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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

२० गरीबदास जी की बानी
पारवती के उर धरा अमर भई छिन माँहँ ।
सुक की चौरासी मिटी निरालंब निज नाम१ ॥२४॥
अगम अनाहद भूमि है जहाँ नाम का दीप ।
एक पलक बिछुरै नहीं रहता नैनों बीच ॥२५॥
साहब साहब क्या करै साहब है परतीत ।
भैंस सींग साहब भया पाँड़े गावैं गीत२ ॥२६॥
राम सरीखा राम है संत सरीखे संत ।
नाम सरीखा नाम है नहीं आदि नहि अंत ॥२७॥
मांहमा सुन निज नाम की गहे द्रोपदी चीर ।
दुस्सासन से पचि रहे अंत न पाया बीर३ ॥२८॥
सेत बँधा पाहन तिरे४ गज पकड़े थे ग्राह५ ।
गनिका चढ़ी बिमान में६ निरगुन नाम मल्लाह ॥२६॥
(१) देखो नोट साखी नंबर २-४ “साध महिमा का अंग” [आगे] ।
(२) एक पाँड़े किसी महात्मा के पास उपदेश लेने गये । महात्मा ने पूछा तुम किसको
सब से अधिक प्यार करते हो । पाँड़े बोले एक भैंस को जिसे हमने पाला है । महात्मा ने
कहा कि उसी का ध्यान किया करो । पाँड़ेजी गुरु के कथन अनुसार अपनी भैंस के
ध्यान में लीन हो गये । यहाँ तक कि उनको ध्यान में भैंस नजर आने लगी । एक दिन
महात्मा ने उनको ध्यान के समय बुलाया, पाँड़े आँख मूँदे हुए बोले कि महाराज मैं घोंची
भैंस की सींग में फँस गया हूँ किस तरह बाहर निकलूँ । महात्मा ने ऐसी दृढ़ता ध्यान
की देख कर दया से पाँड़े से भैंस का ध्यान छुड़ा कर मालिक के ध्यान में लगा दिया
जिससे मालिक का मेला हो गया ।
(३) युधिष्ठिर पांडव, कौरवों के साथ जुआ खेलने में अपनी स्त्री द्रोपदी को हार गये
तब दुस्सासन नामी कौरव ने द्रोपदी को सभा में नंगी करने के लिये उसकी साड़ी खींची ।
ऐसे गाढ़ के अवसर पर द्रोपदी ने दीन होकर अपने इष्ट श्रीकृष्ण का स्मरण किया जिनके
प्रताप से साड़ी इतनी बढ़ती गई कि दुस्सासन खींचते खींचते हार गया पर उसका
अंत न पाया ।
(४) लङ्का और हिंदुस्तान के बीच में समुद्र पर पुल बाँधने के लिये बन्दर लोग राम
नाम लिख कर समुद्र में पत्थर फेंकते थे जो नाम के प्रभाव से तैरते थे और इस तरह
पुल तैयार होगया ।
(५) किसी नदी में एक हाथी को जो नहाने उतरा था मगर पकड़ कर खींचे लिये जाता
था, हाथी ने भगवान को टेरा तब उन्होंने प्रगट होकर उसको उबारा ।
(६) एक बेश्या को मरते समय जमदूत सता रहे थे कि एक साधू आ गये । बेश्या ने

सुमिरन का अंग २१
बरदी ढरी कबीर के भगित हेत के काज१।
सेऊ कूँ तो सिर दिया बेच बन्दगी नाज२ ॥३०॥
कहँ गोरख कहँ दत्त थे कहँ सुकदे कहँ ब्यास ।
भगित हेत से जानिये तीन लोक परकास ॥३१॥
कहँ पीपा कहँ नामदेव कहाँ धना बाजीद ।
कहँ रैदास कमाल थे कहँ थे फकर फरीद ॥३२॥
कहँ नानक दादू हुते कहँ ज्ञानी हरिदास ।
कहँ गोपीचंद भरथरी ये सब सतगुरु पास ॥३३॥
कहँ जंगी चरकट हुते कहाँ अधम सुलतान ।
भगति हेत परगट भये सतगुरु के परवान ॥३४॥
कहँ नारद प्रहलाद थे कहँ अंगद कहँ सेस ।
कहाँ बिभीखन ध्रुव हुते भगति हिरंबर पेस ॥३५॥
कहँ जयदेव थे कपिल मुनि कहँ रामानंद साध ।
कहँ दुरबासा कुस्न थे भगती आद अनाद ॥३६॥
कहँ ब्रह्मा अरु बेद थे कहँ सनकादिक चार ।
कहँ संभू अरु बिस्नु थे भगति हेत दीदार ॥३७॥
ऐसा निरमल नाम है निरमल करै सरीर ।
और ज्ञान मंडलीक३ हैं चकवै४ ज्ञान कबीर ॥३८॥
राम नाम सदनै पिया बकरे के उपदेस५ ।
अति बिलाप कर उनसे रक्षा माँगी। साधूजी ने उसे मंत्र उपदेश का अधिकारी न समझ
कर कहा कि वह नाम लो जो तोते को पढ़ाते हैं। वेश्या ने राम नाम लिया और उसके
उच्चारन करते ही बिमान आया जिस पर चढ़ कर वह बैकुंठ को सिधारी।
(१) देखो नोट साखी नंबर १० "भक्ति का अंग" (आगे)। (२) देखो नोट सफहा
१३। (३) छोटे छोटे मंडल के राजा। (४) चक्रवर्ती राजा। (५) सदन जाति के कसाई
एक भारी भक्त हुए हैं। कहते हैं कि एक बार उनके घर ऐसे समय पाहुन आया जब घर
में माँस न था। सदन ने चाहा कि एक बकरे का छोटा अंग काट के काम चला लिया
जाय इस पर बकरा बोला कि हमारे तुम्हारे सिर काटे का बैर चुकना है सो काट लो
४

