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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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२४ गरीबदास जी की बानी
जिन्ह मिलते सुख उपजै मेटैं कोटि उपाध ।
भवन चतुरदस ढूँढ़िये परम सनेही साध ॥६०॥
राम सरीखे साध हैं साध सरीखे राम ।
सतगुरु को सिजदा करूँ जिन्ह दीन्हा निज नाम ॥६१॥
भगित बन्दगी जोग सब ज्ञान ध्यान परतीत ।
सुन्न सिखरगढ़ में रहै सतगुरु सब्द अतीत ॥६२॥
ऐसा सतगुरु सेइये पार उतारै हंस ।
भगित मुक्ति को देत है मिलि है सोहं बंस ॥६३॥
सोहं बंस बखानिये बिन दम देही जाप ।
सुरत निरत से अगम है लै समाध गरगाप ॥६४॥
सुरत निरत मन पवन पर सोहं साहं होय ।
सिव मंतर गौरी कहा अमर भई है सोय ॥६५॥
ररंकार तो धुन लगै सोहं सुरत समाय ।
हद बेहद पर बास है बहुरि न आवै जाय ॥६६॥
गुझ१ गायत्री नाम है बिन रसना धुन ध्याय ।
महिमा सनकादिक लही सिवसंकर बल जाय ॥६७॥
अजब महल बारीक है अजब सुरत बारीक ।
अजब निरत बारीक है महल धसे बिन बीक२ ॥६८॥
ऐसा राम अगाध है अबिनासी गंभीर ।
हद जीवों से दूर है बेहदियों के तीर ॥६६॥
ऐसा राम अगाध है बेकीमत करतार ।
सेस सहस फन रटत है अजहुँ न पाया पार ॥७०॥
ऐसा राम अगाध है अपरंपार अथाह ।
उर में कृत्रिम ख्याल है मौला अलख अलाह ॥७१॥
ऐसा राम अगाध है निरभय निःचल पीर ।
अनहद नाद अखंड धुन तन मन हीन सरीर ॥७२॥
(१) गुप्त । (२) डर ।