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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

१४ गरीबदास जी की बानी
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु कूँ दान।
मेरा मेरी छाँड़ दे यही गुप्त है दान ॥५०॥
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु की भेंट।
नाम निरंतर लीजिये जम की लगै न फेट ॥५१॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये साध।
ये तीनों अँग एक हैं गति कछु अगम अगाध ॥५२॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये संत।
धर धर भेष बिलास अँग खेलैं आद अरु अंत ॥५३॥
ऐसा सतगुरु सेइये वेग उतारे पार।
चौरासी भ्रम मेटई आवागमन निवार ॥५४॥
अँधे गूँगे गुरु घने लँगड़े लोभी लाख।
साहब से परचै नहीं काब्य बनावैं साख१ ॥५५॥
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द समाना होय।
भवसागर में डूबते पार लगावै सोय ॥५६॥
ऐसा सतगुरु सेइये सोहं सिंधु मिलाप।
तुरिया मध आसन करै मेटै तीनों ताप ॥५७॥
तुरिया पर पुरिया२ महल पार ब्रह्म का देस।
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द-बिज्ञाना नेस३ ॥५८॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का धाम।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस करै निःकाम ॥५६॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का लोक।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस पठावै मोख४ ॥६०॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का दीप।
ऐसा सतगुरु सेइये राखै संग समीप ॥६१॥
गगन मँडल गादी जहाँ पार ब्रह्म का धाम।
सुन्न सिखर के महल में हंस करै बिस्राम ॥६२॥
(१) कबित् और साखी। (२) बनाया। (३) नेष्ठावान। (४) मोक्ष।

गुरुदेव.कौ.अंग १५
सतगुरु पूरन ब्रह्म है सतगुरु आप अलेख।
सतगुरु रमता राम है या में मीन न मेष ॥६३॥
सतगुरु आदि अनादि है सतगुरु मध अरु मूल।
सतगुरु कूँ सिजदा करूँ एक पलक नहिं भूल ॥६४॥
पट्टन घाट लखाइया अगम भूमि का भेद।
ऐसा सतगुरु हम मिला अष्ट कमल दल छेद ॥६५॥
पट्टन घाट लखाइया अगम भूम का भेव।
ऐसा सतगुरु हम मिला अष्ट कमल दल सेव ॥६६॥
पुर पट्टन की पैंठ में सतगुरु लेगया मोय।
सिर साँटे सौदा हुआ अगली पिछली खोय ॥६७॥
पुर पट्टन की पैंठ में सतगुरु लेगया साथ।
जहँ होरे मानिक बिकैं पारस लागा हाथ ॥६८॥
पुर पट्टन की पैंठ में है सतगुरु की हाट।
जहँ हीरे मानिक बिकैं सौदा मरनों साँट ॥६६॥
पुर पट्टन की पैंठ में सौदा है निज सार।
हम कूँ सतगुरु ले गया औघट घाट उतार ॥७०॥
पुर पट्टन की पैंठ में प्रेम पियाले खूब।
जहँ हम सतगुरु ले गया मतवाला महबूब ॥७१॥
पुर पट्टन की पैंठ में मतवाला मस्तान।
हम कूँ सतगुरु लेगया अमरापुर अस्थान ॥७२॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
मानसरोवर हंस है बानी कोकिल कीर१ ॥७३॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
जहँ हम सतगुरु लेगया चवै२ अमी रस छीर ॥७४॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
जहँ हम सतगुरु लेगया बंदीछोर कबीर ॥७५॥
(१) तोता । (२) टपकता है।

१६ गरीबदास जी की बानी
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस जोख ।
ऐसा सतगुरु मिल गया सौदा रोकम रोक१ ॥७६॥
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस तोल ।
ऐसा सतगुरु मिल गया बजर पौरि दइ खोल ॥७७॥
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस जोख ।
ऐसा सतगुरु मिल गया लेगया हम परलोक ॥७८॥
पिंड ब्रह्मांड से अगम है न्यारी सिंधु समाध ।
ऐसा सतगुरु मिल गया देखा अगम अगाध ॥७९॥
पिंड ब्रह्मांड से अगम है न्यारी सिधु समाध ।
ऐसा सतगुरु मिल गया दिया अच्छय परसाद ॥८०॥
औघट घाटी ऊतरे सतगुरु के उपदेस ।
पूरन पद परकासिया ज्ञान जोग परबेस ॥८१॥
सुन्न सरोवर हंस मन न्हाये सतगुरु भेद ।
सुरत निरत परचा भया अष्ट कमल दल छेद ॥८२॥
सुन बेसुन से अगम है पिंड ब्रह्मांड से न्यार ।
सब्द समाना सब्द में अवगत वार न पार ॥८३॥
सतगुरु कूँ कुरबान जाँ अजब लखाया देस ।
पारब्रह्म परवान है निरालंब निज बेस ॥८४॥
सतगुरु सोहं नाम दे गुफ़२ बीज बिस्तार ।
बिन सोहं सीझे३ नहीं मूल मंत्र निज सार ॥८५॥
सोहं सोहं धुन लगे दरद मंद दिल माहिं ।
सतगुरु परदा खोलहीं परा लोक ले जाहिं ॥८६॥
सोहं जाप अजाप है बिन रसना है धुन्न ।
चढ़ै महल सुख सेज पर जहाँ पाप नहिं पुन्न ॥८७॥
(१) नकदा नकदी । (२) गुप्त । (३) पैवस्त न हो ।