२२ गरीबदास जी की बानी
अजामील से उद्धरे भगति बंदगी पेस१ ॥३९॥
नाम जलंधर२ ने लिया पारा रिष परवान ।
धन सतगुरु दाता धनी दई बंदगी दान ॥४०॥
गगन मंडल में रहत है अविनासी आलेख ।
जुगन जुगन सतसंग है धर धर खेलै भेख ॥४१॥
काया माया खंड है खंड राज अरु पाट ।
अमर नाम निज बंदगी सतगुरु से भई साँट ॥४२॥
अमर अनाहद नाम है निरभय अपरंपार ।
रहता रमता राम है सतगुरु चरन जुहार ॥४३॥
अविनासी निःचल सदा करता कूँ कुरबान ।
जाप अजपा जपत है गगन मंडल धर ध्यान ॥४४॥
बिन रसना है बंदगी बिन चस्में दीदार ।
बिन सरवन बानी सुनै निर्मल तत्त निहार ॥४५॥
मैं सौदागर नाम का टाँड़े पड़ा बहीर३ ।
लदते लदते लादिये बहुर न फेरा४ बीर ॥४६॥
और अंग नहीं काट सकते, यह सुन कर सदन को ज्ञान आया और तब से आप
जीव नहीं मारते थे बाजार से माँस मोल लेकर बेचते थे और एक सालिग्राम की बटिया
से जो जितना मांगे तौल देते थे । कथा है कि एक दिन एक ब्राह्मन सालिग्राम की
बटिया की ऐसी दुर्दशा देख कर सदन से माँग कर अपने घर लाया और प्रान
प्रतिष्ठा करके उसको सिंहासन पर पधारा । रात को सालिग्राम ने सपना दिया कि
हमको हमारे भक्त के पास जहाँ से लाया है पहुँचा दे हम वहीं प्रसन्न हैं ।
(१) अजामिल जाति का ब्राह्मण था पर अति कुकर्मी । एक दिन भाग से उसे साध
सेवा मिली और उसने दीनता करी जिस पर साध महात्मा ने बर दिया कि तुझको बेटा
होगा उसका नाम नारायण रखना इससे तेरा कल्याण हो जायगा । कुछ दिन पीछे बेटा
हुआ और उससे अजामिल को ऐसी प्रीति हुई कि एक दम सामने से न हटाता था और
मरते समय उसी का नाम नारायण रटता हुआ प्राण छोड़े और इस नाम के प्रताप से
स्वर्ग में बासा पाया ।
(२) जलंधर एक राक्षस था जिसे श्रीकृष्ण ने छल कर मारा और उनके प्रताप से
उसको ऊँचा स्थान मिला ।
(३) साज सामान । (४) आवागमन ।

सुमिरन का अंग २३
नाम बिना क्या होत है जप तप संजम ध्यान ।
बाहर भरमै मानवी अभि अंतर में जान ॥४७॥
उजल हिरंबर भग्ति है उजल हिरंबर सेव ।
उजल हिरंबर नाम है उजल हिरंबर देव ॥४८॥
नाम बिना निपजै नहीं जप तप करिहैं कोट ।
लख चौरासी त्यार है मूड़ मुड़ाया घोंट ॥४६॥
नाम सरोवर सार है सोहं सुरत लगाय ।
ज्ञान गलोचे बैठ कैर सुन्न सरोवर न्हाय ॥५०॥
मान सरोवर न्हायिये परमहंस का मेल ।
बिना चुँच मोती चुँगै अगम अगोचर खेल ॥५१॥
गगन मँडल में रमि रहा गलताना महबूब ।
वार पार नहिं छेव¹ है अबिचल मूरत खूब ॥५२॥
ऐसा सतगुरु सेइये जो नाम दृढ़ावे ।
भरमी गुरुवा मत मिलो जो मूल गँवावे ॥५३॥
सोहं सुरत लगाय ले गुन इंद्री से बंच ।
नाम लिया तब जानिये मिटे सकल परपंच ॥५४॥
नामै निःचल निरमला अनँत लोक में गाज ।
निरगुन सरगुन क्या कहै प्रगटा संतों काज ॥५५॥
अबिनासी के नाम में कौन नाम निज मूल ।
सुरत निरत से खोज ले बास बड़ी अक² फूल ॥५६॥
फूल सही सरगुन कहा निरगुन गंध सुगंध ।
मन माली के बाग में भँवर रहा कहँ बंध ॥५७॥
भँवर बिलंबा³ केतकी सहस कमलदल माहिं ।
जहाँ नाम निज नूर है मन माया तहँ नाहिं ॥५८॥
पंडित कोटि अनंत हैं ज्ञानी कोटि अनंत ।
स्रोता कोटि अनंत हैं बिरले साधू संत ॥५६॥
(१) आकार, खंड। (२) कि, या। (३) विलम रहा।

