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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

भक्ति का अंग २७
अगम निगम कूँ खोज ले बुद्धि बिबेक बिचार ।
उदय अस्त का राज दे तौ बिन नाम बिगार ॥६८॥
ऐसा कौन अभागिया करै भजन कूँ भंग ।
लोहे से कंचन भया पारस के सतसंग ॥६६॥
॥ भक्ति का अंग ॥
पारस तुम्हरा नाम है लोहा हमरी जात ।
जड़ सेती जड़ पलटिया तुम कूँ केतिक बात ॥ १ ॥
बिना भगति क्या होत है ध्रू१ कूँ पूछे जाहि ।
सवासेर अन्न पावते अटल राज दिया ताहि ॥ २ ॥
बिना भगति क्या होत है कासी करवत२ लेह ।
मिटै नहीं मन बासना बहु विधि भरम संदेह ॥ ३ ॥
भगति बिना क्या होत है भरम रहा संसार ।
रत्ती कंचन पाय नहिं रावन चलती बार३ ॥ ४ ॥
संग सुदामा संत थे दारिद का दरियाव ।
कंचन महल बकस दिये तंदुल भेंट चढ़ाव४ ॥ ५ ॥
दो कौड़ी का जीव था सेना जात गुलाम ।
(१) ध्रुव राजा उत्तानपाद की बड़ी रानी के पुत्र थे जो अपनी छोटी रानी को अधिक
चाहता था । एक बार अपने पिता की गोद में जाकर बैठे जिस पर छोटी रानी ने यह
कह कर उठा दिया कि तुम्हारा ऐसा पुण्य नहीं है कि इस गोद में बैठो । ध्रुव के कलेजे
में यह बात लग गई और घर से निकल गये और नारद जी के उपदेश से मालिक की
भक्ति करके तारागण में सब से ऊँचा और अचल लोक पाया ।
(२) काशी में काशी करवत एक स्थान है जहाँ एक कुए में आरे लगे थे और लोग
उस पर मुक्ति के हेतु कट मरते थे ।
(३) कहते हैं कि लंका सोने की बनी थी लेकिन रावन जो राम द्रोही था मरते समय
खाली हाथ गया !
(४) सुदामा श्रीकृष्ण के गुरु-भाई थे परन्तु महा दरिद्र । एक बार अपनी स्त्री के कहने
से कुछ चावल श्रीकृष्ण की भेंट के लिये लेकर उनसे मिलने गये । श्रीकृष्ण ने आदर सत्कार
तो बहुत किया पर जाहिर में कुछ दिया नहीं । जब सुदामा घर को लौटे तो देखा कि
उनका कच्चा झोपड़ा सोने का महल बन गया है !