गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती का अंग ३७
तीन लोक की मेदनी१ सब हाजिर होई ।
मन रंगी के रंग में रंगा सब कोई ॥८०॥
आसन असथल उठ गये कुछ पिंड न प्राना ।
फेर पुरंजन आनकर घाला घमसाना ॥८१॥
दुरमति दूती और है इक दारुन माया ।
जैसे काँजी२ दूध में घृत खंड कराया ॥८२॥
द्वादस कोटि कटक चढ़े कुछ गिनती नाहीं ।
लालच नीचन की बहै जिन फौजाँ माहीं ॥८३॥
संसा सोच सराय में सूतक दिन राती ।
जीवतही जूती परैं जम तोरै छाती ॥८४॥
रहजन कोटि अनंत हैं काया गढ़ माहीं ।
ममता माया बिस्तरी तिर्गुन तन माहीं ॥८५॥
बाँकी फौज पुरंजना कुछ पार न पावै ।
मन राजा के राज में क्या भगति करावै ॥८६॥
मन के मारे मुनि बहे नारद से ज्ञानी ।
सिंगी रिषि पारासरा कीन्हे रजधानी ॥८७॥
चढ़े पुरंजन इंद्र पर कर धाई धाई ।
गौतम रिषि की इस्तरी सँग कीन्हा जाई३ ॥८८॥
नारि अहल्या सूँ रते सुरपति से देवा ।
इंद्र सहस भग होगये कुछ ख्याल न भेवा३ ॥८६॥
(१) पृथ्वी । (२) सिरका ।
(३) एक बार देवराज इन्द्र का मन गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या को देख कर
मोहित हो गया । विचार किया कि यह सुन्दरी हम को कैसे प्राप्त हो क्योंकि सिवाय बड़े
तड़के स्नान के हेतु और कभी ऋषि जी घर से बाहर जाते नहीं । तब आधी रात को
मुरगा का रूप धर कुकरूँकूँ की आवाज दी । ऋषि जी यह समझ कर कि सबेरा हो गया
घबरा कर जागे और गंगा स्नान करने चले गये । इन्द्र गौतम का रूप धारण करके
अहिल्या के पास आये और कहा कि अभी रात बहुत है स्नान की बेला नहीं है इस लिये
हम लौट आये, यह कह कर अहिल्या के संग भोग किया । जाते समय गौतम जी भी
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