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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

१५० गरीबदास जी की बानी
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूँ सौगँद, जिन नहिं करद चलाया ॥ ६ ॥
वेई मुहम्मद वेई महादेव, वेई र्बिसुन वेई ब्रह्मा।
दास गरीब दूसरा को है, देखो अपने घर माँ ॥ ७ ॥
( ६ )
कोई बाँका सूरा, लड़त बेहद मैदाना ॥ टेक ॥
नैनन की बंदूक बनी है, स्रवन बरूद समाना।
काल बली को मार गिरावो, सुरत की गोली ताना ॥ १ ॥
मन को टेर१ दया को बखतर, सुरत कटारी ठाना।
पाँच पचीस मिल टक्कर मारो, अमर लोक अस्थाना ॥ २ ॥
ईथर पाथर कभी न पूज्यो, तीरथ बर्त न माना।
सत्त सब्द में रह्यो समाई, तब मेरो मन जाना ॥ ३ ॥
जूझैगा कोई परम सूरमा, घाव लगै निर्बाना।
दास गरीब कबीर का चेला, जूँ का त्यूँ ठहराना ॥ ४ ॥
( १० )
जो कोई ना मानै ना मानै,
जाकूँ अजाजील्लै रानै२ ॥ टेक ॥
करै अचार बिचार असंभी, पूजत जड़ पाषानै।
पाती तोर चढ़ावत अँधरे, जीवत जी कूँ भानै३ ॥ १ ॥
पिंड प्रदान करै पितरों के, तीरथ जग औ दानै।
बिना बंदगी मोच्छ नहीं रे, भूल रहे सुर४ ज्ञानै ॥ २ ॥
सुकदे स्यू का तंत सुना है, भक्ति दई धिग ता ने।
सतगुरु जनक बिदेही भेंटे, पद मिल पदै समाने५ ॥ ३ ॥
अकथ कथा कुछ कही न जाई, देखत नयन सिराने६।
प्रबल बली दरियाव बिहंगम, लाय ले चोट निशाने ॥ ४ ॥
(१) टोपा, खोड़। (२) उसको शैतान गिरावै। (३) मारै। (४) देवता। (५)
शुकदेव जी ने पहिले भक्ति का निरादर किया था और ज्ञान ही को मानते थे, देखो नोट
पृष्ट ६४ और ८६। (६) शीतल हुए।

राग असावरी १५१
पंडित बेद कहै बहु बानी, काजी पढ़ै कुराने ।
सुअर गऊ को दोय बतावै, दोनों दीन दिवाने ॥ ५ ॥
एकहि मट्टी एकहि चमड़ा, एकहि बोलत प्राने ।
जिभ्या स्वादै मारत है नर, समुझत नहीं हैवाने ॥ ६ ॥
मुरगी बकरी कुकड़ी खाई, कूके बंग मुलाने ।
जैसा दरद आपने होवै, वैसा दरद बिराने ॥ ७ ॥
मन मक्का की हज्ज न कीन्ही, दिल काबा नहिं जाने ।
कैसी काजी कजा१ करत हो, खाते हौ हलवाने२ ॥ ८ ॥
जा दिन साहब लेखा माँगे, द्यो क्या ज्वाब दिवाने ।
ऐसा कुफर तरस नहिं आवै, काटै सीस खुराने ॥ ६ ॥
उस पुर सेतो महरम३ नाहीं, अनहद नाद घुरानै ।
दास गरीब दुनी४ गई दोजख, द्यावै गालि गुरानै५ ॥ १० ॥
( ११ )
अवधू पाया अति आरूढ़ं,
कोट उनंचा६ काहे नाचा तन ढूँढ़े में ढूँढ़ं ॥टेक॥
पोथी थोथी काहे ढूँढ़ो, सुन रे पंडित मूढ़ ।
लंबी जटा अटा क्यूँ बाँधै, काहे मुड़ावै मूड ॥ १ ॥
जल पाषान तरा नहि कोई, सूवा सेम्हर डूँड़ं७ ।
वह नग हीरा परखा नाहीं, क्यूँ खोजत हौ जूड़ं ॥ २ ॥
जल मृग त्रिसना सृष्टि भुलानी, भूल रहा जग भूड़ं ।
नाम अभय पद निःचै निपजै, बीज परे ज्यूँ खूड़ं८ ॥ ३ ॥
बिन आकार अपार पुरुष है, बाल बृद्ध नहिं बूढ़ं ।
दास गरीब अचल अबिनासी, अवगत मंतर गूढ़ ॥ ४ ॥
(१) पाँचो वक्त की नमाज पढ़ना। (२) बकरी का बच्चा। (३) भेदी। (४) दुनिया।
(५) गाली गलौज। (६) उनचास। (७) डौंडी। (८) हराई, रिघाई।