गुरुदेव के अंग १७
सोहं जाप अजाप है बिन रसना है धुन्न ।
सतगुरु दीप समीप है नहिं बस्ती नहिं सुन्न ॥८८॥
सुन्न बस्ती से रहित है मूल मंत्र मन माहँ ।
जहँ हम सतगुरु ले गया अगम भूमि सत ठाँह ॥८९॥
मूल मंत्र निज नाम है सुरत सिंधु के तीर ।
गैबी बानी अरस¹ में सुर नर धरै न धीर ॥९०॥
अजब नगर में ले गया हम कूँ सतगुरु आन ।
झलकै बिंब अगाध गत सूतै चादर तान ॥९१॥
अगम अनाहद दीप है अगम अनाहद लोक ।
अगम अनाहद गमन है अगम अनाहद मोख ॥९२॥
सतगुरु पारस रूप है हमरी लोहा जात ।
पलक बीच कंचन करै पलटै पिंडा गात ॥९३॥
हम तो लोहा कठिन हैं सतगुरु बने लोहार ।
जुगन जुगन के मोरचे तोड़ गढ़े घन सार ॥९४॥
हम पसुआ-जन² जीव हैं सतगुरु जाति भिरंग ।
मुरदे से जिन्दा करें पलट धरत हैं अंग³ ॥९५॥
सतगुरु सिकलीगर बने यह तन तेगा देह ।
जुगन जुगन के मोरचे खोवैं भरम सँदेह ॥९६॥
सतगुरु कंद कपूर हैं हमरी तिनका देह ।
स्वाँति सीप का मेल है चंद चकोरा नेह ॥९७॥
ऐसा सतगुरु सेइये बेग उधारै हंस ।
भवसागर आवै नहीं जोरा काल बिधंस ॥९८॥
पट्टन नगरी घर करै गगन मंडल गहनार ।
अललपंख ज्यों संचरै सतगुरु अधम उधार ॥९९॥
(१) मुसलमानों में नवें यानी सब से ऊँचे स्वर्ग का नाम । (२) नरपशु । (३) जैसे
भृङ्गी (लखोहारी) झींगुर वगैरह को मारकर अपने खौंता में उस पर बैठ कर अपने
चोंकार शब्द से जिला कर उसको अपना ऐसा रूप वाला बना लेती है ।

१८ गरीबदास जी की बानी
अललपंख अनुराग है सुन्न मँडल रह थीर।
दास गरीब उधारिया सतगुरु मिले कबीर ॥१००॥
सुमिरन का अंग
ऐसा अविगत राम है आदि अंत नहिं कोय।
वार पार की मत नहीं अचल निरंतर सोय ॥ १ ॥
ऐसा अविगत राम है अगम अगोचर नूर।
सुन्न सनेही आदि है सकल लोक भरपूर ॥ २ ॥
ऐसा अविगत राम है गुन इन्द्री से न्यार।
सुन्न सनेही रम रहा दिल अंदर दीदार ॥ ३ ॥
ऐसा अविगत राम है अपरंपार अलाह।
कादिर कूँ कुरबान है वार पार नहि थाह ॥ ४ ॥
ऐसा अविगत राम है कादिर आप करीम।
मेरा मालिक मेहरवाँ रमता राम रहीम ॥ ५ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून१ चित माहिं।
सब्द अतीत अगाध है निरगुन सरगुन नाहिं ॥ ६ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून निरवान।
मोरा मालिक है सही महल मढ़ी नहिं थान ॥ ७ ॥
अल्लह अविगत राम है निराधार आधार।
नाम निरंतर लीजिये रोम रोम की लार ॥ ८ ॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये ध्यान चकोरा चंद ॥ ९ ॥
अल्लह अविगत राम है कीमत कही न जाय।
नाम निरंतर लीजिये मुख से कहि न सुनाय ॥१०॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये हिलमिल मीन समुँद ॥११॥
(१) बेचून।

सुमिरन का अंग १६
दुहूँ दीन मध ऐब है अलह अलख पहिचान।
नाम निरंतर लीजिये भगत हेत उत्पान ॥१२॥
अष्ट कमल दल राम है बाहर भीतर राम।
पिंड हाड़ में राम है सकल ठौर सब ठाम ॥१३॥
सकल बियापी सुरत में मन पवना गहि राख।
रोम रोम धुन होत है सतगुरु बोले साख ॥१४॥
मूल कमल में राम है स्वाद चक्र में राम।
नाभि कमल में राम है हृदय कमल बिस्राम ॥१५॥
कंठ कमल में राम है त्रिकुटि कमल में राम।
सहस कमल दल राम है सुन बस्ती सब ठाम ॥१६॥
अचल अभंगी राम है गलताना दम लीन१।
सुरत निरत के अंतरै बाजे अनहद बीन ॥१७॥
राम कहा तो क्या हुआ उर में नहीं यकीन।
चोर मुसै घर लूटहीं पाँच पचीसो तीन ॥१८॥
राम कहंते राम है जिन के दिल हैं एक।
बाहर भीतर रमि रहा पूरन ब्रह्म अलेख ॥१६॥
राम नाम निज सार है मूल मंत्र मन माहिं।
पिंड ब्रह्मांड से रहित है जननी जाया नाहिं ॥२०॥
राम रटत नहिं ढील कर हर दम नाम उचार।
अमी महा रस पीजिये बहुतक बारंबार ॥२१॥
कोट गऊ जे दान दे कोट जज्ञ जेवनार।
कोट कूप तीरथ खनै२ मिटै नहीं जम मार ॥२२॥
कोटिन तीरथ व्रत करै कोटिन गज कर दान।
कोटि अस्व बिप्रों दिये मिटै न खैंचा तान ॥२३॥
(१) महव। (२) खोदें।