२४ गरीबदास जी की बानी
जिन्ह मिलते सुख उपजै मेटैं कोटि उपाध ।
भवन चतुरदस ढूँढ़िये परम सनेही साध ॥६०॥
राम सरीखे साध हैं साध सरीखे राम ।
सतगुरु को सिजदा करूँ जिन्ह दीन्हा निज नाम ॥६१॥
भगित बन्दगी जोग सब ज्ञान ध्यान परतीत ।
सुन्न सिखरगढ़ में रहै सतगुरु सब्द अतीत ॥६२॥
ऐसा सतगुरु सेइये पार उतारै हंस ।
भगित मुक्ति को देत है मिलि है सोहं बंस ॥६३॥
सोहं बंस बखानिये बिन दम देही जाप ।
सुरत निरत से अगम है लै समाध गरगाप ॥६४॥
सुरत निरत मन पवन पर सोहं साहं होय ।
सिव मंतर गौरी कहा अमर भई है सोय ॥६५॥
ररंकार तो धुन लगै सोहं सुरत समाय ।
हद बेहद पर बास है बहुरि न आवै जाय ॥६६॥
गुझ१ गायत्री नाम है बिन रसना धुन ध्याय ।
महिमा सनकादिक लही सिवसंकर बल जाय ॥६७॥
अजब महल बारीक है अजब सुरत बारीक ।
अजब निरत बारीक है महल धसे बिन बीक२ ॥६८॥
ऐसा राम अगाध है अबिनासी गंभीर ।
हद जीवों से दूर है बेहदियों के तीर ॥६६॥
ऐसा राम अगाध है बेकीमत करतार ।
सेस सहस फन रटत है अजहुँ न पाया पार ॥७०॥
ऐसा राम अगाध है अपरंपार अथाह ।
उर में कृत्रिम ख्याल है मौला अलख अलाह ॥७१॥
ऐसा राम अगाध है निरभय निःचल पीर ।
अनहद नाद अखंड धुन तन मन हीन सरीर ॥७२॥
(१) गुप्त । (२) डर ।

सुमिरन का अंग २५
ऐसा राम अगाध है बाजीगर भगवंत ।
निरसँध निरमल देखिया वार पार नहिं अंत ॥७३॥
पारब्रह्म बिन परख है कीमत मोल न तोल ।
बिना वजन अरु राग है बहुरंगी अनबोल ॥७४॥
महिमा अविगत नाम की जानत बिरले संत ।
आठ बखत सुबिधान१ है मुनि जन रटैं अनंत ॥७५॥
चंद सूर पानी पवन धरनी पोल अकास ।
पाँच तत्त हाजिर खड़े खिजमतदार खवास ॥७६॥
काल करम करे बंदगी महाकाल अरदास२ ।
मन माया अरु धरमराय सब सिर नाम उपास ॥७७॥
काल डरै करतार से मन माया का नास ।
चंदन अँग पलटै सबै खाली रह गया बाँस३ ॥७८॥
सजन सलोना राम है अब मत अंतहि जाय ।
बाहर भीतर एक है सब घट रहा समाय ॥७६॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी एक ।
आदि अंत जा के नहीं ज्यों का त्योंहीं देख ॥८०॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी ऐन ।
महिमा कही न जात है बोलै मधुरे बैन ॥८१॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आद ।
सतगुरु महरम तासु का साख भरत सब साध ॥८२॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी पीर ।
चरन कमल हंसा रहै हम हैं दामनगीर ॥८३॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आप ।
हद बेहद से अगम है जपते अजपा जाप ॥८४॥
(१) कमाई किये जाने लायक़ । (२) अर्जदाश्त । (३) मलयाचल में पर्वत में चन्दन
की सुगंध से सब वृक्ष चन्दन सरीखे हो जाते हैं पर बाँस का वृक्ष सुगंधित नहीं होता है ।

३६ गरीबदास जी की बानी
ऐसा भगली जोगिया जानत है सब खेल ।
बीन बजावै मोहनी जोग जंत्र सब मेल ॥८५॥
ब्रह्मादिक से मोहिया मोहे सेस गनेस ।
संकर की तारी लगी अडिग समाध हमेस ॥८६॥
गन गँधरप ज्ञानी गुनी अजब नवेला नेह ।
क्या महिमा कहूँ नाम की मिट गये सकल सँदेह ॥८७॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे नैनों मंझ ।
अलख पलक में खलक में सतगुरु सब्द समंझ ॥८८॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे हिरदे माहिं ।
चंद सूर ऊगै नहीं निस बासर जहँ नाहिं ॥८९॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे त्रिकुटी तीर ।
संख परम छबि चाँदनी बानी कोकिल कीर१ ॥६०॥
सुन्न बिदेसी बस रहा सहस कमल दल बाग ।
सोहं ध्यान समाध धुन और तीब्र बैराग ॥६१॥
सुमिरन तब ही जानिये जब रोम रोम धुनि होय ।
कुंज कमल में बैठ कर माला फेरे सोय ॥६२॥
सुरत सुमिरनी हाथ ले निरत मिले निरवान ।
ररंकार रमता लखै असल बंदगी ध्यान ॥६३॥
अष्ट कमल दल सुन्न है बाहर भीतर सुन्न ।
रोम रोम में सुन्न है जहाँ काल की धुन्न ॥६४॥
तुम्हीं सोहं सुरत हौ तुमही मन अरु पौन ।
इसमें दूसर कौन है आवै जाय सो कौन ॥६५॥
इसमें दूसर कर्म है बँधी अबिद्या गाँठ ।
पाँच पचीसो ले गई अपने अपने बाट ॥६६॥
नाम बिना सूना नगर पड़ा सकल में सोर ।
लूट न लूटी बंदगी हो गया हंसा भोर ॥६७॥
(१) तोता ।