१५२ गरीबदास जी की बानी
( १२ )
संतो मन की माला फेरो,
यह मन बाहर जात हेरो ॥ टेक ॥
तीन लोक औ भवन चतुर्दस, एक पलक फिर आवै।
बिनहीं पंखों उड़ै पखेरू, याका खोज न पावै ॥ १ ॥
तत की तसबी१ सुरत सुमिरनी, दृढ़ के धागे पोई।
हर दम नाम निरंजन साहब, यह सुमिरन कर लोई ॥ २ ॥
किलियं ओञ्र्यं हिरियं सिरियं, सोहं सुरत लगावै।
पंच नाम गायत्री गैबी, आतम तत्त जगावै ॥ ३ ॥
ररंकार उच्चार अनाहद, रोम रोम रस तालं।
कर की माला कौन काम जब, आतम राम अबदालं२ ॥ ४ ॥
सुरग पताल सृष्टि में डोलै, सर्व लोक सैलानी।
यह मन भैरो भूत बितालं, यह मन अलख बिनानी ॥ ५ ॥
यह मन ब्रह्मा बिसुन महेसं, इन्दर बरुन कुबेरं।
मनही धर्मराय है भाई, सकल दूत जम जेरं३ ॥ ६ ॥
मनही सनक सनन्दन बाला, गौरज और गनेसा।
मनही कच्छ मच्छ कूरंभा, धौल धरन अरु सेसा ॥ ७ ॥
मनही गोरख दत्त दिगंबर, नारद सुकदे व्यासा।
मनही बलि बावन है आया, मन का अजब तमासा ॥ ८ ॥
मनही ध्रू प्रहलाद अभीखन, मन का सकल पसारा।
मनही हरि हीरा हिरनाकुस, मन नरसिंघ औतारा ॥ ६ ॥
मन सुग्रीव बालि बल अंगद, रावन राम रँगीला।
मनही नौ औतार धरत है, मन की अवगत लीला ॥१०॥
मनही लछमन हनूमान है, मनही चेरी सीता।
मनही चारो बेद बिद्या सब, मन भागवत औ गीता ॥११॥
(१) माला। (२) भक्त । (३) परास्त करना ।

राग असावरी १५३
मनही परसराम परसोतम, छत्री किये निछत्री१।
मनही कपिल देव देहूती२, मनही अद्या अत्री ॥१२॥
मनही चंद सूर तारागन, मनही पानी पौना ।
मनही लख चौरासी डोले, मनही का सब गौना ॥१३॥
मन तेंतीसो कोट देवता, मनही सहस अठासी ।
मनही थावर जंगम जोनी, मनही सिध चौरासी ॥१४॥
मनही कीट पतंग भुवंगा, मन जोनी जगदीसं ।
मन के ऊपर निज मन साहब, ताहि नवाऊँ सीसं ॥१५॥
निज मन सेती यह मन हूआ, घर आया अनँत सरीरं ।
दास गरीब अभय अबिनासी, ता मिल रहे कबीरं ॥१६॥
( १३ )
पार किनहुँ नहिं पाये संतो, पार किनहुँ नर्हि पाये ।
जुग छत्तीस रीत नहि जानी, ब्रह्मा कमल भुलाये ॥टेक॥
चार अंड ब्रह्मांड रचाने, कूरम धौल धराये ।
कच्छ मच्छ सेसा नारायन, सहस मुखी पद गाये ॥ १ ॥
चार बेद अस्तुती करत है, ज्ञान अगम गोहराये ।
अकथ कथा अच्छर निःअच्छर, पुस्तक लिखा न जाये ॥ २ ॥
सुरत निरत से अगम अगोचर, मन बुध रहे थकाये ।
ज्ञान ध्यान से अधिक परे रा, क्या गाऊँ रामराये ॥ ३ ॥
नारद मुनी गुनी महमंता, नर से नारि बनाये३।
एक पलक परपूरन साहब, पूत बहत्तर जाये३ ॥ ४ ॥
नौ लख बोरी कासी आई, दास कबीर बढ़ाये४ ।
दास गरीब अगम अनुरागी, पद मिल पदै समाये ॥ ५ ॥
( १४ )
अबधू लेत न मन का लाहा५, चीन्हो ज्ञान अगाहा६ ॥टेक॥
(१) नाश। (२) कपिल देव की माता का नाम । (३) देखो नोट पृष्ठ ६०-६२।
(४) देखो नोट पृष्ठ २६। (५) लाभ (६) गूढ़ ।

१५४ गरीबदास जी की बानी
कासी गहन बहन भये१ प्रानी, प्राग न्हात है माहा२ ।
बिना नाम जोनी नहिं छूटै, भरमै भूल भुलाहा ॥ १ ॥
सहस मुखी गंगा नहिं न्हाते, खोदें ऊजड़ बाहा३ ।
नारद ब्यास पूछ सुकदे कूँ, चारो वेद उगाहा४ ॥ २ ॥
पंथ पुरातन खोज लिया है, चाले अवगत राहा ।
सुकदे ज्ञान सुना संकर का, मिटी न मन की दाहा ॥ ३ ॥
दो तपिया गुन तप कूँ लागे, बंदे हूहू हाहा५ ।
लगा सराप परे भौसागर, कीन्हें गज अरु ग्राहा ॥ ४ ॥
सिव संकर के तिलक किया है, नारद सोधा साहा६ ।
ब्रह्मादिक ने चौरी रचिया, किया गौर का ब्याहा ॥ ५ ॥
इक सौ आठ गये तन परलै, बहुर किया निरबाहा ।
सिव के संग गौरजा उधरी, मिट गया काल उसाहा७ ॥ ६ ॥
ज्यूँ सर्पा की पूँछ पकर कर, अंदर उलटा जाहा ।
नीर कबीर सिंध सुखसागर, पद मिल गया जुलाहा ॥ ७ ॥
हमरा ज्ञान ध्यान नहिं बूझा, समझ न परी अगाहा ।
दासगरीब पार कस उतरै, भेंटा नहीं मलाहा ॥ ८ ॥
(१) बहे । (२) महीने भर । (३) नहर । (४) संग्रह किया ।
(५) हूहू और हाहा दो गंधर्वों के नाम हैं जो गान विद्या में बड़े निपुन थे। दोनों
में झगड़ा हुआ कि कौन बढ़ कर गाता है इसलिये वे निर्णय कराने को देवल ऋषि के
पास गये। देवल ऋषि ने उन दोनों का गाना सुन कर कहा कि हाहा का गाना बढ़
कर है इस पर हूहू हुज्जत करने लगा कि कैसे वह बढ़ कर है। मुनि जी क्रोध करके बोले
कि तुमने तो जुबान ग्राह (याने मगर) की तरह पकड़ ली इसलिए ग्राह होगे। इसी
शाप से हूहू ने मगर का जन्म पाया।
राजा इन्द्रद्युम्न द्रविण देश का राजा अगस्त्य मुनि का शिष्य था। एक दिन जब
राजा पूजा पर था गुरुजी उसके यहाँ गये। राजा ईश्वर की पूजा का निरादर
समझ कर गुरूजी के लिये आसन से नहीं उठा जिस पर मुनिजी ने शाप दिया कि
तुम गज (हाथी) की तरह बैठे रह गये इससे हाथी हो जाव जिससे राजा ने हाथी
की योनि पाई।
कृष्णावतार होने पर इन दोनों का उद्धार हुआ—देखो गज और ग्राह की कथा
पृष्ठ २० में। (६) लगन । (७) वसवास, शंका।

