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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

भक्ति का अंग २६
माँझी मरद कबीर है जगत करै उपहास।
केसो बनजारा भया भगत बड़ाई दास१ ॥१०॥
सोहं ऊपर और है सत्त सुकृत इक नाम।
सब हंसों का बंस है सुन वस्ती नहिं गाम ॥११॥
सोहं ऊपर और है सुरत निरत का नाँव।
सोहं अंतर पैठ कर सत्त सुकृत लौ लाव ॥१२॥
सोहं ऊपर और है बिना मूल का फूल।
जा की गंध सुगंध है ता को पलक न भूल ॥१३॥
सोहं ऊपर और है बिन बोली का कंद।
नाम रसायन पीजिये अविचल अति आनंद ॥१४॥
सोहं ऊपर और है कोउ का जाने भेव।
गोप गोसाईं गैब धुन ता की कर ले सेव ॥१५॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत धुन ध्यान।
चार जुगन की बन्दगी एक पलक परमान ॥१६॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस ठौर।
संकर बकसा मिहर कर अमर भई तब गौर ॥१७॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस माहिं।
एक पलक तहँ संचरै कोटि पाप अध जाहिं ॥१८॥
अविगत की अविगत कथा अविगत है सब ख्याल।
अविगत सों अविगत मिलै कर जोरै तब काल ॥१६॥

डरो मत और नाखून से अपने कांधे की चमड़ी चीर कर दिव्य जनेऊ दिखा कर हँसते
हुए वहाँ से चल दिये । इस महिमा को देख कर ब्राह्मणों ने फिर भोजन किया - (देखो
जीवन-चरित्र रैदास जी बानो में) ।
(१) काशी के पंडित जो कबीर साहब से बहुत द्वेष रखते थे उन्होंने एक बार नगर
भर में यह मशहूर कर दिया कि आज कबीर के यहाँ सब भूखों और कंगलों को पाँच
पाँच सेर अन्न बटेगा, यह सुनकर हज़ारों आदमी की भीड़ उनके दरवाजे पर जमा
हुई। कबीर साहब चुपचाप किसी बहाने से बाहर चले गये और उनके पीछे भगवान
बनजारे का रूप धरे बहुत से बैल अन्न से लदे हुए वहाँ छोड़ गये जो कंगलों को उनकी
आशा से अधिक बाँटा गया ।
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