भक्ति का अंग २७
अगम निगम कूँ खोज ले बुद्धि बिबेक बिचार ।
उदय अस्त का राज दे तौ बिन नाम बिगार ॥६८॥
ऐसा कौन अभागिया करै भजन कूँ भंग ।
लोहे से कंचन भया पारस के सतसंग ॥६६॥
॥ भक्ति का अंग ॥
पारस तुम्हरा नाम है लोहा हमरी जात ।
जड़ सेती जड़ पलटिया तुम कूँ केतिक बात ॥ १ ॥
बिना भगति क्या होत है ध्रू१ कूँ पूछे जाहि ।
सवासेर अन्न पावते अटल राज दिया ताहि ॥ २ ॥
बिना भगति क्या होत है कासी करवत२ लेह ।
मिटै नहीं मन बासना बहु विधि भरम संदेह ॥ ३ ॥
भगति बिना क्या होत है भरम रहा संसार ।
रत्ती कंचन पाय नहिं रावन चलती बार३ ॥ ४ ॥
संग सुदामा संत थे दारिद का दरियाव ।
कंचन महल बकस दिये तंदुल भेंट चढ़ाव४ ॥ ५ ॥
दो कौड़ी का जीव था सेना जात गुलाम ।
(१) ध्रुव राजा उत्तानपाद की बड़ी रानी के पुत्र थे जो अपनी छोटी रानी को अधिक
चाहता था । एक बार अपने पिता की गोद में जाकर बैठे जिस पर छोटी रानी ने यह
कह कर उठा दिया कि तुम्हारा ऐसा पुण्य नहीं है कि इस गोद में बैठो । ध्रुव के कलेजे
में यह बात लग गई और घर से निकल गये और नारद जी के उपदेश से मालिक की
भक्ति करके तारागण में सब से ऊँचा और अचल लोक पाया ।
(२) काशी में काशी करवत एक स्थान है जहाँ एक कुए में आरे लगे थे और लोग
उस पर मुक्ति के हेतु कट मरते थे ।
(३) कहते हैं कि लंका सोने की बनी थी लेकिन रावन जो राम द्रोही था मरते समय
खाली हाथ गया !
(४) सुदामा श्रीकृष्ण के गुरु-भाई थे परन्तु महा दरिद्र । एक बार अपनी स्त्री के कहने
से कुछ चावल श्रीकृष्ण की भेंट के लिये लेकर उनसे मिलने गये । श्रीकृष्ण ने आदर सत्कार
तो बहुत किया पर जाहिर में कुछ दिया नहीं । जब सुदामा घर को लौटे तो देखा कि
उनका कच्चा झोपड़ा सोने का महल बन गया है !

२८ गरीबदास जी की बानी
भगित हेत गृह आइया धरा सरूप हजाम१॥ ६ ॥
पीपा को परचा हुआ मिले भक्त भगवान ।
सीता मग जोवत रही द्वारावती निधान२ ॥ ७ ॥
धना भगत की धुन लगी बीज दिया जिन्ह आन ।
सूखा खेत हरा हुआ कंकर बोये जान३ ॥ ८ ॥
रैदास रँगीला रंग है दिये जनेऊ तोड़ ।
जग्य ज्योनार चोले धरे इक रैदास इक गौड़४ ॥ ९ ॥
(१) किसी राजा के यहाँ सेना नाऊ भक्त हजामत बनाने की नौकरी पर था।
एक दिन हजामत बनाने के लिए जा रहा था कि राह में साधू लोग मिल गये और
वह साधु-सेवा में लग गया, उसके बदले भगवान आप उस राजा की हजामत
बना आये।
(२) पीपा जी मागरौनगढ़ के राजा थे जो अपनी सीता नामक रानी के साथ साधू
हो गये और स्वामी रामानन्द जी से उपदेश लिया । इनकी प्रचण्ड भक्ति और महिमा
का भक्तमाल में बहुत वर्णन लिखा है । जिस कथा का गरीबदास जी की इस साखी में
इशारा है वह इस तरह पर है कि पीपाजी जी और उनकी स्त्री सीता द्वारका को गये और
वहाँ असली दिब्य द्वारका में पहुँच कर (जो समुद्र में डूब गई है) साक्षात् श्रीकृष्ण
का दर्शन पाने के हेतु एक दिन सीता के साथ समुद्र तट पर पहुँचे । यहाँ सीता को खड़ी
कर पीपा जी आप समुद्र में कूद कर गायब हो गये और सात दिन तक दर्शन का रस
और भगवान की प्रसादी छाप अपने शरीर पर लेकर आज्ञानुसार समुद्र से बाहर निकले
जहाँ सीता उनका रास्ता देख रही थी। पीपा जी ने यह छाप मंदिर के पुजारियों को
सौंप कर आज्ञा की कि जो लोग इस छाप को अपने शरीर पर लगावेंगे वह भगवत
पद पावेंगे।
(३) धना भक्त के पिता ने अपने पुत्र को खेत बोने के लिये बीज देकर भेजा। उसी
समय कुछ भूखे साधू आ गये, उन्हें धना ने सब बीज दे दिया और बाप के डर के मारे
खेत में कंकड़ बो दिये (एक जगह ऐसा लिखा है कि साधुओं के तुम्बों के बीज बो दिये)
फिर जाकर पिता को खबर दी कि खेत बो दिया। कुछ दिन पीछे पिता को नौकरों से
असल हाल मालूम हो गया और बड़े क्रोध में खेत पर गये पर वहाँ पहुँच कर क्या देखा
कि अन्न का खेत खूब लहलहा रहा है।
(४) चित्तौड़ की रानी ने जो रैदास जी की चेली थी एक बार काशी में किसी उत्सव
पर गौड़ ब्राह्मणों को न्योता दिया। ब्राह्मणों ने इनकार किया कि वह चमार की चेली
है हम उसके यहाँ भोजन नहीं कर सकते। इस पर रैदास जी ने उन लोगों को समझाया
कि राज धान्य में कुछ दोष नहीं है और हम कुछ उसे छूने न जायँगे फिर कौन सा
झगड़ा है। ब्राह्मण लोग काइल होकर राजी हो गये। जब खाने को बैठे और थोड़ा बहुत
खा चुके तो देखते क्या हैं कि पंगत में हर ब्राह्मण के इधर उधर एक एक रैदास (चमार)
हैं। ब्राह्मणों ने घबरा कर खाने से हाथ खींच लिया उस पर रैदास जी ने समझाया कि