राग बिलावल १५५
॥ राग बिलावल ॥
रब¹ राजिक² तू महरमी³, करतार बिनानी ।
अवगत अलख अलाह तू, कादिर परवानी ॥टेक॥
खालिक मालिक मेहरबाँ, सरबंगी स्वामी ।
निःचल अचल अगाध तू, निरगुन निःकामी ॥ १ ॥
राम रहीम करीम तू, कुदरत से न्यारा ।
गंध पुहुप ज्यूँ रम रहा, फूला गुलजारा ॥ २ ॥
पूरन ब्रह्म परम गुरू, अकाल अबिनासी ।
सब्द अतीत बिहंगमा, किस काल उदासी ॥ ३ ॥
अनुरागी निःतन्त कूँ, तन मन सब अरपूँ ।
सीस करूँ तिस वारने, चित चंदन चरचूँ ॥ ४ ॥
उस साहब महबूब कूँ, कर हर दम मुजरा ।
चित से नेक न बीसरूँ, दिल अंदर हुजरा⁴ ॥ ५ ॥
पत-राखन तू परद-पोस⁵, साहब दिल दाना ।
मीरा⁶ मेरे मेहर कर, पेखूँ खिलखाना⁷ ॥ ६ ॥
नूर निहारूँ नजर से, नैनों भर देखूँ ।
मूरत सूरत सकल कूँ, चसमों में पेखूँ ॥ ७ ॥
तेज पूँज की सेज है, सुन मंडल सीरा⁸ ।
अदली तखत खवास है, जहँ आप कबीरा ॥ ८ ॥
कुंभक ऊपर कुंभ है, गागर पर गगरी ।
संत बिबेकी पहुँचसी, उस अवगत नगरी ॥ ६ ॥
अवगत नगर निधान है, बेगमपुर बासा ।
बिरह बियोगी बिंध रहै, जहँ सब्द निवासा ॥१०॥
तन मन मिरतक ह्वै रहै, दिल दुई उठावै ।
सब्द समुंदर सिध में, ले अंग मिलावै ॥११॥
(१) साहब । (२) अन्नदाता । (३) सर्वज्ञ । (४) कोठा । (५) ऐब ढकने वाला ।
(६) स्वामी । (७) खिलवत खाना । (८) उत्तम भूमि ।

१५६ गरीबदास जी की बानी
खोजी खोज न पावहीं, गुरु भेद बिचारं ।
चार बेद चितवत भये, भूले भरम अचारं ॥ १२॥
पुरान अठारह गम नहीं, क्या गावै ज्ञानी ।
मौनी महल न पावहीं, बिन सतगुरु बानी ॥ १३॥
अष्ट योग जाने नहीं, षट कमल कसीसं ।
पाँचो मुद्रा वार हैं, पारख जगदीसं ॥ १४॥
बावन अच्छर ना चढ़ै, वह बिरहा बंगी ।
दास गरीब पिछानिया, सो हर दम संगी ॥ १५॥
( २ )
मतवालों के महल की, सूफी क्या पावै ।
अरस खुरदनी१ खीर है, सतगुरु बतलावै ॥टेक॥
सुन्न दरीबे हाट है, जहँ अमृत चुवता ।
ज्ञानी घाट न पावहीं, खाली सब कबिता ॥ १ ॥
टाँक२ बिकै नहिं मोल कूँ, जो तुलै न तौला ।
कूँची३ सब्द लगाय कर, सतगुरु पट खोला ॥ २ ॥
फूल झरै भाठी सरै४, जहँ फिरैं पियाले ।
नूर महल बेगमपुरा, घूमैं मतवाले ॥ ३ ॥
त्रिकुटी सिंध पिछान ले, तिरबेनी धारा ।
बेड़े५ बाट बिहंगमी, उतरै भौ पारा ॥ ४ ॥
अठसठ तीरथ ताल हैं, उस तरवर माहीं ।
अमर कंद६ फल नूर के, कोइ साधू खाहीं ॥ ५ ॥
नौ सै नदी अचूक७ हैं, उस मंझ तलाई ।
मेरुदंड कूँ छेद कर, सतगुरु बतलाई ॥ ६ ॥
मान सरोवर कुञ्ज है, जहँ हंसा खेलै ।
भौसागर की बाट तय, सतगुरु सत बोलै ॥ ७ ॥
(१) खाने के लायक । (२) चार माशे का बाट । (३) कुञ्जी । (४) चुवै । (५) छोटी
नाव । (६) खाने की पुत्ती । (७) परिपूर्ण ।