२० गरीबदास जी की बानी
पारवती के उर धरा अमर भई छिन माँहँ ।
सुक की चौरासी मिटी निरालंब निज नाम१ ॥२४॥
अगम अनाहद भूमि है जहाँ नाम का दीप ।
एक पलक बिछुरै नहीं रहता नैनों बीच ॥२५॥
साहब साहब क्या करै साहब है परतीत ।
भैंस सींग साहब भया पाँड़े गावैं गीत२ ॥२६॥
राम सरीखा राम है संत सरीखे संत ।
नाम सरीखा नाम है नहीं आदि नहि अंत ॥२७॥
मांहमा सुन निज नाम की गहे द्रोपदी चीर ।
दुस्सासन से पचि रहे अंत न पाया बीर३ ॥२८॥
सेत बँधा पाहन तिरे४ गज पकड़े थे ग्राह५ ।
गनिका चढ़ी बिमान में६ निरगुन नाम मल्लाह ॥२६॥
(१) देखो नोट साखी नंबर २-४ “साध महिमा का अंग” [आगे] ।
(२) एक पाँड़े किसी महात्मा के पास उपदेश लेने गये । महात्मा ने पूछा तुम किसको
सब से अधिक प्यार करते हो । पाँड़े बोले एक भैंस को जिसे हमने पाला है । महात्मा ने
कहा कि उसी का ध्यान किया करो । पाँड़ेजी गुरु के कथन अनुसार अपनी भैंस के
ध्यान में लीन हो गये । यहाँ तक कि उनको ध्यान में भैंस नजर आने लगी । एक दिन
महात्मा ने उनको ध्यान के समय बुलाया, पाँड़े आँख मूँदे हुए बोले कि महाराज मैं घोंची
भैंस की सींग में फँस गया हूँ किस तरह बाहर निकलूँ । महात्मा ने ऐसी दृढ़ता ध्यान
की देख कर दया से पाँड़े से भैंस का ध्यान छुड़ा कर मालिक के ध्यान में लगा दिया
जिससे मालिक का मेला हो गया ।
(३) युधिष्ठिर पांडव, कौरवों के साथ जुआ खेलने में अपनी स्त्री द्रोपदी को हार गये
तब दुस्सासन नामी कौरव ने द्रोपदी को सभा में नंगी करने के लिये उसकी साड़ी खींची ।
ऐसे गाढ़ के अवसर पर द्रोपदी ने दीन होकर अपने इष्ट श्रीकृष्ण का स्मरण किया जिनके
प्रताप से साड़ी इतनी बढ़ती गई कि दुस्सासन खींचते खींचते हार गया पर उसका
अंत न पाया ।
(४) लङ्का और हिंदुस्तान के बीच में समुद्र पर पुल बाँधने के लिये बन्दर लोग राम
नाम लिख कर समुद्र में पत्थर फेंकते थे जो नाम के प्रभाव से तैरते थे और इस तरह
पुल तैयार होगया ।
(५) किसी नदी में एक हाथी को जो नहाने उतरा था मगर पकड़ कर खींचे लिये जाता
था, हाथी ने भगवान को टेरा तब उन्होंने प्रगट होकर उसको उबारा ।
(६) एक बेश्या को मरते समय जमदूत सता रहे थे कि एक साधू आ गये । बेश्या ने

सुमिरन का अंग २१
बरदी ढरी कबीर के भगित हेत के काज१।
सेऊ कूँ तो सिर दिया बेच बन्दगी नाज२ ॥३०॥
कहँ गोरख कहँ दत्त थे कहँ सुकदे कहँ ब्यास ।
भगित हेत से जानिये तीन लोक परकास ॥३१॥
कहँ पीपा कहँ नामदेव कहाँ धना बाजीद ।
कहँ रैदास कमाल थे कहँ थे फकर फरीद ॥३२॥
कहँ नानक दादू हुते कहँ ज्ञानी हरिदास ।
कहँ गोपीचंद भरथरी ये सब सतगुरु पास ॥३३॥
कहँ जंगी चरकट हुते कहाँ अधम सुलतान ।
भगति हेत परगट भये सतगुरु के परवान ॥३४॥
कहँ नारद प्रहलाद थे कहँ अंगद कहँ सेस ।
कहाँ बिभीखन ध्रुव हुते भगति हिरंबर पेस ॥३५॥
कहँ जयदेव थे कपिल मुनि कहँ रामानंद साध ।
कहँ दुरबासा कुस्न थे भगती आद अनाद ॥३६॥
कहँ ब्रह्मा अरु बेद थे कहँ सनकादिक चार ।
कहँ संभू अरु बिस्नु थे भगति हेत दीदार ॥३७॥
ऐसा निरमल नाम है निरमल करै सरीर ।
और ज्ञान मंडलीक३ हैं चकवै४ ज्ञान कबीर ॥३८॥
राम नाम सदनै पिया बकरे के उपदेस५ ।
अति बिलाप कर उनसे रक्षा माँगी। साधूजी ने उसे मंत्र उपदेश का अधिकारी न समझ
कर कहा कि वह नाम लो जो तोते को पढ़ाते हैं। वेश्या ने राम नाम लिया और उसके
उच्चारन करते ही बिमान आया जिस पर चढ़ कर वह बैकुंठ को सिधारी।
(१) देखो नोट साखी नंबर १० "भक्ति का अंग" (आगे)। (२) देखो नोट सफहा
१३। (३) छोटे छोटे मंडल के राजा। (४) चक्रवर्ती राजा। (५) सदन जाति के कसाई
एक भारी भक्त हुए हैं। कहते हैं कि एक बार उनके घर ऐसे समय पाहुन आया जब घर
में माँस न था। सदन ने चाहा कि एक बकरे का छोटा अंग काट के काम चला लिया
जाय इस पर बकरा बोला कि हमारे तुम्हारे सिर काटे का बैर चुकना है सो काट लो
४

