गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुमिरन का अंग २५
ऐसा राम अगाध है बाजीगर भगवंत ।
निरसँध निरमल देखिया वार पार नहिं अंत ॥७३॥
पारब्रह्म बिन परख है कीमत मोल न तोल ।
बिना वजन अरु राग है बहुरंगी अनबोल ॥७४॥
महिमा अविगत नाम की जानत बिरले संत ।
आठ बखत सुबिधान१ है मुनि जन रटैं अनंत ॥७५॥
चंद सूर पानी पवन धरनी पोल अकास ।
पाँच तत्त हाजिर खड़े खिजमतदार खवास ॥७६॥
काल करम करे बंदगी महाकाल अरदास२ ।
मन माया अरु धरमराय सब सिर नाम उपास ॥७७॥
काल डरै करतार से मन माया का नास ।
चंदन अँग पलटै सबै खाली रह गया बाँस३ ॥७८॥
सजन सलोना राम है अब मत अंतहि जाय ।
बाहर भीतर एक है सब घट रहा समाय ॥७६॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी एक ।
आदि अंत जा के नहीं ज्यों का त्योंहीं देख ॥८०॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी ऐन ।
महिमा कही न जात है बोलै मधुरे बैन ॥८१॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आद ।
सतगुरु महरम तासु का साख भरत सब साध ॥८२॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी पीर ।
चरन कमल हंसा रहै हम हैं दामनगीर ॥८३॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आप ।
हद बेहद से अगम है जपते अजपा जाप ॥८४॥
(१) कमाई किये जाने लायक़ । (२) अर्जदाश्त । (३) मलयाचल में पर्वत में चन्दन
की सुगंध से सब वृक्ष चन्दन सरीखे हो जाते हैं पर बाँस का वृक्ष सुगंधित नहीं होता है ।