गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिन्ती का अंग २५
कोट जतन कर राखिया जठरा के माईं।
गर्भबास की बीनती सुनि पुरुष गुसाईं ॥५५॥
नैन नाक मुख स्रवन लै सब साज बनाया।
दस्त चरन चिन्तामनी परिपूरन काया ॥५६॥
कली कली कर जोड़िया नाड़ी निरवाना।
दस सहस्र का बन्ध लाय नाभी असथाना ॥५७॥
तालू कंठ भिरकुटी रसना मुख माईं।
दाढ़ अरु दंत बनाइया धन अलख गुसाईं ॥५८॥
पलकों के छज्जे बने मुँह महल मुँडेरे।
जै जै जै जगदीस तूँ धन साहब मेरे ॥५६॥
ग्रीवा१ हाड़ी रुधिर में ले संधि मिलाई।
ऊपर चाम लपेट कर नख रोम बनाई ॥६०॥
तलुवे एड़ी आँगुली पिंडरी परवाना।
जोड़े जाँघ बनाइया कादिर कुरबाना ॥६१॥
कमर करंक२ करीम ने क्या जोड़ लगाई।
नस नाड़ी का बँध दे गिरह गाँठ बँधाई ॥६२॥
पेट पीठ पूरन किये परमानन्द स्वामी।
भुजा खवे कुहनी बनी समरथ धन नामी ॥६३॥
आँत उदर में राख कर क्या परदा कीन्हा।
एक द्वार दो देहरी अन जल का सीना ॥६४॥
अष्ट कमल दल आरती हरदम हर होई।
नाभि कमल में प्रान नाथ राखे निरमोई ॥६५॥
माया की बुरकी३ पड़ी मारग नहिं पावै।
दस इंद्री लारै लगी अब कौन छुटावै ॥६६॥
बड़वा नल का द्वार है नाभी के नीचे।
जो सतगुरु भेदी मिलै तहँ अमृत सींचे ॥६७॥
(१) गरदन। (२) हड्डी का पिंजरा। (३) परदा।