राग बिलावल १५७
हंसा मोती चुगत है, जुग जुग आधारा ।
खात न टूटै परमधन, जो अछै भंडारा ॥ ८ ॥
अमर कच्छ हंसा भये, मिल सब्द समाये ।
औघट लंघे साधवा, वे बहुर न आये ॥ ६ ॥
सुरँग लगावे सुन्न में, सो सतगुरु सूचा ।
मुक्ताहल¹ पद बेलड़ी², फल देवै ऊँचा ॥१०॥
सतगुरु मिलिया जौहरी, जिन जन्म सुधारा ।
ज्ञान खड़ग की गुर्ज³ से, दूतर⁴ सब मारा ॥११॥
बिरह बिथा का बादला, घट अंदर बूटा⁵ ।
दास गरीब दया भई, भल सतगुरु टूटा⁶ ॥१२॥
( ३ )
चिंतामनि कूँ चेत रे, मुक्ताहल पाया ।
सतगुरु मिलिया जौहरी, जिन्ह भेद बताया ॥ टेक ॥
हीरा मनि पारस परस, लख लाल नरेसा ।
मोती जवाहर जोगिया, वह दुर्लभ देसा ॥ १ ॥
कामधेनु कलबृच्छ हैं, दरबार हमारे ।
अठ सिधि नौ निधि आँगने, नित कारज सारे ॥ २ ॥
राग छतीसौ ऋषि सबै, जहाँ रास रवानी⁷ ।
ताल तँबूरे तूर हैं, अवगत निरबानी ॥ ३ ॥
सुन में बाजै डुगडुगी, बरवै⁸ पद गावै ।
चल हंसा उस देस कूँ, जो बहुर न आवै ॥ ४ ॥
नूर महल गुलजार है, निज सब्द समाये ।
हंसा बहुर ना आवहीं, सत लोक सिधाये ॥ ५ ॥
सतगुरु मंझ दलाल है, जिन सौदा कीन्हा ।
दास गरीब दया भई, सत साहब चीन्हा ॥ ६ ॥
(१) मोती। (२) बेल। (३) गदा। (४) दूत। (५) बरसा। (६) बख्शिश की।
(७) रमनीक, सुहावना। (८) एक रागिनी का नाम।
२१

१५८ गरीबदास जी की बानी
( ४ )
नूर नगर बेगमपुरा, पुर पट्टन थानं ।
सतगुरु सैन लखाइया, जो पद निर्बानं ॥ टेक ॥
कोकिल बानी होत है, पारख निःतंती ।
जाका मुजरा होयगा, तन काढै जंती ॥ १ ॥
अनुरागी निःतन्त है, पद पारख लीजै ।
प्रेम पियाला पीय कर, कहिं भेद न दीजै ॥ २ ॥
अनुरागी निःतन्त में, ले सुरत समोई ।
महल महरमी जाहिंगे, तन आपा खोई ॥ ३ ॥
सिंगल¹ बैन² अवाज है, जहँ सुरत समाही ।
निरत निरंतर रम रही, तहँ दूसर नाहीं ॥ ४ ॥
आसन अरसी पेख ले, सुन मंडल मेला ।
सिंगी नादू बाजहीं, जहँ गुरु न चेला ॥ ५ ॥
(सिर) छत्र अनूपम सेत है, जहँ साहब रहता ।
चौर सुहंगम दुरत हैं, यूँ सतगुरु कहता ॥ ६ ॥
झिलमिल नूर अपार है, जहँ जंत्री जोगी ।
सकल बियापी रम रहा, पारस रस भोगी ॥ ७ ॥
दृष्ट मुष्ट आवै नहीं, मौनी महबूबं ।
बिरह बिहंगम बैत³ है, असली पद खूबं ॥ ८ ॥
उज्जल भँवर अनंत है, जहँ कुंजी बैना ।
सब्द अतीत समाधिया, लख उनमुन नैना ॥ ६ ॥
घाट बाट पावै नहीं, बिन सतगुरु सैना ।
भेष परे हैं भरम में, सब फोकट फैना⁴ ॥१०॥
सुरत निरत मन पवन का, इक अंग बनाया ।
सो हंसा सुन में गये, सत लोक बसाया ॥११॥
(१) नाम संस्कृत की कबिता जारी करने वाले का; राग । (२) शब्द । (३) घर ।
(४) झूठा झगड़ा ।

