गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ गरीबदास जी की बानी
अर्ध नाम कुंजर जपा भया ग्राह से पार१।
उभय घड़ी खट्वाँग जप ऐसा नाम उच्चार२ ॥४४॥
अनंत कोटि ब्रह्मांड में बटक३ बीज विस्तार ।
सुरत सरूपी पुरुष है तन मन धन सब वार ॥४५॥
सुन्न सपेदा स्याम है भूर भद्र बैराट ।
तिल प्रमान में पैठ कर उतरो औघट घाट ॥४६॥
रतन अमोली फूल है सो साहब के सीस ।
जो रंग नहीं स्रिष्टि में देखा बिस्वे बीस ॥४७॥
कोटि ध्यान असनान कर कोटि जोग बैराग ।
कोटि कुटुम्ब गृह तज गये दरसत ना अनुराग ॥४८॥
राग४ रूप रघुबीर है छाँह धूप से न्यार ।
सात स्वर्ग पर सो तपै कैसे हो दीदार ॥४६॥
सतगुरु अर्थ५ बिवान है हिरदे बैठा आय ।
जब वा खोलै चाँदनी पल में देह लखाय ॥५०॥
सतगुरु के सदके करूँ अनंत कोटि ब्रह्मांड ।
निरगुन नाम निरंजना मेटत है जम दंड ॥५१॥
सतगुरु के सदके करूँ तन मन धन कुरबान ।
दिल के अन्दर देहरा तहाँ मिले भगवान ॥५२॥
दिल के अन्दर देहरा जा देवल में देव ।
हरदम साखी-भूत है करो तासु की सेव ॥५३॥
जल का महल बनाइया धन समरथ साँई ।
कारीगर कुरबान जाँ कुछ कीमत नाँई ॥५४॥
बोले कि तुम हमको इतनी प्रिय हो कि जितने जन्म तुमने धरे हैं तुम्हारे हर एक शरीर
का मुंड मैंने अपने गले में डाल रक्खा है।
(१) देखो नोट पृष्ठ २० । (२) राजा खट्वांग से किसी समय में देवता लोगों ने
अति प्रसन्न होकर कहा कि जो चाहो सो बरदान माँगो । राजा बोले पहिले यह बतलाइये
मेरी उमर कितनी बाकी है। देवताओं ने कहा सिर्फ दो घड़ी और जियोगे। यह सुन कर
राजा ने अपने चित्त को एकाग्र कर परमेश्वर का नाम जपना शुरू किया और दोही घड़ी
में अपना काम बना लिया। (३) बड़ का पेड़ । (४) प्रेम । (५) बस्तु ।