गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरुदेव के अंग १७
सोहं जाप अजाप है बिन रसना है धुन्न ।
सतगुरु दीप समीप है नहिं बस्ती नहिं सुन्न ॥८८॥
सुन्न बस्ती से रहित है मूल मंत्र मन माहँ ।
जहँ हम सतगुरु ले गया अगम भूमि सत ठाँह ॥८९॥
मूल मंत्र निज नाम है सुरत सिंधु के तीर ।
गैबी बानी अरस¹ में सुर नर धरै न धीर ॥९०॥
अजब नगर में ले गया हम कूँ सतगुरु आन ।
झलकै बिंब अगाध गत सूतै चादर तान ॥९१॥
अगम अनाहद दीप है अगम अनाहद लोक ।
अगम अनाहद गमन है अगम अनाहद मोख ॥९२॥
सतगुरु पारस रूप है हमरी लोहा जात ।
पलक बीच कंचन करै पलटै पिंडा गात ॥९३॥
हम तो लोहा कठिन हैं सतगुरु बने लोहार ।
जुगन जुगन के मोरचे तोड़ गढ़े घन सार ॥९४॥
हम पसुआ-जन² जीव हैं सतगुरु जाति भिरंग ।
मुरदे से जिन्दा करें पलट धरत हैं अंग³ ॥९५॥
सतगुरु सिकलीगर बने यह तन तेगा देह ।
जुगन जुगन के मोरचे खोवैं भरम सँदेह ॥९६॥
सतगुरु कंद कपूर हैं हमरी तिनका देह ।
स्वाँति सीप का मेल है चंद चकोरा नेह ॥९७॥
ऐसा सतगुरु सेइये बेग उधारै हंस ।
भवसागर आवै नहीं जोरा काल बिधंस ॥९८॥
पट्टन नगरी घर करै गगन मंडल गहनार ।
अललपंख ज्यों संचरै सतगुरु अधम उधार ॥९९॥
(१) मुसलमानों में नवें यानी सब से ऊँचे स्वर्ग का नाम । (२) नरपशु । (३) जैसे
भृङ्गी (लखोहारी) झींगुर वगैरह को मारकर अपने खौंता में उस पर बैठ कर अपने
चोंकार शब्द से जिला कर उसको अपना ऐसा रूप वाला बना लेती है ।