राग विलावल १५६

बिन पर भँवर उड़ाइया, बिन पगों१ पयाना२ ।
दास गरीब अगमपुरी, जहँ ज्ञान न ध्याना ॥१२॥
( ५ )
मैं अमली निज नाम का, मद खूब चुवाया ।
पिया पियाला प्रेम का, सिर साँटे३ पाया ॥ टेक ॥
गन गंधर्प जोधा बड़े, कैसे ठहराया ।
सील खेत रन जंग में, सतगुरु सर४ लाया ॥ १ ॥
पाँच सखी नित संग हैं, कैसे हैं त्यागी ।
अमर लोक अनहद रते, सोई अनुरागी ॥ २ ॥
परपंची पाकर५ लिया, बिरहे का कंपा६ ।
जहँ संख पद्म उजियार है, भलकल है चंपा ॥ ३ ॥
कुंभ७ कलाली भर दिया, महँगा मद नीका ।
और अमल नापाक है, सब लागत फीका ॥ ४ ॥
एक रती पावे नहीं, बिन सीस चढ़ाये ।
वह साहब राजी नहीं, नर मुंड मुड़ाये ॥ ५ ॥
नौधा के नर बहुत हैं, बैकुंठ सिधौरा८ ।
सुकिरत नाम सँभालियो, लूटत जम जौरा ॥ ६ ॥
सुकिरत नाम समीप है, सिव गौर सुनाया ।
सुवटे से सुकदे हुआ, पारस पद पाया९ ॥ ७ ॥
रंग महल में रोसनी, रमते से मेला ।
परसा दास गरीब है, सतगुरु का चेला ॥ ८ ॥
( ६ )
आज का लाहा लीजिये, कल्ह किस कूँ होई ।
यह तन माटी में मिलै, जानै सब कोई ॥ टेक ॥

(१) पांव । (२) चलाना । (३) बदले में यानी सिर देकर । (४) बान । (५) पकड़ ।
(६) चिड़िया फँसाने की तीलियाँ । (७) घड़ा । (८) जाने वाले । (९) देखो कथा नोट
पृष्ठ ७८ ।

१६० गरीवदास जी की बानी
लखी करोड़ी चल गये, बहु जोड़ खजाना ।
जा तन चंदन लेपते, सो धरे मसाना ॥ १ ॥
हस्ती घोड़े पालकी, दल बल बहु साजा ।
सवा लाख संगी गये, रावन से राजा ॥ २ ॥
कुम्भकरन से बीर थे, लंका छत्रधारी ।
नाम बिना बंस बूड़ि है, समझावै नारी ॥ ३ ॥
भभीछन पद भेदिया, निरगुन निरबाना ।
रावन दई बिसार रे, तज गरब गुमाना ॥ ४ ॥
बड़ चकवै१ काल चक्र पड़े, जिन नाम बिसारा ।
कंस केसि चानूर से, धर बाल पछारा ॥ ५ ॥
हिरनाकुस समझे नहीं, पहलाद पढ़ावै ।
उदर बिनासा आन कर, तब कौन छुड़ावै ॥ ६ ॥
जरासिंध से मारिया, और सहस्राबाहू ।
ग्राह से गजहि छुड़ाइया, निज नाम है साऊ२ ॥ ७ ॥
दूसासन पर लै गये, एकोतर३ भाई ।
दुरजोधन की देह कूँ, तन गीधन खाई ॥ ८ ॥
निरगुन निरभय नाम है, भज लोजो सोई ।
अगर दीप सतलोक में, तब बासा होई ॥ ६ ॥
सहस अठासी दीप में, उतपति की खानी ।
दास गरीब भक्ती मिलै, जब थिर होय प्रानी ॥१०॥
( ७ )
ज्ञान की अँखियाँ रँग भरी, लै नहि निज नूरी ।
मिरगा बाहर भरमही, नाभी कस्तूरी ॥ टेक ॥
पीतंबर मस्तक बना, त्रिकुटी अति सोहै ।
सो घट छाना४ ना रहै, पद५ परसा लोहै ॥ १ ॥
(१) चक्रवर्ती राजा । (२) सहायक । (३) एक से एक । (४) खाली । (५) त्रिकुटी
पद को "पारस" कहा है ।

राग बिलावल १६१

सील संतोष बिबेक रे, और ज्ञान विज्ञाना।
दया दुलीचे बैठ कर, है ब्रह्म समाना ॥ २ ॥
छिमा छत्र जेहि ढुरत है, तामस नहिं तेजं।
सो नर परसे जानिये, अवगत की सेजं ॥ ३ ॥
कमल हिरंबर खिल रहे, अनुभौ अनुरागी।
दास गरीब सतलोक के, सोई बैरागी ॥ ४ ॥
( ८ )
सजन सुराही हाथ है, अमृत का प्याला।
हम बिरहिन बिरहै रँगी, कोई पूछै हाला ॥ टेक ॥
चोखा फूल चुवाइया, बिरहिन के ताईं।
मतवाला महबूब है, मेरा अलख गुसाईं ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीय कर, मैं भई दिवानी।
कहा कहूँ उस देस की, कुछ अकथ कहानी ॥ २ ॥
बरवै राग सुनाय कर, गल डारी फाँसी।
गाँठ घुली१ खुलै नहीं, साजन अबिनासी ॥ ३ ॥
गुझ की बात किस कूँ कहूँ, कोई महरम जानै।
अगली पिछली मत गई, बेधी इक तानै२ ॥ ४ ॥
सुन्न मँडल सतलोक से, बिरहा चल आया।
मुझ बिरहिन के लेन कूँ, मेरे सजन पठाया ॥ ५ ॥
रोम रोम में राग है, बिरहा रँग रासी।
लोक बेद झूठे लगे, पिछली बुध नासी ॥ ६ ॥
अनहद नादू बाजहीं, अमरापुर माँई।
सुन्न मँडल सतलोक कूँ, दुलहिन उठ धाई ॥ ७ ॥
अरस गुमठ गुलजार है, गैबी गलताना।
सेत धजा जहँ फरहरैं, पँचरंग निसाना ॥ ८ ॥

