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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

४० कबीरदास जी की बानी
प्रान अपान१ समान कर सुरती लौ लाई ।
दुहु बर कोट ढहाइया अरु तहँ बड़ खाई ॥११०८॥
भरम बुरज भाने सबै सोलह सुर धाई ।
सतरह सुरती हंसिनी सब खबरैं लाई ॥११०६॥
चढ़ा बिहंगम नाद भर निरगुन निरखानी ।
सिव साहब के लिंग पर गिर गंगा आनी ॥१११०॥
मान तलाई मालवे२ तिरबेनी तालं ।
गंगा जमुना सरसुती जब छुटी दयालं ॥११११॥
सिव साहब के लिंग पर तिरबेनी बूड़े ।
कलमष३ कसमल कट गये सब बंधन छूटे ॥१११२॥
परा नंद नित बूझहीं दरबार हमारे ।
अमृत की भाठी भरै कलमष कूँ जारै ॥१११३॥
ब्रह्म-रंध्र४ का घाट है घट मठ से न्यारा ।
सुरति हंसनी चढ़ गई लख पूरब द्वारा ॥१११४॥
सतगुरु मेरा महरमी काया धर आया ।
जिन्ह माटी के महल में निज ब्रह्म लखाया ॥१११५॥
बाहर भीतर एक है पल जोड़े प्रानी ।
हिरदे ही में देख ले वह अगम निसानी ॥१११६॥
सुन्न सलहला५ पंथ है पद पारख लीजै ।
जटा कुंडली जाइये अमृत रस पीजै ॥१११७॥
जटा कुंडली पर बसै सतपुरुष बनानी ।
जहँ समरथ का तख्त है धुन अनहद बानी ॥११८॥
जहँ वहँ रहन कबीर की निज मंदिर महली ।
चढ़ै सही गिर गिर परै वह पंथ सलहली ॥११६॥
पैड़ी पंथ न पग धरन कैसे कर जाऊँ ।
मिला रहै अरु ना मिलै कहँ सुरत लगाऊँ ॥१२०॥
(१) नीचे की वायु । (२) उपजाऊ देश । (३) पाप । (४) तीसरा तिल । (५) रपटीला ।