२२ गरीबदास जी की बानी
अजामील से उद्धरे भगति बंदगी पेस१ ॥३९॥
नाम जलंधर२ ने लिया पारा रिष परवान ।
धन सतगुरु दाता धनी दई बंदगी दान ॥४०॥
गगन मंडल में रहत है अविनासी आलेख ।
जुगन जुगन सतसंग है धर धर खेलै भेख ॥४१॥
काया माया खंड है खंड राज अरु पाट ।
अमर नाम निज बंदगी सतगुरु से भई साँट ॥४२॥
अमर अनाहद नाम है निरभय अपरंपार ।
रहता रमता राम है सतगुरु चरन जुहार ॥४३॥
अविनासी निःचल सदा करता कूँ कुरबान ।
जाप अजपा जपत है गगन मंडल धर ध्यान ॥४४॥
बिन रसना है बंदगी बिन चस्में दीदार ।
बिन सरवन बानी सुनै निर्मल तत्त निहार ॥४५॥
मैं सौदागर नाम का टाँड़े पड़ा बहीर३ ।
लदते लदते लादिये बहुर न फेरा४ बीर ॥४६॥
और अंग नहीं काट सकते, यह सुन कर सदन को ज्ञान आया और तब से आप
जीव नहीं मारते थे बाजार से माँस मोल लेकर बेचते थे और एक सालिग्राम की बटिया
से जो जितना मांगे तौल देते थे । कथा है कि एक दिन एक ब्राह्मन सालिग्राम की
बटिया की ऐसी दुर्दशा देख कर सदन से माँग कर अपने घर लाया और प्रान
प्रतिष्ठा करके उसको सिंहासन पर पधारा । रात को सालिग्राम ने सपना दिया कि
हमको हमारे भक्त के पास जहाँ से लाया है पहुँचा दे हम वहीं प्रसन्न हैं ।
(१) अजामिल जाति का ब्राह्मण था पर अति कुकर्मी । एक दिन भाग से उसे साध
सेवा मिली और उसने दीनता करी जिस पर साध महात्मा ने बर दिया कि तुझको बेटा
होगा उसका नाम नारायण रखना इससे तेरा कल्याण हो जायगा । कुछ दिन पीछे बेटा
हुआ और उससे अजामिल को ऐसी प्रीति हुई कि एक दम सामने से न हटाता था और
मरते समय उसी का नाम नारायण रटता हुआ प्राण छोड़े और इस नाम के प्रताप से
स्वर्ग में बासा पाया ।
(२) जलंधर एक राक्षस था जिसे श्रीकृष्ण ने छल कर मारा और उनके प्रताप से
उसको ऊँचा स्थान मिला ।
(३) साज सामान । (४) आवागमन ।

सुमिरन का अंग २३
नाम बिना क्या होत है जप तप संजम ध्यान ।
बाहर भरमै मानवी अभि अंतर में जान ॥४७॥
उजल हिरंबर भग्ति है उजल हिरंबर सेव ।
उजल हिरंबर नाम है उजल हिरंबर देव ॥४८॥
नाम बिना निपजै नहीं जप तप करिहैं कोट ।
लख चौरासी त्यार है मूड़ मुड़ाया घोंट ॥४६॥
नाम सरोवर सार है सोहं सुरत लगाय ।
ज्ञान गलोचे बैठ कैर सुन्न सरोवर न्हाय ॥५०॥
मान सरोवर न्हायिये परमहंस का मेल ।
बिना चुँच मोती चुँगै अगम अगोचर खेल ॥५१॥
गगन मँडल में रमि रहा गलताना महबूब ।
वार पार नहिं छेव¹ है अबिचल मूरत खूब ॥५२॥
ऐसा सतगुरु सेइये जो नाम दृढ़ावे ।
भरमी गुरुवा मत मिलो जो मूल गँवावे ॥५३॥
सोहं सुरत लगाय ले गुन इंद्री से बंच ।
नाम लिया तब जानिये मिटे सकल परपंच ॥५४॥
नामै निःचल निरमला अनँत लोक में गाज ।
निरगुन सरगुन क्या कहै प्रगटा संतों काज ॥५५॥
अबिनासी के नाम में कौन नाम निज मूल ।
सुरत निरत से खोज ले बास बड़ी अक² फूल ॥५६॥
फूल सही सरगुन कहा निरगुन गंध सुगंध ।
मन माली के बाग में भँवर रहा कहँ बंध ॥५७॥
भँवर बिलंबा³ केतकी सहस कमलदल माहिं ।
जहाँ नाम निज नूर है मन माया तहँ नाहिं ॥५८॥
पंडित कोटि अनंत हैं ज्ञानी कोटि अनंत ।
स्रोता कोटि अनंत हैं बिरले साधू संत ॥५६॥
(१) आकार, खंड। (२) कि, या। (३) विलम रहा।