(१) मज़बूत हो गई। (२) एक ही तान में बेध दिया।

१६२ गरीबदास जी की बानी
तन मन छाकै प्रेम से, मन मंगल महली ।
दुलहिन दास गरीब है, जहाँ सेज सलहली¹ ॥ ६ ॥
( ९ )
सुन्न सरोवर हंस मन, मोती चुग आया ।
अगर दीप सतलोक में, ले अजर झराया ॥ टेक ॥
हंस हिरंबर हेत है, हैरान निसानी ।
सुख सागर मुक्ता भये, मिल बारह बानी² ॥ १ ॥
पिंड अंड ब्रह्मांड से, वह न्यारा नादू ।
सुन्न समभिया बेग रे, गये बाद बिबादू ॥ २ ॥
सतगुरु सार जु गाइया, धर कूंची ताला ।
रंग महल में रोसनी, घट भया उजाला ॥ ३ ॥
दीपक जोड़ा नूर का, ले अस्थिर बाती ।
बहुर न भौजल आवहीं, निरगुन के नाती ॥ ४ ॥
नाम सहर बेगमपुरा, जहाँ लागी ताली ।
सब घट मन मौजूद है, नाहीं कोउ खाली ॥ ५ ॥
अजब दिवाना देस है, जहाँ हिल मिल रहिये ।
कहता दास गरीब है, मुक्ता पद लहिये³ ॥ ६ ॥
( १० )
ज्ञान तुरंगम⁴ पाड़िया⁵, ताजी दरियाई ।
पासर⁶ घाली प्रेम की, चित चाबुक लाई ॥ टेक ॥
प्रेम धाम से ऊतरे, हुकमी सैलानी ।
सब्द सिध मेला करें, हंसों के दानी ॥ १ ॥
असंख जुग परलै गये, जब के गुन गाऊँ ।
ज्ञान गुरज है दस्त में, ले हंस चिताऊँ ॥ २ ॥
(१) सुखाली। (२) खालिस सोना। (३) पाइये। (४) घोड़ा। (५) इकट्ठा किया।
(६) डोरी, फंदा।

राग बिलावल १६३
सील हमारा सेल१ है, औ छिमा कटारी ।
तत्त तीर तक मार हूँ, कहँ जात अनारी ॥ ३ ॥
बुधि हमरी बन्दूक है, दिल अंदर दारू२ ।
प्रेम पियाला सार का, चित चकमक झारू३ ॥ ४ ॥
तत्त हमारी तेग४ है, जो असल असीलं ।
सूरे सनमुख लेत हैं, कायर मुख पीलं ॥ ५ ॥
घायल घूमै अरस में, जिस लगी करारी ।
औषध निःचा नाम है, जिन्ह पीड़५ पुकारी ॥ ६ ॥
पाखरिया६ सतलोक के, रन-जीत पठाये ।
कहता दास गरीब है, गुरुगम से आये ॥ ७ ॥
( ११ )
घट ही अंदर गारडू७, धोखे मर गइया ।
सार सब्द चीन्हा नहीं, कुछ भेद न लहिया ॥ टेक ॥
न्योल जड़ी कूँ सूँघ कर, गृह डंक लगावै ।
सरपिन बाँबिहि सूँ डसी, कहिं जान न पावै ॥ १ ॥
बाजी अनहद बीन रे, फूँ भई फुँकारा ।
भगल बिद्या बाजीगरी, जानै गुरु म्हारा ॥ २ ॥
सतगुरु मिलिया गारडू, जिन्ह मंतर दीन्हा ।
नागदमन८ तिरगुन जड़ी, बिषयर६ बस कीन्हा ॥ ३ ॥
बाजीगर की डुगडुगी, बिषयर भरमाया ।
घाल पिटारे ले चला, घरबार नचाया ॥ ४ ॥
ऐसा सतगुरु कीजिये, बाजीगर पूरा ।
दास गरीब अमर करै, दिल दरस जहूरा ॥ ५ ॥
(१) भाला । (२) बारूद । (३) एक लोहे की चीज जिसको पत्थरों पर मार कर
आग निकालते हैं । (४) तलवार । (५) दरद । (६) लोहे की जाली जो लड़ाई में घोड़े
की हिफाजत के लिए उस पर डालते हैं । (७) साँप का मंत्र जानने वाला । (८) साँप की
जड़ी । (६) साँप ।

१६४ गरीबदास जी की बानी
( १२ )
दरदमंद दरवेस है, बेदरद कसाई।
संत समागम कीजिये, तज लोक बड़ाई॥ टेक॥
डिंभी१ डिंभ न छोड़हीं, मरघट के भूता।
घर घर द्वारे फिरत हैं, कलजुग के कूता॥ १॥
डिंभ करें डुंगर२ चढ़ें, तप होम अँगीठी।
पंच अगिन पाखंड है, यह मुक्ति बसीठी३॥ २॥
पाती तोरे क्या हुआ, बहु पान झरो रे।
तुलसी बकरा खा गया, ठाकुर क्या बौरे॥ ३॥
पीतल ही का थाल है, पीतल का लोटा।
जड़ मूरत कूँ पूजते, आवैगा टोटा॥ ४॥
पीतल चमचा पूजिये, जो खान परोसै।
जड़ मूरत किस काम की, मत रहौ भरोसे॥ ५॥
कासी गया पराग४ रे, हरपैड़ी नहाये।
तारावति५ दरसन किये, बहु दाग दगाये॥ ६॥
इन्द्रदौन अस्नान रे, कर पुस्कर परसे।
द्वादस तिलक बनाय कर, बहु चंदन चरचे॥ ७॥
अठसठ तीरथ सब किये, बृन्दावन फेरी।
नाम बिना खूले नहीं, दिब दृष्ट अँधेरी॥ ८॥
सतगुरु भेद लखाइया, निज नूर निसानी।
कहता दास गरीब है, छूटे सो प्रानी॥ ६॥
( १३ )
नजर निहाल दयाल हैं, मेरे अंतरजामी।
सोलह कला सपूरना, लख बारहबानी६॥ टेक॥
(१) धोखेबाज। (२) पहाड़। (३) बकवाद। (४) प्रयाग। (५) द्वारिका।
(६) खालिस सोना।

