गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ गरीबदास जी की बानी
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु कूँ दान।
मेरा मेरी छाँड़ दे यही गुप्त है दान ॥५०॥
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु की भेंट।
नाम निरंतर लीजिये जम की लगै न फेट ॥५१॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये साध।
ये तीनों अँग एक हैं गति कछु अगम अगाध ॥५२॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये संत।
धर धर भेष बिलास अँग खेलैं आद अरु अंत ॥५३॥
ऐसा सतगुरु सेइये वेग उतारे पार।
चौरासी भ्रम मेटई आवागमन निवार ॥५४॥
अँधे गूँगे गुरु घने लँगड़े लोभी लाख।
साहब से परचै नहीं काब्य बनावैं साख१ ॥५५॥
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द समाना होय।
भवसागर में डूबते पार लगावै सोय ॥५६॥
ऐसा सतगुरु सेइये सोहं सिंधु मिलाप।
तुरिया मध आसन करै मेटै तीनों ताप ॥५७॥
तुरिया पर पुरिया२ महल पार ब्रह्म का देस।
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द-बिज्ञाना नेस३ ॥५८॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का धाम।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस करै निःकाम ॥५६॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का लोक।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस पठावै मोख४ ॥६०॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का दीप।
ऐसा सतगुरु सेइये राखै संग समीप ॥६१॥
गगन मँडल गादी जहाँ पार ब्रह्म का धाम।
सुन्न सिखर के महल में हंस करै बिस्राम ॥६२॥
(१) कबित् और साखी। (२) बनाया। (३) नेष्ठावान। (४) मोक्ष।