भक्ति का अंग २६
माँझी मरद कबीर है जगत करै उपहास।
केसो बनजारा भया भगत बड़ाई दास१ ॥१०॥
सोहं ऊपर और है सत्त सुकृत इक नाम।
सब हंसों का बंस है सुन वस्ती नहिं गाम ॥११॥
सोहं ऊपर और है सुरत निरत का नाँव।
सोहं अंतर पैठ कर सत्त सुकृत लौ लाव ॥१२॥
सोहं ऊपर और है बिना मूल का फूल।
जा की गंध सुगंध है ता को पलक न भूल ॥१३॥
सोहं ऊपर और है बिन बोली का कंद।
नाम रसायन पीजिये अविचल अति आनंद ॥१४॥
सोहं ऊपर और है कोउ का जाने भेव।
गोप गोसाईं गैब धुन ता की कर ले सेव ॥१५॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत धुन ध्यान।
चार जुगन की बन्दगी एक पलक परमान ॥१६॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस ठौर।
संकर बकसा मिहर कर अमर भई तब गौर ॥१७॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस माहिं।
एक पलक तहँ संचरै कोटि पाप अध जाहिं ॥१८॥
अविगत की अविगत कथा अविगत है सब ख्याल।
अविगत सों अविगत मिलै कर जोरै तब काल ॥१६॥

डरो मत और नाखून से अपने कांधे की चमड़ी चीर कर दिव्य जनेऊ दिखा कर हँसते
हुए वहाँ से चल दिये । इस महिमा को देख कर ब्राह्मणों ने फिर भोजन किया - (देखो
जीवन-चरित्र रैदास जी बानो में) ।
(१) काशी के पंडित जो कबीर साहब से बहुत द्वेष रखते थे उन्होंने एक बार नगर
भर में यह मशहूर कर दिया कि आज कबीर के यहाँ सब भूखों और कंगलों को पाँच
पाँच सेर अन्न बटेगा, यह सुनकर हज़ारों आदमी की भीड़ उनके दरवाजे पर जमा
हुई। कबीर साहब चुपचाप किसी बहाने से बाहर चले गये और उनके पीछे भगवान
बनजारे का रूप धरे बहुत से बैल अन्न से लदे हुए वहाँ छोड़ गये जो कंगलों को उनकी
आशा से अधिक बाँटा गया ।
५

३० गरीबदास जी की बानी
अमर अनूपम आप है और सकल है खंड।
सूच्छम से सूच्छम मही पूरन पद परचंड ॥२०॥
अधम उधारन भगित है अधम उधारन नाँव।
अधम उधारन संत हैं जिनके मैं बल जावँ ॥२१॥
गज गनिका अरु भीलनी सेवरी प्रेम सहेत।
केते पतित उधारिया सतगुरु गावै नेत ॥२२॥
राम रसायन पीजिये यहि औसर यहि दाव।
फिर पीछे पछतायगा चला चली हो जाव ॥२३॥
राम रसायन पीजिये चोखा फूल चुवाय।
सुन्न सरोवर हंस मन पीया प्रेम अघाय ॥२४॥
कहता दास गरीब है बाँदी-जाद१ गुलाम।
तुम हो तैसी कीजिये भक्ति हिरंबर नाम ॥२५॥
॥ बिनती का अंग॥
साहब मेरी बीनती सुनो गरीब निवाज।
जल की बूँद महल रचा भला बनाया साज ॥ १ ॥
साहब मेरी बीनती सुनिये अर्स अवाज।
मादर पिदर करीम तू पुत्र पिता को लाज ॥ २ ॥
साहब मेरी बीनती कर जोरैं करतार।
तन मन धन कुरबान है दीजै मोहिं दीदार ॥ ३ ॥
पाँच तत्त के महल में नौ तत का इक और।
नौ तत से इक अगम है पारब्रह्म की पौर ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पवन कूँ करो एकत्तर२ यार।
द्वादस उलट समोय ले दिल अंदर दीदार ॥ ५ ॥
चार पदारथ महल में सुरत निरत मन पौन।
सिव द्वारा खुलि है जबै दरसै चौदह भौन ॥ ६ ॥
(१) ख़ानाज़ाद् । (२) इकट्ठा ।

