
सनकादिक सेवन करै सुकदे बोलै साख ।
कोटि ग्रन्थ का अरथ है सुरत ठिकाने राख ॥१८॥
( १ ) तीन परमाणु का एक त्रिसरेणु होता है। ( २ ) छः कमल पिण्ड के और छः
ब्रह्मांड के।