राग बिलावल १६५
उलट मेरुडंड चढ़ गये, देखा सो देखा।
संख कोटि रबि झिलमिलैं, गिनती नहिं लेखा॥ १॥
बरन बरन के तेज हैं, पँचरंग परेवा१।
मूरत कोट असंख्य हैं, जा मध इक देवा॥ २॥
(जाके) ब्रह्मा झाडू देत हैं, संकर करें पंखा।
सेस चरन चंपी लगैं२, अगमी गढ़ बंका॥ ३॥
धर ऐनक दुरबीन कूँ, धुन ध्यान लगावै।
उलट कमल अरसा३ चढ़े, तब नजरों आवै॥ ४॥
सूछम मूरत सोहनी, अगमै इक-रासा।
रहता रमता राम है, घट पिंड न स्वासा॥ ५॥
जो देखा सो किस कहूँ, अचरज इक ख्याला।
कहता दास गरीब है, निज रूप बिसाला॥ ६॥
( १४ )
सोई साध अगाध है, आपा न सरावै४।
पर निंदा नहिं संचरै, चुगली नहिं खावै॥ टेक॥
काम क्रोध त्रिस्ना नहीं, आसा नहिं राखै।
साँचे सूँ परचा भया, जब कूड़ न भाखै॥ १॥
एकै नजर निरंजना, सबही घट देखै।
ऊँच नीच अंतर नहीं, सब एकै पेखै॥ २॥
सोई साध सिरोमनी, जप तप उपकारी।
भूले कूँ उपदेस दे, दुर्लभ संसारी॥ ३॥
अकल५ यकीन पठाय दे, भूले कूँ चेतै।
सो साधू संसार में, हम बिरले भेंटे॥ ४॥
सूतक६ खोवैं सत कहैं, साँचे सूँ लावैं।
सो साधू संसार में, हम बिरले पावैं॥ ५॥
(१) कबूतर—यहाँ हंस से मतलब है। (२) मुक्की लगाना, पाँव दाबना। (३) अर्श।
(४) सराह्रै। (५) बुद्धि। (६) अशुद्धता।
३२

१६६ गरीबदास जी की बानी
निरख निरख पग धरत हैं, जिव हिंसा नाहीं ।
चौरासी तारन तरन, आये जग माहीं ॥ ६ ॥
इस सौदे कूँ ऊतरे, सौदागर सोई ।
भरे जहाज उतार दे, भौसागर लोई ॥ ७ ॥
भेष धरैं भागे फिरैं, बहु साखी सीखैं ।
जानैं नहीं बिबेक कूँ, खर के ज्यूँ रीकैं१ ॥ ८ ॥
खास मुकामा दरस है, जो अरस रहंता ।
उनमुन में तारी लगी, जहँ अजप जपंता ॥ ६ ॥
सुन्न महल अस्थान है, जहँ अस्थिर डेरा ।
दास गरीब सुभान२ है, सत साहब मेरा ॥१०॥
( १५ )
सत्त कहन कूँ राम है, दूजा नहिं देवा ।
ब्रह्मा बिसुन महेस से, जा की करते सेवा ॥ टेक ॥
जप तप तीरथ थोथरे, जा की क्या आसा ।
कोट जग्ग पन दान से, जम कटै न फाँसा ॥ १ ॥
इहाँ देन उहा लेन है, यह मिटै न झगरा ।
बिना पंथ की बाट है, पावै को डगरा३ ॥ २ ॥
बिन ही इच्छा देन है, सो दान कहावै ।
फल बंधै४ नहिं तासु का, अमरापुर जावै ॥ ३ ॥
सकल दीप नौ खंड के, छत्री जिन जीते ।
सो तो पद में ना मिले, बिद्या गुन चीते५ ॥ ४ ॥
कोट उनंचा६ पृथ्वी, जिन दीन्ही दाना ।
परसराम औतार कूँ, कीन्हे कुरबाना ॥ ५ ॥
कंचन मेरु सुमेर रे, आये सब माहीं ।
काम धेनु कल्प बृच्छ रे, सो दान कराहीं ॥ ६ ॥
(१) गधे को तरह रेंकैं। (२) पवित्र । (३) रास्ता । (४) चाहै । (५) क्योंकि उनके
चित्त में बिद्या और गुन का घमंड था । (६) शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी उन्चास कोट
जोजन नाप में है ।