बिनती का अंग ३१
सील संतोष बिबेक बुध दया धर्म इकतार ।
अकल यकीन इमान रख गही बस्तु निज सार ॥ ७ ॥
साहब तेरी साहबी कैसे जानी जाय ।
त्रिसरेणू१ से भीन है नैनौँ रहा समाय ॥ ८ ॥
अनँत कोटि ब्रह्मांड का रचनहार जगदीस ।
ऐसा सूच्छम रूप धर आन बिराजा सीस ॥ ६ ॥
साहब पुरुष करीम तूँ अविगत अपरंपार ।
पल पल माँहैं बंदगी निरधारौँ आधार ॥१०॥
दरदमंद दरवेस तूँ दिल दाना महबूब ।
अचल बिसंभर बस रहा सूरत मूरत खूब ॥११॥
साँस सुरत के मद्ध है न्यारा कभी न होय ।
ऐसा साछीभूत है सुरत निरंतर जोय ॥१२॥
सुरत निरत से भीन है जगन्नाथ जगदीस ।
त्रिकुटी छाजै पुर रहै है ईसन का ईस ॥१३॥
कोटि जग्य असुमेध कर एक पलक धर ध्यान ।
षट दल के री बन्दगी नहीं जग्य उनमान ॥१४॥
जित सेतीं दम ऊचरै सुरत तहाँई लाय ।
नाभी कुंडल नाद है त्रिकुटि कमल समाय ॥१५॥
अठसठ तीरथ भरमना भटक मुआ संसार ।
बारह बानी२ ब्रह्म है जाका करो बिचार ॥१६॥
अठसठ तीरथ जाइये मेले बड़ा मिलाप ।
पत्थर पानी पूजते साध संत मिल जाप ॥१७॥
सनकादिक सेवन करै सुकदे बोलै साख ।
कोटि ग्रन्थ का अरथ है सुरत ठिकाने राख ॥१८॥
( १ ) तीन परमाणु का एक त्रिसरेणु होता है। ( २ ) छः कमल पिण्ड के और छः
ब्रह्मांड के।

३३ गरीबदास जी की बानी
साहब तेरी साहबी कहा कहूँ करतार ।
पलक पलक की दीठ में पूरन ब्रह्म हमार ॥१९॥
एते करता कहाँ हैं वह तो साहब एक ।
जैसे फूटी आरसी टूक टूक में देख ॥२०॥
करौं बीनती बंदगी साहब पुरुष सुभान१ ।
संख असंखों बरन है कैसे रचा जहान ॥२१॥
साहब तेरी साहबी समझ परै नहिँ मोहिँ ।
एता रूप जहान जग कैसे सिरजा तोहिँ ॥२२॥
एक बीज इक बिंदु है एक महल इक द्वार ।
चरन कमल कुरबान जाँ सिरजे रूप अपार ॥२३॥
मौला जल से थल करै थल से जल कर देत ।
साहब तेरी साहबी स्याम कहूँ की सेत ॥२४॥
साहब मेरा मिहरबाँ सुनिये अरस अवाज ।
पंजा राखो सीस पर जसहीँ होत तिरास ॥२५॥
मादर पिदर परान तँू साहब समरथ आप ।
रोम रोम धुन होत है सब्द सिंधु परकास ॥२६॥

बिनती का अंग ३३
ओं अरु सोहं सार है मूल फूल परबेस ।
सिव ब्रह्मादिक रटत हैं ध्यान धरत है सेस ॥३२॥
मैं समरथ के आसरे दमक दमक करतार ।
गफ़लत मेरी दूर कर खड़ा रहूँ दरबार ॥३३॥
सुनो पुरुष मेरी बीनती साहब दीन-दयाल ।
पतित-उधारन साइयाँ तुम हो नजर निहाल ॥३४॥
समरथ का सरना लिया ताहि न चाँपै काल ।
पारब्रह्म का ध्यान धर होत न बाँका बाल ॥३५॥
नागदमन¹ निरगुन जड़ी ऐसा तुम्हरा नाम ।
तच्छक तीछा डरत है हर दम जप ले नाम ॥३६॥
आतम इंद्री कारने मत भटकावै मोहिं ।
जगन्नाथ जगदीस गुरु सरना आया तोहिं ॥३७॥
चरन कमल के ध्यान से कोटि बिघन टल जाहिं ।
राजा होवै लोक का जहाँ परै हुम² छाँहि ॥३८॥
हुमा छाँह जा पर परै पिरथी-नाथ कहाय ।
पसु पंछी आदम सबै सनमुख परखै ताय ॥३६॥
दिब्य-दृष्टि देवा दयाल सतगुरु संत सुजान ।
तिरलोकी के जीव कूँ परख लेत परवान ॥४०॥
अगले पिछले जन्म कूँ जानत है जगदीस ।
मुंडमाल सिव के गले पहिर रहे ज्यों ईस³ ॥४१॥
करुनामई करीम जप अलह अलख का ध्यान ।
सत्त पुरुष सुख सिंधु में जपत समाने प्रान ॥४२॥
दम सूँ दम कूँ समझ ले उठत बैठ आराध ।
रंचक ध्यान समान सुध पूरन सकल मुराद ॥४३॥
(१) नाम साँप की जड़ी का । (४) हुमा चिड़िया जिसकी निसबत कहते हैं कि उसका
साया पड़ने से आदमी बादशाह हो जाता है । (३) एक समय पारवती जी ने शिवजी से
पूछा कि यह मुंडमाल जो आप पहिने हुए हैं उसमें किन किन के सिर हैं । शिव जी

३४ गरीबदास जी की बानी
अर्ध नाम कुंजर जपा भया ग्राह से पार१।
उभय घड़ी खट्वाँग जप ऐसा नाम उच्चार२ ॥४४॥
अनंत कोटि ब्रह्मांड में बटक३ बीज विस्तार ।
सुरत सरूपी पुरुष है तन मन धन सब वार ॥४५॥
सुन्न सपेदा स्याम है भूर भद्र बैराट ।
तिल प्रमान में पैठ कर उतरो औघट घाट ॥४६॥
रतन अमोली फूल है सो साहब के सीस ।
जो रंग नहीं स्रिष्टि में देखा बिस्वे बीस ॥४७॥
कोटि ध्यान असनान कर कोटि जोग बैराग ।
कोटि कुटुम्ब गृह तज गये दरसत ना अनुराग ॥४८॥
राग४ रूप रघुबीर है छाँह धूप से न्यार ।
सात स्वर्ग पर सो तपै कैसे हो दीदार ॥४६॥
सतगुरु अर्थ५ बिवान है हिरदे बैठा आय ।
जब वा खोलै चाँदनी पल में देह लखाय ॥५०॥
सतगुरु के सदके करूँ अनंत कोटि ब्रह्मांड ।
निरगुन नाम निरंजना मेटत है जम दंड ॥५१॥
सतगुरु के सदके करूँ तन मन धन कुरबान ।
दिल के अन्दर देहरा तहाँ मिले भगवान ॥५२॥
दिल के अन्दर देहरा जा देवल में देव ।
हरदम साखी-भूत है करो तासु की सेव ॥५३॥
जल का महल बनाइया धन समरथ साँई ।
कारीगर कुरबान जाँ कुछ कीमत नाँई ॥५४॥