२४ गरीबदास जी की बानी
जिन्ह मिलते सुख उपजै मेटैं कोटि उपाध ।
भवन चतुरदस ढूँढ़िये परम सनेही साध ॥६०॥
राम सरीखे साध हैं साध सरीखे राम ।
सतगुरु को सिजदा करूँ जिन्ह दीन्हा निज नाम ॥६१॥
भगित बन्दगी जोग सब ज्ञान ध्यान परतीत ।
सुन्न सिखरगढ़ में रहै सतगुरु सब्द अतीत ॥६२॥
ऐसा सतगुरु सेइये पार उतारै हंस ।
भगित मुक्ति को देत है मिलि है सोहं बंस ॥६३॥
सोहं बंस बखानिये बिन दम देही जाप ।
सुरत निरत से अगम है लै समाध गरगाप ॥६४॥
सुरत निरत मन पवन पर सोहं साहं होय ।
सिव मंतर गौरी कहा अमर भई है सोय ॥६५॥
ररंकार तो धुन लगै सोहं सुरत समाय ।
हद बेहद पर बास है बहुरि न आवै जाय ॥६६॥
गुझ१ गायत्री नाम है बिन रसना धुन ध्याय ।
महिमा सनकादिक लही सिवसंकर बल जाय ॥६७॥
अजब महल बारीक है अजब सुरत बारीक ।
अजब निरत बारीक है महल धसे बिन बीक२ ॥६८॥
ऐसा राम अगाध है अबिनासी गंभीर ।
हद जीवों से दूर है बेहदियों के तीर ॥६६॥
ऐसा राम अगाध है बेकीमत करतार ।
सेस सहस फन रटत है अजहुँ न पाया पार ॥७०॥
ऐसा राम अगाध है अपरंपार अथाह ।
उर में कृत्रिम ख्याल है मौला अलख अलाह ॥७१॥
ऐसा राम अगाध है निरभय निःचल पीर ।
अनहद नाद अखंड धुन तन मन हीन सरीर ॥७२॥
(१) गुप्त । (२) डर ।

सुमिरन का अंग २५
ऐसा राम अगाध है बाजीगर भगवंत ।
निरसँध निरमल देखिया वार पार नहिं अंत ॥७३॥
पारब्रह्म बिन परख है कीमत मोल न तोल ।
बिना वजन अरु राग है बहुरंगी अनबोल ॥७४॥
महिमा अविगत नाम की जानत बिरले संत ।
आठ बखत सुबिधान१ है मुनि जन रटैं अनंत ॥७५॥
चंद सूर पानी पवन धरनी पोल अकास ।
पाँच तत्त हाजिर खड़े खिजमतदार खवास ॥७६॥
काल करम करे बंदगी महाकाल अरदास२ ।
मन माया अरु धरमराय सब सिर नाम उपास ॥७७॥
काल डरै करतार से मन माया का नास ।
चंदन अँग पलटै सबै खाली रह गया बाँस३ ॥७८॥
सजन सलोना राम है अब मत अंतहि जाय ।
बाहर भीतर एक है सब घट रहा समाय ॥७६॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी एक ।
आदि अंत जा के नहीं ज्यों का त्योंहीं देख ॥८०॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी ऐन ।
महिमा कही न जात है बोलै मधुरे बैन ॥८१॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आद ।
सतगुरु महरम तासु का साख भरत सब साध ॥८२॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी पीर ।
चरन कमल हंसा रहै हम हैं दामनगीर ॥८३॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आप ।
हद बेहद से अगम है जपते अजपा जाप ॥८४॥
(१) कमाई किये जाने लायक़ । (२) अर्जदाश्त । (३) मलयाचल में पर्वत में चन्दन
की सुगंध से सब वृक्ष चन्दन सरीखे हो जाते हैं पर बाँस का वृक्ष सुगंधित नहीं होता है ।

३६ गरीबदास जी की बानी
ऐसा भगली जोगिया जानत है सब खेल ।
बीन बजावै मोहनी जोग जंत्र सब मेल ॥८५॥
ब्रह्मादिक से मोहिया मोहे सेस गनेस ।
संकर की तारी लगी अडिग समाध हमेस ॥८६॥
गन गँधरप ज्ञानी गुनी अजब नवेला नेह ।
क्या महिमा कहूँ नाम की मिट गये सकल सँदेह ॥८७॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे नैनों मंझ ।
अलख पलक में खलक में सतगुरु सब्द समंझ ॥८८॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे हिरदे माहिं ।
चंद सूर ऊगै नहीं निस बासर जहँ नाहिं ॥८९॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे त्रिकुटी तीर ।
संख परम छबि चाँदनी बानी कोकिल कीर१ ॥६०॥
सुन्न बिदेसी बस रहा सहस कमल दल बाग ।
सोहं ध्यान समाध धुन और तीब्र बैराग ॥६१॥
सुमिरन तब ही जानिये जब रोम रोम धुनि होय ।
कुंज कमल में बैठ कर माला फेरे सोय ॥६२॥
सुरत सुमिरनी हाथ ले निरत मिले निरवान ।
ररंकार रमता लखै असल बंदगी ध्यान ॥६३॥
अष्ट कमल दल सुन्न है बाहर भीतर सुन्न ।
रोम रोम में सुन्न है जहाँ काल की धुन्न ॥६४॥
तुम्हीं सोहं सुरत हौ तुमही मन अरु पौन ।
इसमें दूसर कौन है आवै जाय सो कौन ॥६५॥
इसमें दूसर कर्म है बँधी अबिद्या गाँठ ।
पाँच पचीसो ले गई अपने अपने बाट ॥६६॥
नाम बिना सूना नगर पड़ा सकल में सोर ।
लूट न लूटी बंदगी हो गया हंसा भोर ॥६७॥
(१) तोता ।

