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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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३६ गरीबदास जी की बानी
जठर अगिन जा कूँ कहैं जो छूधा लावै ।
जल से तिरखा ना मिटै कोई भेदी पावै ॥६८॥
तीन पेच हैं कुँहलिनी नाभी के पासा ।
जा के मुख से नीकले जल अगिन अकासा ॥६६॥
मल मूतर की कोथली१ दो न्यारी कीन्ही ।
दम का दगड़ा२ गगन कूँ ऐसा परबीनी ॥७०॥
मन माया मौजूद है काया गढ़ माहीं ।
बीच पुरंजन३ बसत है सो पावै नाहीं ॥७१॥
पाँच भार४ जो आदि है जा के सँग डोलै ।
तीन लोक कूँ खा गई मुख से नहिं बोलै ॥७२॥
बड़ी कुसंगन सुपचनी५ सुध बुध बिसरावै ।
चिंता चेरी चूहरी५ नित नाद बजावै ॥७३॥
महा दरिद्र की गाँठ बाँध आगे धर देवै ।
तीन लोक के चिंत कूँ निस बासर सेवै ॥७४॥
काम क्रोध रसिया जहाँ मद मोह मवासी ।
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