बोले कि तुम हमको इतनी प्रिय हो कि जितने जन्म तुमने धरे हैं तुम्हारे हर एक शरीर
का मुंड मैंने अपने गले में डाल रक्खा है।
(१) देखो नोट पृष्ठ २० । (२) राजा खट्वांग से किसी समय में देवता लोगों ने
अति प्रसन्न होकर कहा कि जो चाहो सो बरदान माँगो । राजा बोले पहिले यह बतलाइये
मेरी उमर कितनी बाकी है। देवताओं ने कहा सिर्फ दो घड़ी और जियोगे। यह सुन कर
राजा ने अपने चित्त को एकाग्र कर परमेश्वर का नाम जपना शुरू किया और दोही घड़ी
में अपना काम बना लिया। (३) बड़ का पेड़ । (४) प्रेम । (५) बस्तु ।

बिन्ती का अंग २५
कोट जतन कर राखिया जठरा के माईं।
गर्भबास की बीनती सुनि पुरुष गुसाईं ॥५५॥
नैन नाक मुख स्रवन लै सब साज बनाया।
दस्त चरन चिन्तामनी परिपूरन काया ॥५६॥
कली कली कर जोड़िया नाड़ी निरवाना।
दस सहस्र का बन्ध लाय नाभी असथाना ॥५७॥
तालू कंठ भिरकुटी रसना मुख माईं।
दाढ़ अरु दंत बनाइया धन अलख गुसाईं ॥५८॥
पलकों के छज्जे बने मुँह महल मुँडेरे।
जै जै जै जगदीस तूँ धन साहब मेरे ॥५६॥
ग्रीवा१ हाड़ी रुधिर में ले संधि मिलाई।
ऊपर चाम लपेट कर नख रोम बनाई ॥६०॥
तलुवे एड़ी आँगुली पिंडरी परवाना।
जोड़े जाँघ बनाइया कादिर कुरबाना ॥६१॥
कमर करंक२ करीम ने क्या जोड़ लगाई।
नस नाड़ी का बँध दे गिरह गाँठ बँधाई ॥६२॥
पेट पीठ पूरन किये परमानन्द स्वामी।
भुजा खवे कुहनी बनी समरथ धन नामी ॥६३॥
आँत उदर में राख कर क्या परदा कीन्हा।
एक द्वार दो देहरी अन जल का सीना ॥६४॥
अष्ट कमल दल आरती हरदम हर होई।
नाभि कमल में प्रान नाथ राखे निरमोई ॥६५॥
माया की बुरकी३ पड़ी मारग नहिं पावै।
दस इंद्री लारै लगी अब कौन छुटावै ॥६६॥
बड़वा नल का द्वार है नाभी के नीचे।
जो सतगुरु भेदी मिलै तहँ अमृत सींचे ॥६७॥
(१) गरदन। (२) हड्डी का पिंजरा। (३) परदा।

