गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ गरीबदास जी की बानी
अललपंख अनुराग है सुन्न मँडल रह थीर।
दास गरीब उधारिया सतगुरु मिले कबीर ॥१००॥
सुमिरन का अंग
ऐसा अविगत राम है आदि अंत नहिं कोय।
वार पार की मत नहीं अचल निरंतर सोय ॥ १ ॥
ऐसा अविगत राम है अगम अगोचर नूर।
सुन्न सनेही आदि है सकल लोक भरपूर ॥ २ ॥
ऐसा अविगत राम है गुन इन्द्री से न्यार।
सुन्न सनेही रम रहा दिल अंदर दीदार ॥ ३ ॥
ऐसा अविगत राम है अपरंपार अलाह।
कादिर कूँ कुरबान है वार पार नहि थाह ॥ ४ ॥
ऐसा अविगत राम है कादिर आप करीम।
मेरा मालिक मेहरवाँ रमता राम रहीम ॥ ५ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून१ चित माहिं।
सब्द अतीत अगाध है निरगुन सरगुन नाहिं ॥ ६ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून निरवान।
मोरा मालिक है सही महल मढ़ी नहिं थान ॥ ७ ॥
अल्लह अविगत राम है निराधार आधार।
नाम निरंतर लीजिये रोम रोम की लार ॥ ८ ॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये ध्यान चकोरा चंद ॥ ९ ॥
अल्लह अविगत राम है कीमत कही न जाय।
नाम निरंतर लीजिये मुख से कहि न सुनाय ॥१०॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये हिलमिल मीन समुँद ॥११॥
(१) बेचून।