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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

२८ गरीबदास जी की बानी
भगित हेत गृह आइया धरा सरूप हजाम१॥ ६ ॥
पीपा को परचा हुआ मिले भक्त भगवान ।
सीता मग जोवत रही द्वारावती निधान२ ॥ ७ ॥
धना भगत की धुन लगी बीज दिया जिन्ह आन ।
सूखा खेत हरा हुआ कंकर बोये जान३ ॥ ८ ॥
रैदास रँगीला रंग है दिये जनेऊ तोड़ ।
जग्य ज्योनार चोले धरे इक रैदास इक गौड़४ ॥ ९ ॥
(१) किसी राजा के यहाँ सेना नाऊ भक्त हजामत बनाने की नौकरी पर था।
एक दिन हजामत बनाने के लिए जा रहा था कि राह में साधू लोग मिल गये और
वह साधु-सेवा में लग गया, उसके बदले भगवान आप उस राजा की हजामत
बना आये।
(२) पीपा जी मागरौनगढ़ के राजा थे जो अपनी सीता नामक रानी के साथ साधू
हो गये और स्वामी रामानन्द जी से उपदेश लिया । इनकी प्रचण्ड भक्ति और महिमा
का भक्तमाल में बहुत वर्णन लिखा है । जिस कथा का गरीबदास जी की इस साखी में
इशारा है वह इस तरह पर है कि पीपाजी जी और उनकी स्त्री सीता द्वारका को गये और
वहाँ असली दिब्य द्वारका में पहुँच कर (जो समुद्र में डूब गई है) साक्षात् श्रीकृष्ण
का दर्शन पाने के हेतु एक दिन सीता के साथ समुद्र तट पर पहुँचे । यहाँ सीता को खड़ी
कर पीपा जी आप समुद्र में कूद कर गायब हो गये और सात दिन तक दर्शन का रस
और भगवान की प्रसादी छाप अपने शरीर पर लेकर आज्ञानुसार समुद्र से बाहर निकले
जहाँ सीता उनका रास्ता देख रही थी। पीपा जी ने यह छाप मंदिर के पुजारियों को
सौंप कर आज्ञा की कि जो लोग इस छाप को अपने शरीर पर लगावेंगे वह भगवत
पद पावेंगे।
(३) धना भक्त के पिता ने अपने पुत्र को खेत बोने के लिये बीज देकर भेजा। उसी
समय कुछ भूखे साधू आ गये, उन्हें धना ने सब बीज दे दिया और बाप के डर के मारे
खेत में कंकड़ बो दिये (एक जगह ऐसा लिखा है कि साधुओं के तुम्बों के बीज बो दिये)
फिर जाकर पिता को खबर दी कि खेत बो दिया। कुछ दिन पीछे पिता को नौकरों से
असल हाल मालूम हो गया और बड़े क्रोध में खेत पर गये पर वहाँ पहुँच कर क्या देखा
कि अन्न का खेत खूब लहलहा रहा है।
(४) चित्तौड़ की रानी ने जो रैदास जी की चेली थी एक बार काशी में किसी उत्सव
पर गौड़ ब्राह्मणों को न्योता दिया। ब्राह्मणों ने इनकार किया कि वह चमार की चेली
है हम उसके यहाँ भोजन नहीं कर सकते। इस पर रैदास जी ने उन लोगों को समझाया
कि राज धान्य में कुछ दोष नहीं है और हम कुछ उसे छूने न जायँगे फिर कौन सा
झगड़ा है। ब्राह्मण लोग काइल होकर राजी हो गये। जब खाने को बैठे और थोड़ा बहुत
खा चुके तो देखते क्या हैं कि पंगत में हर ब्राह्मण के इधर उधर एक एक रैदास (चमार)
हैं। ब्राह्मणों ने घबरा कर खाने से हाथ खींच लिया उस पर रैदास जी ने समझाया कि