३६ गरीबदास जी की बानी
जठर अगिन जा कूँ कहैं जो छूधा लावै ।
जल से तिरखा ना मिटै कोई भेदी पावै ॥६८॥
तीन पेच हैं कुँहलिनी नाभी के पासा ।
जा के मुख से नीकले जल अगिन अकासा ॥६६॥
मल मूतर की कोथली१ दो न्यारी कीन्ही ।
दम का दगड़ा२ गगन कूँ ऐसा परबीनी ॥७०॥
मन माया मौजूद है काया गढ़ माहीं ।
बीच पुरंजन३ बसत है सो पावै नाहीं ॥७१॥
पाँच भार४ जो आदि है जा के सँग डोलै ।
तीन लोक कूँ खा गई मुख से नहिं बोलै ॥७२॥
बड़ी कुसंगन सुपचनी५ सुध बुध बिसरावै ।
चिंता चेरी चूहरी५ नित नाद बजावै ॥७३॥
महा दरिद्र की गाँठ बाँध आगे धर देवै ।
तीन लोक के चिंत कूँ निस बासर सेवै ॥७४॥
काम क्रोध रसिया जहाँ मद मोह मवासी ।
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बिनती का अंग ३७
तीन लोक की मेदनी१ सब हाजिर होई ।
मन रंगी के रंग में रंगा सब कोई ॥८०॥
आसन असथल उठ गये कुछ पिंड न प्राना ।
फेर पुरंजन आनकर घाला घमसाना ॥८१॥
दुरमति दूती और है इक दारुन माया ।
जैसे काँजी२ दूध में घृत खंड कराया ॥८२॥
द्वादस कोटि कटक चढ़े कुछ गिनती नाहीं ।
लालच नीचन की बहै जिन फौजाँ माहीं ॥८३॥
संसा सोच सराय में सूतक दिन राती ।
जीवतही जूती परैं जम तोरै छाती ॥८४॥
रहजन कोटि अनंत हैं काया गढ़ माहीं ।
ममता माया बिस्तरी तिर्गुन तन माहीं ॥८५॥
बाँकी फौज पुरंजना कुछ पार न पावै ।
मन राजा के राज में क्या भगति करावै ॥८६॥
मन के मारे मुनि बहे नारद से ज्ञानी ।
सिंगी रिषि पारासरा कीन्हे रजधानी ॥८७॥
चढ़े पुरंजन इंद्र पर कर धाई धाई ।
गौतम रिषि की इस्तरी सँग कीन्हा जाई३ ॥८८॥
नारि अहल्या सूँ रते सुरपति से देवा ।
इंद्र सहस भग होगये कुछ ख्याल न भेवा३ ॥८६॥
(१) पृथ्वी । (२) सिरका ।
(३) एक बार देवराज इन्द्र का मन गौतम ऋषि की स्त्री अहिल्या को देख कर
मोहित हो गया । विचार किया कि यह सुन्दरी हम को कैसे प्राप्त हो क्योंकि सिवाय बड़े
तड़के स्नान के हेतु और कभी ऋषि जी घर से बाहर जाते नहीं । तब आधी रात को
मुरगा का रूप धर कुकरूँकूँ की आवाज दी । ऋषि जी यह समझ कर कि सबेरा हो गया
घबरा कर जागे और गंगा स्नान करने चले गये । इन्द्र गौतम का रूप धारण करके
अहिल्या के पास आये और कहा कि अभी रात बहुत है स्नान की बेला नहीं है इस लिये
हम लौट आये, यह कह कर अहिल्या के संग भोग किया । जाते समय गौतम जी भी
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४० कबीरदास जी की बानी
प्रान अपान१ समान कर सुरती लौ लाई ।
दुहु बर कोट ढहाइया अरु तहँ बड़ खाई ॥११०८॥
भरम बुरज भाने सबै सोलह सुर धाई ।
सतरह सुरती हंसिनी सब खबरैं लाई ॥११०६॥
चढ़ा बिहंगम नाद भर निरगुन निरखानी ।
सिव साहब के लिंग पर गिर गंगा आनी ॥१११०॥
मान तलाई मालवे२ तिरबेनी तालं ।
गंगा जमुना सरसुती जब छुटी दयालं ॥११११॥
सिव साहब के लिंग पर तिरबेनी बूड़े ।
कलमष३ कसमल कट गये सब बंधन छूटे ॥१११२॥
परा नंद नित बूझहीं दरबार हमारे ।
अमृत की भाठी भरै कलमष कूँ जारै ॥१११३॥
ब्रह्म-रंध्र४ का घाट है घट मठ से न्यारा ।
सुरति हंसनी चढ़ गई लख पूरब द्वारा ॥१११४॥
सतगुरु मेरा महरमी काया धर आया ।
जिन्ह माटी के महल में निज ब्रह्म लखाया ॥१११५॥
बाहर भीतर एक है पल जोड़े प्रानी ।
हिरदे ही में देख ले वह अगम निसानी ॥१११६॥
सुन्न सलहला५ पंथ है पद पारख लीजै ।
जटा कुंडली जाइये अमृत रस पीजै ॥१११७॥
जटा कुंडली पर बसै सतपुरुष बनानी ।
जहँ समरथ का तख्त है धुन अनहद बानी ॥११८॥
जहँ वहँ रहन कबीर की निज मंदिर महली ।
चढ़ै सही गिर गिर परै वह पंथ सलहली ॥११६॥
पैड़ी पंथ न पग धरन कैसे कर जाऊँ ।
मिला रहै अरु ना मिलै कहँ सुरत लगाऊँ ॥१२०॥
(१) नीचे की वायु । (२) उपजाऊ देश । (३) पाप । (४) तीसरा तिल । (५) रपटीला ।

बिनती का अंग ४१
ऊँची भुमि अकास मठ जहँ जाय न कोई।
सुरत निरत से अगम है धुन ध्यान समोई ॥१२१॥
दरस परस देवल धजा फरकै दिन राती।
जोत अखंडित जगमगै दीपक बिन बाती ॥१२२॥
नभ से न्यारा नूर है झीने से झीना।
ज्ञान ध्यान की गम नहीं परखै परबीना ॥१२३॥
संख कलप जुग होगये जो टरै न टारा।
खड़ग बान बेधे नहीं है अधर अधारा ॥१२४॥
पत्थर में हीरा चलै धन धरती जानै।
लाख लोग पासै खड़े दरसत पाषानै ॥१२५॥
सात आवरण बेधिहै जो पावै हीरा।
काया में से उड़ चले पलकों के तीरा ॥१२६॥
उरगन¹ हीरा गह लिया सुरती घर आना।
सेत धजा देवल खिमै² जहँ कोट निसाना ॥१२७॥
कमल रूप करतार है नैनों के माहीं।
सातो कमल सरीर में वह न्यारा साँई ॥१२८॥
जागत सोवत है नहीं कछु खाय न पीवै।
चिरंजीव चिंतामनी जो बहु जुग जीवै ॥१२९॥
काल कर्म आगे खड़े लावै जिस लागै।
भगली भगल उचारिहै बिद्या अनुरागै ॥१३०॥
काल कर्म आगे खड़े नित नाच कराहीं।
भगली भावै सो करै जा की गम नाहीं ॥१३१॥
पलक बीच पैमाल³ है सब खंड ब्रह्मंडा।
अजब नबेली मेदनी⁴ छिन में परचंडा ॥१३२॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस से कँपैं दिन राती।
निर्दावै⁵ सोई भये जिस काल न खाती ॥१३३॥
(१) साँप । (२) झलकै । (३) नाश (४) पृथ्वी (५) निर्भय ।