भक्ति का अंग २७
अगम निगम कूँ खोज ले बुद्धि बिबेक बिचार ।
उदय अस्त का राज दे तौ बिन नाम बिगार ॥६८॥
ऐसा कौन अभागिया करै भजन कूँ भंग ।
लोहे से कंचन भया पारस के सतसंग ॥६६॥
॥ भक्ति का अंग ॥
पारस तुम्हरा नाम है लोहा हमरी जात ।
जड़ सेती जड़ पलटिया तुम कूँ केतिक बात ॥ १ ॥
बिना भगति क्या होत है ध्रू१ कूँ पूछे जाहि ।
सवासेर अन्न पावते अटल राज दिया ताहि ॥ २ ॥
बिना भगति क्या होत है कासी करवत२ लेह ।
मिटै नहीं मन बासना बहु विधि भरम संदेह ॥ ३ ॥
भगति बिना क्या होत है भरम रहा संसार ।
रत्ती कंचन पाय नहिं रावन चलती बार३ ॥ ४ ॥
संग सुदामा संत थे दारिद का दरियाव ।
कंचन महल बकस दिये तंदुल भेंट चढ़ाव४ ॥ ५ ॥
दो कौड़ी का जीव था सेना जात गुलाम ।
(१) ध्रुव राजा उत्तानपाद की बड़ी रानी के पुत्र थे जो अपनी छोटी रानी को अधिक
चाहता था । एक बार अपने पिता की गोद में जाकर बैठे जिस पर छोटी रानी ने यह
कह कर उठा दिया कि तुम्हारा ऐसा पुण्य नहीं है कि इस गोद में बैठो । ध्रुव के कलेजे
में यह बात लग गई और घर से निकल गये और नारद जी के उपदेश से मालिक की
भक्ति करके तारागण में सब से ऊँचा और अचल लोक पाया ।
(२) काशी में काशी करवत एक स्थान है जहाँ एक कुए में आरे लगे थे और लोग
उस पर मुक्ति के हेतु कट मरते थे ।
(३) कहते हैं कि लंका सोने की बनी थी लेकिन रावन जो राम द्रोही था मरते समय
खाली हाथ गया !
(४) सुदामा श्रीकृष्ण के गुरु-भाई थे परन्तु महा दरिद्र । एक बार अपनी स्त्री के कहने
से कुछ चावल श्रीकृष्ण की भेंट के लिये लेकर उनसे मिलने गये । श्रीकृष्ण ने आदर सत्कार
तो बहुत किया पर जाहिर में कुछ दिया नहीं । जब सुदामा घर को लौटे तो देखा कि
उनका कच्चा झोपड़ा सोने का महल बन गया है !

२८ गरीबदास जी की बानी
भगित हेत गृह आइया धरा सरूप हजाम१॥ ६ ॥
पीपा को परचा हुआ मिले भक्त भगवान ।
सीता मग जोवत रही द्वारावती निधान२ ॥ ७ ॥
धना भगत की धुन लगी बीज दिया जिन्ह आन ।
सूखा खेत हरा हुआ कंकर बोये जान३ ॥ ८ ॥
रैदास रँगीला रंग है दिये जनेऊ तोड़ ।
जग्य ज्योनार चोले धरे इक रैदास इक गौड़४ ॥ ९ ॥
(१) किसी राजा के यहाँ सेना नाऊ भक्त हजामत बनाने की नौकरी पर था।
एक दिन हजामत बनाने के लिए जा रहा था कि राह में साधू लोग मिल गये और
वह साधु-सेवा में लग गया, उसके बदले भगवान आप उस राजा की हजामत
बना आये।
(२) पीपा जी मागरौनगढ़ के राजा थे जो अपनी सीता नामक रानी के साथ साधू
हो गये और स्वामी रामानन्द जी से उपदेश लिया । इनकी प्रचण्ड भक्ति और महिमा
का भक्तमाल में बहुत वर्णन लिखा है । जिस कथा का गरीबदास जी की इस साखी में
इशारा है वह इस तरह पर है कि पीपाजी जी और उनकी स्त्री सीता द्वारका को गये और
वहाँ असली दिब्य द्वारका में पहुँच कर (जो समुद्र में डूब गई है) साक्षात् श्रीकृष्ण
का दर्शन पाने के हेतु एक दिन सीता के साथ समुद्र तट पर पहुँचे । यहाँ सीता को खड़ी
कर पीपा जी आप समुद्र में कूद कर गायब हो गये और सात दिन तक दर्शन का रस
और भगवान की प्रसादी छाप अपने शरीर पर लेकर आज्ञानुसार समुद्र से बाहर निकले
जहाँ सीता उनका रास्ता देख रही थी। पीपा जी ने यह छाप मंदिर के पुजारियों को
सौंप कर आज्ञा की कि जो लोग इस छाप को अपने शरीर पर लगावेंगे वह भगवत
पद पावेंगे।
(३) धना भक्त के पिता ने अपने पुत्र को खेत बोने के लिये बीज देकर भेजा। उसी
समय कुछ भूखे साधू आ गये, उन्हें धना ने सब बीज दे दिया और बाप के डर के मारे
खेत में कंकड़ बो दिये (एक जगह ऐसा लिखा है कि साधुओं के तुम्बों के बीज बो दिये)
फिर जाकर पिता को खबर दी कि खेत बो दिया। कुछ दिन पीछे पिता को नौकरों से
असल हाल मालूम हो गया और बड़े क्रोध में खेत पर गये पर वहाँ पहुँच कर क्या देखा
कि अन्न का खेत खूब लहलहा रहा है।
(४) चित्तौड़ की रानी ने जो रैदास जी की चेली थी एक बार काशी में किसी उत्सव
पर गौड़ ब्राह्मणों को न्योता दिया। ब्राह्मणों ने इनकार किया कि वह चमार की चेली
है हम उसके यहाँ भोजन नहीं कर सकते। इस पर रैदास जी ने उन लोगों को समझाया
कि राज धान्य में कुछ दोष नहीं है और हम कुछ उसे छूने न जायँगे फिर कौन सा
झगड़ा है। ब्राह्मण लोग काइल होकर राजी हो गये। जब खाने को बैठे और थोड़ा बहुत
खा चुके तो देखते क्या हैं कि पंगत में हर ब्राह्मण के इधर उधर एक एक रैदास (चमार)
हैं। ब्राह्मणों ने घबरा कर खाने से हाथ खींच लिया उस पर रैदास जी ने समझाया कि