राग बिलावल १६७
सुर नर मुनि जन सेवहीं, सनकादिक ध्यावैं।
सेस महेस मुख रटत हैं, जाका पार न पावैं ॥ ७ ॥
ब्रह्मा बिसुन महेस रे, देवा दरबारी।
संख कलप जुग हो गये, जाकी खुलै न तारी ॥ ८ ॥
परलै संख असंख रे, पल माँह बिहानी१।
गरीबदास निज नाम की, महिमा हम जानी ॥ ६ ॥
( १६ )
सुख के सागर राम हैं, जेहि धरिये ध्याना।
तिरबेनी के घाट रे, कीजे असनाना ॥ टेक ॥
नाभि कमल से उच्चरे, दम लेखे लावो।
परबी कोट अनंत हैं, सुख सागर न्हावो ॥ १ ॥
अनंत कोट धुन होत हैं, सुख सागर माहीं।
पैड़ी पंथ न महल के, जहाँ हंसा जाहीं ॥ २ ॥
औं मूल उच्चार है, जपिये मन माला।
सुछम बेद से धुन लगी, पहुँ चे चित्र साला ॥ ३ ॥
ऐनक आदि अनाद है, दुरबीन धियाना।
पलकों चौरा कीजिये, त्रिकुटी अस्थाना ॥ ४ ॥
सहस कमल दल जगमगै, जहाँ भँवर गुँजारा।
घटा गरज बहु दामिनी, अनहद झनकारा ॥ ५ ॥
गरजै सिंध अगाध रे, बिन सरवन सुनिया।
नर की क्या बुनियाद है, पहुँचत नहि मुनिया२ ॥ ६ ॥
मन पौना के गमन३ से, आगे लख भाई।
सुरत निरत के पंख ले, हंसा उड़ जाई ॥ ७ ॥
अधर बिहंगम उड़ चलै, भौंरी ले भौंरा।
गरीबदास कहु क्या करै, जा का जम जोरा ॥ ८ ॥
(१) बीत गये। (२) मुनी। (३) पहुँच।

१६८ गरीबदास जी की बानी
( १७ )
कर साहब की बंदगी, बैरागर ले रे।
समरथ साँई सीस पर, तो कूँ क्या भै रे॥ टेक ॥
सील संतोष बिबेक हैं, अरु ज्ञान बिज्ञाना।
दया धरम चित चौतरे, बाँचो परवाना॥ १ ॥
धरम धजा जहँ फरहरै, होहि जग१ ज्योणारा।
कथा कीरतन होत है, साहब दरबारा॥ २ ॥
सुमता२ माता मित्र है, रख अकल यकीनं।
सत्त धरे तें खुलत है, दिल में दुरबीनं॥ ३ ॥
जा के पिता बिबेक से, अरु भाव से भाई।
या पटतर३ नहिं और है, कुछ बहिन सगाई४ ॥ ४ ॥
दृढ़ के डुंगर५ चढ़ गये, जहँ गुफा अनादं।
लागी सब्द समाध रे, धन सतगुरु साधं॥ ५ ॥
सहस मुखी जहँ गंग है, तालिब तिरबेनी।
जहाँ ध्यान असनान कर, परबी सुख चैनी॥ ६ ॥
कोट करम कसमल६ कटै, उस परबी नहाये।
वह साहब राजी नहीं, कुछ नाचे गाये॥ ७ ॥
अगर मूल महकंत है, जहँ गंध सुगंधा।
एक पलक के ध्यान से, कटिहै सब फंदा॥ ८ ॥
दो मुड़ की भाठी चुवै, जहँ सुखमन पोता।
इला पिंगला एक कर, सुखसागर गोता॥ ६ ॥
अबल बली बारियाम है, निरगुन निरबानी।
अनंत कोट बाजे बजैं, बाजैं सहदानी७ ॥१०॥
तन मन निःचल हो गया, निज पद से लागे।
एक पलक के ध्यान से, दुन्दर८ सब भागे ॥११॥
(१) यज्ञ। (२) सुमति, अच्छी बुद्धि। (३) बराबर। (४) सगी, अपनी। (५)
पहाड़। (६) पाप। (७) शहनाई। (८) दुन्द, अंधकार।

राग बिलावल १६६
पुर पट्टन के घाट में, एक पिगल पंथा।
छुटैं फुहारे नूर के, जहँ धार अनंता ॥१२॥
झिल मिल झिल मिल होत है, उस पुर में भाई।
घाट बाट पावै नहीं, है द्वारा राई१ ॥१३॥
तहँ वहँ संख सुरंग है, मध औघट घाटा।
सतगुरु मिलैं कबीर से, तब खुलै कपाटा ॥१४॥
सेत कमल जहँ जगमगै, पीताँबर छाया।
सूरज संख सुभान२ है, अबिनासी राया ॥१५॥
अगर डोर से चढ़ गये, धुन अलल धियाना।
दास गरीब कबीर का, पाया अस्थाना ॥१६॥
( १८ )
लोक लाज नहिं कीजिये, निरभय हो रहिये।
यह मन साधों दीजिये, (तौ) गोबिन्द पद पइये ॥ टेक ॥
भौसागर जोनी जनम, हरि दास मिटावैं।
बहुर बहुर नहिं आवहीं, मुक्ता पद पावैं ॥ १ ॥
ऐसे हरि जन संत हैं, संगत नित कीजै।
झूठे जग की लाज में, नाहीं चित दीजै ॥ २ ॥
यह जग बदरा३ धुँध का, मिहर४ पौना डरिये।
जौ मन चाहे राम कूँ, दासा तन करिये ॥ ३ ॥
हस्ती डर माने नहीं, जे स्वान भुकाहीं।
सतसंगी संगत ना तजैं, चित राम बसाहीं ॥ ४ ॥
स्वान रूप संसार है, कुछ करसी नाहीं।
सीस महल कूँ देख कर, भौंकत मर जाहीं ॥ ५ ॥
मतवाले महबूब हैं, साधू जग माहीं।
गरीबदास समझावहीं, जिग्यासी५ ताईं ॥ ६ ॥
(१) राई के समान झीना। (२) पवित्र। (३) बादल। (४) मिहर अर्थात दया
के पवन से डरता है। (५) खोजी।