गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ गरीबदास जी की बानी
ऐसा भगली जोगिया जानत है सब खेल ।
बीन बजावै मोहनी जोग जंत्र सब मेल ॥८५॥
ब्रह्मादिक से मोहिया मोहे सेस गनेस ।
संकर की तारी लगी अडिग समाध हमेस ॥८६॥
गन गँधरप ज्ञानी गुनी अजब नवेला नेह ।
क्या महिमा कहूँ नाम की मिट गये सकल सँदेह ॥८७॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे नैनों मंझ ।
अलख पलक में खलक में सतगुरु सब्द समंझ ॥८८॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे हिरदे माहिं ।
चंद सूर ऊगै नहीं निस बासर जहँ नाहिं ॥८९॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे त्रिकुटी तीर ।
संख परम छबि चाँदनी बानी कोकिल कीर१ ॥६०॥
सुन्न बिदेसी बस रहा सहस कमल दल बाग ।
सोहं ध्यान समाध धुन और तीब्र बैराग ॥६१॥
सुमिरन तब ही जानिये जब रोम रोम धुनि होय ।
कुंज कमल में बैठ कर माला फेरे सोय ॥६२॥
सुरत सुमिरनी हाथ ले निरत मिले निरवान ।
ररंकार रमता लखै असल बंदगी ध्यान ॥६३॥
अष्ट कमल दल सुन्न है बाहर भीतर सुन्न ।
रोम रोम में सुन्न है जहाँ काल की धुन्न ॥६४॥
तुम्हीं सोहं सुरत हौ तुमही मन अरु पौन ।
इसमें दूसर कौन है आवै जाय सो कौन ॥६५॥
इसमें दूसर कर्म है बँधी अबिद्या गाँठ ।
पाँच पचीसो ले गई अपने अपने बाट ॥६६॥
नाम बिना सूना नगर पड़ा सकल में सोर ।
लूट न लूटी बंदगी हो गया हंसा भोर ॥६७॥
(१) तोता ।