भक्ति का अंग २६
माँझी मरद कबीर है जगत करै उपहास।
केसो बनजारा भया भगत बड़ाई दास१ ॥१०॥
सोहं ऊपर और है सत्त सुकृत इक नाम।
सब हंसों का बंस है सुन वस्ती नहिं गाम ॥११॥
सोहं ऊपर और है सुरत निरत का नाँव।
सोहं अंतर पैठ कर सत्त सुकृत लौ लाव ॥१२॥
सोहं ऊपर और है बिना मूल का फूल।
जा की गंध सुगंध है ता को पलक न भूल ॥१३॥
सोहं ऊपर और है बिन बोली का कंद।
नाम रसायन पीजिये अविचल अति आनंद ॥१४॥
सोहं ऊपर और है कोउ का जाने भेव।
गोप गोसाईं गैब धुन ता की कर ले सेव ॥१५॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत धुन ध्यान।
चार जुगन की बन्दगी एक पलक परमान ॥१६॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस ठौर।
संकर बकसा मिहर कर अमर भई तब गौर ॥१७॥
सुरत लगै अरु मन लगै लगै निरत तिस माहिं।
एक पलक तहँ संचरै कोटि पाप अध जाहिं ॥१८॥
अविगत की अविगत कथा अविगत है सब ख्याल।
अविगत सों अविगत मिलै कर जोरै तब काल ॥१६॥

डरो मत और नाखून से अपने कांधे की चमड़ी चीर कर दिव्य जनेऊ दिखा कर हँसते
हुए वहाँ से चल दिये । इस महिमा को देख कर ब्राह्मणों ने फिर भोजन किया - (देखो
जीवन-चरित्र रैदास जी बानो में) ।
(१) काशी के पंडित जो कबीर साहब से बहुत द्वेष रखते थे उन्होंने एक बार नगर
भर में यह मशहूर कर दिया कि आज कबीर के यहाँ सब भूखों और कंगलों को पाँच
पाँच सेर अन्न बटेगा, यह सुनकर हज़ारों आदमी की भीड़ उनके दरवाजे पर जमा
हुई। कबीर साहब चुपचाप किसी बहाने से बाहर चले गये और उनके पीछे भगवान
बनजारे का रूप धरे बहुत से बैल अन्न से लदे हुए वहाँ छोड़ गये जो कंगलों को उनकी
आशा से अधिक बाँटा गया ।
५

३० गरीबदास जी की बानी
अमर अनूपम आप है और सकल है खंड।
सूच्छम से सूच्छम मही पूरन पद परचंड ॥२०॥
अधम उधारन भगित है अधम उधारन नाँव।
अधम उधारन संत हैं जिनके मैं बल जावँ ॥२१॥
गज गनिका अरु भीलनी सेवरी प्रेम सहेत।
केते पतित उधारिया सतगुरु गावै नेत ॥२२॥
राम रसायन पीजिये यहि औसर यहि दाव।
फिर पीछे पछतायगा चला चली हो जाव ॥२३॥
राम रसायन पीजिये चोखा फूल चुवाय।
सुन्न सरोवर हंस मन पीया प्रेम अघाय ॥२४॥
कहता दास गरीब है बाँदी-जाद१ गुलाम।
तुम हो तैसी कीजिये भक्ति हिरंबर नाम ॥२५॥
॥ बिनती का अंग॥
साहब मेरी बीनती सुनो गरीब निवाज।
जल की बूँद महल रचा भला बनाया साज ॥ १ ॥
साहब मेरी बीनती सुनिये अर्स अवाज।
मादर पिदर करीम तू पुत्र पिता को लाज ॥ २ ॥
साहब मेरी बीनती कर जोरैं करतार।
तन मन धन कुरबान है दीजै मोहिं दीदार ॥ ३ ॥
पाँच तत्त के महल में नौ तत का इक और।
नौ तत से इक अगम है पारब्रह्म की पौर ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पवन कूँ करो एकत्तर२ यार।
द्वादस उलट समोय ले दिल अंदर दीदार ॥ ५ ॥
चार पदारथ महल में सुरत निरत मन पौन।
सिव द्वारा खुलि है जबै दरसै चौदह भौन ॥ ६ ॥
(१) ख़ानाज़ाद् । (२) इकट्ठा ।

