गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुमिरन का अंग २१
बरदी ढरी कबीर के भगित हेत के काज१।
सेऊ कूँ तो सिर दिया बेच बन्दगी नाज२ ॥३०॥
कहँ गोरख कहँ दत्त थे कहँ सुकदे कहँ ब्यास ।
भगित हेत से जानिये तीन लोक परकास ॥३१॥
कहँ पीपा कहँ नामदेव कहाँ धना बाजीद ।
कहँ रैदास कमाल थे कहँ थे फकर फरीद ॥३२॥
कहँ नानक दादू हुते कहँ ज्ञानी हरिदास ।
कहँ गोपीचंद भरथरी ये सब सतगुरु पास ॥३३॥
कहँ जंगी चरकट हुते कहाँ अधम सुलतान ।
भगति हेत परगट भये सतगुरु के परवान ॥३४॥
कहँ नारद प्रहलाद थे कहँ अंगद कहँ सेस ।
कहाँ बिभीखन ध्रुव हुते भगति हिरंबर पेस ॥३५॥
कहँ जयदेव थे कपिल मुनि कहँ रामानंद साध ।
कहँ दुरबासा कुस्न थे भगती आद अनाद ॥३६॥
कहँ ब्रह्मा अरु बेद थे कहँ सनकादिक चार ।
कहँ संभू अरु बिस्नु थे भगति हेत दीदार ॥३७॥
ऐसा निरमल नाम है निरमल करै सरीर ।
और ज्ञान मंडलीक३ हैं चकवै४ ज्ञान कबीर ॥३८॥
राम नाम सदनै पिया बकरे के उपदेस५ ।
अति बिलाप कर उनसे रक्षा माँगी। साधूजी ने उसे मंत्र उपदेश का अधिकारी न समझ
कर कहा कि वह नाम लो जो तोते को पढ़ाते हैं। वेश्या ने राम नाम लिया और उसके
उच्चारन करते ही बिमान आया जिस पर चढ़ कर वह बैकुंठ को सिधारी।
(१) देखो नोट साखी नंबर १० "भक्ति का अंग" (आगे)। (२) देखो नोट सफहा
१३। (३) छोटे छोटे मंडल के राजा। (४) चक्रवर्ती राजा। (५) सदन जाति के कसाई
एक भारी भक्त हुए हैं। कहते हैं कि एक बार उनके घर ऐसे समय पाहुन आया जब घर
में माँस न था। सदन ने चाहा कि एक बकरे का छोटा अंग काट के काम चला लिया
जाय इस पर बकरा बोला कि हमारे तुम्हारे सिर काटे का बैर चुकना है सो काट लो
४