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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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सुमिरन का अंग २३
नाम बिना क्या होत है जप तप संजम ध्यान ।
बाहर भरमै मानवी अभि अंतर में जान ॥४७॥
उजल हिरंबर भग्ति है उजल हिरंबर सेव ।
उजल हिरंबर नाम है उजल हिरंबर देव ॥४८॥
नाम बिना निपजै नहीं जप तप करिहैं कोट ।
लख चौरासी त्यार है मूड़ मुड़ाया घोंट ॥४६॥
नाम सरोवर सार है सोहं सुरत लगाय ।
ज्ञान गलोचे बैठ कैर सुन्न सरोवर न्हाय ॥५०॥
मान सरोवर न्हायिये परमहंस का मेल ।
बिना चुँच मोती चुँगै अगम अगोचर खेल ॥५१॥
गगन मँडल में रमि रहा गलताना महबूब ।
वार पार नहिं छेव¹ है अबिचल मूरत खूब ॥५२॥
ऐसा सतगुरु सेइये जो नाम दृढ़ावे ।
भरमी गुरुवा मत मिलो जो मूल गँवावे ॥५३॥
सोहं सुरत लगाय ले गुन इंद्री से बंच ।
नाम लिया तब जानिये मिटे सकल परपंच ॥५४॥
नामै निःचल निरमला अनँत लोक में गाज ।
निरगुन सरगुन क्या कहै प्रगटा संतों काज ॥५५॥
अबिनासी के नाम में कौन नाम निज मूल ।
सुरत निरत से खोज ले बास बड़ी अक² फूल ॥५६॥
फूल सही सरगुन कहा निरगुन गंध सुगंध ।
मन माली के बाग में भँवर रहा कहँ बंध ॥५७॥
भँवर बिलंबा³ केतकी सहस कमलदल माहिं ।
जहाँ नाम निज नूर है मन माया तहँ नाहिं ॥५८॥
पंडित कोटि अनंत हैं ज्ञानी कोटि अनंत ।
स्रोता कोटि अनंत हैं बिरले साधू संत ॥५६॥
(१) आकार, खंड। (२) कि, या। (३) विलम रहा।