बिनती का अंग ३१
सील संतोष बिबेक बुध दया धर्म इकतार ।
अकल यकीन इमान रख गही बस्तु निज सार ॥ ७ ॥
साहब तेरी साहबी कैसे जानी जाय ।
त्रिसरेणू१ से भीन है नैनौँ रहा समाय ॥ ८ ॥
अनँत कोटि ब्रह्मांड का रचनहार जगदीस ।
ऐसा सूच्छम रूप धर आन बिराजा सीस ॥ ६ ॥
साहब पुरुष करीम तूँ अविगत अपरंपार ।
पल पल माँहैं बंदगी निरधारौँ आधार ॥१०॥
दरदमंद दरवेस तूँ दिल दाना महबूब ।
अचल बिसंभर बस रहा सूरत मूरत खूब ॥११॥
साँस सुरत के मद्ध है न्यारा कभी न होय ।
ऐसा साछीभूत है सुरत निरंतर जोय ॥१२॥
सुरत निरत से भीन है जगन्नाथ जगदीस ।
त्रिकुटी छाजै पुर रहै है ईसन का ईस ॥१३॥
कोटि जग्य असुमेध कर एक पलक धर ध्यान ।
षट दल के री बन्दगी नहीं जग्य उनमान ॥१४॥
जित सेतीं दम ऊचरै सुरत तहाँई लाय ।
नाभी कुंडल नाद है त्रिकुटि कमल समाय ॥१५॥
अठसठ तीरथ भरमना भटक मुआ संसार ।
बारह बानी२ ब्रह्म है जाका करो बिचार ॥१६॥
अठसठ तीरथ जाइये मेले बड़ा मिलाप ।
पत्थर पानी पूजते साध संत मिल जाप ॥१७॥
सनकादिक सेवन करै सुकदे बोलै साख ।
कोटि ग्रन्थ का अरथ है सुरत ठिकाने राख ॥१८॥
( १ ) तीन परमाणु का एक त्रिसरेणु होता है। ( २ ) छः कमल पिण्ड के और छः
ब्रह्मांड के।

३३ गरीबदास जी की बानी
साहब तेरी साहबी कहा कहूँ करतार ।
पलक पलक की दीठ में पूरन ब्रह्म हमार ॥१९॥
एते करता कहाँ हैं वह तो साहब एक ।
जैसे फूटी आरसी टूक टूक में देख ॥२०॥
करौं बीनती बंदगी साहब पुरुष सुभान१ ।
संख असंखों बरन है कैसे रचा जहान ॥२१॥
साहब तेरी साहबी समझ परै नहिँ मोहिँ ।
एता रूप जहान जग कैसे सिरजा तोहिँ ॥२२॥
एक बीज इक बिंदु है एक महल इक द्वार ।
चरन कमल कुरबान जाँ सिरजे रूप अपार ॥२३॥
मौला जल से थल करै थल से जल कर देत ।
साहब तेरी साहबी स्याम कहूँ की सेत ॥२४॥
साहब मेरा मिहरबाँ सुनिये अरस अवाज ।
पंजा राखो सीस पर जसहीँ होत तिरास ॥२५॥
मादर पिदर परान तँू साहब समरथ आप ।
रोम रोम धुन होत है सब्द सिंधु परकास ॥२६॥

बिनती का अंग ३३
ओं अरु सोहं सार है मूल फूल परबेस ।
सिव ब्रह्मादिक रटत हैं ध्यान धरत है सेस ॥३२॥
मैं समरथ के आसरे दमक दमक करतार ।
गफ़लत मेरी दूर कर खड़ा रहूँ दरबार ॥३३॥
सुनो पुरुष मेरी बीनती साहब दीन-दयाल ।
पतित-उधारन साइयाँ तुम हो नजर निहाल ॥३४॥
समरथ का सरना लिया ताहि न चाँपै काल ।
पारब्रह्म का ध्यान धर होत न बाँका बाल ॥३५॥
नागदमन¹ निरगुन जड़ी ऐसा तुम्हरा नाम ।
तच्छक तीछा डरत है हर दम जप ले नाम ॥३६॥
आतम इंद्री कारने मत भटकावै मोहिं ।
जगन्नाथ जगदीस गुरु सरना आया तोहिं ॥३७॥
चरन कमल के ध्यान से कोटि बिघन टल जाहिं ।
राजा होवै लोक का जहाँ परै हुम² छाँहि ॥३८॥
हुमा छाँह जा पर परै पिरथी-नाथ कहाय ।
पसु पंछी आदम सबै सनमुख परखै ताय ॥३६॥
दिब्य-दृष्टि देवा दयाल सतगुरु संत सुजान ।
तिरलोकी के जीव कूँ परख लेत परवान ॥४०॥
अगले पिछले जन्म कूँ जानत है जगदीस ।
मुंडमाल सिव के गले पहिर रहे ज्यों ईस³ ॥४१॥
करुनामई करीम जप अलह अलख का ध्यान ।
सत्त पुरुष सुख सिंधु में जपत समाने प्रान ॥४२॥
दम सूँ दम कूँ समझ ले उठत बैठ आराध ।
रंचक ध्यान समान सुध पूरन सकल मुराद ॥४३॥
(१) नाम साँप की जड़ी का । (४) हुमा चिड़िया जिसकी निसबत कहते हैं कि उसका
साया पड़ने से आदमी बादशाह हो जाता है । (३) एक समय पारवती जी ने शिवजी से
पूछा कि यह मुंडमाल जो आप पहिने हुए हैं उसमें किन किन के सिर हैं । शिव जी