गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १६६
पुर पट्टन के घाट में, एक पिगल पंथा।
छुटैं फुहारे नूर के, जहँ धार अनंता ॥१२॥
झिल मिल झिल मिल होत है, उस पुर में भाई।
घाट बाट पावै नहीं, है द्वारा राई१ ॥१३॥
तहँ वहँ संख सुरंग है, मध औघट घाटा।
सतगुरु मिलैं कबीर से, तब खुलै कपाटा ॥१४॥
सेत कमल जहँ जगमगै, पीताँबर छाया।
सूरज संख सुभान२ है, अबिनासी राया ॥१५॥
अगर डोर से चढ़ गये, धुन अलल धियाना।
दास गरीब कबीर का, पाया अस्थाना ॥१६॥
( १८ )
लोक लाज नहिं कीजिये, निरभय हो रहिये।
यह मन साधों दीजिये, (तौ) गोबिन्द पद पइये ॥ टेक ॥
भौसागर जोनी जनम, हरि दास मिटावैं।
बहुर बहुर नहिं आवहीं, मुक्ता पद पावैं ॥ १ ॥
ऐसे हरि जन संत हैं, संगत नित कीजै।
झूठे जग की लाज में, नाहीं चित दीजै ॥ २ ॥
यह जग बदरा३ धुँध का, मिहर४ पौना डरिये।
जौ मन चाहे राम कूँ, दासा तन करिये ॥ ३ ॥
हस्ती डर माने नहीं, जे स्वान भुकाहीं।
सतसंगी संगत ना तजैं, चित राम बसाहीं ॥ ४ ॥
स्वान रूप संसार है, कुछ करसी नाहीं।
सीस महल कूँ देख कर, भौंकत मर जाहीं ॥ ५ ॥
मतवाले महबूब हैं, साधू जग माहीं।
गरीबदास समझावहीं, जिग्यासी५ ताईं ॥ ६ ॥
(१) राई के समान झीना। (२) पवित्र। (३) बादल। (४) मिहर अर्थात दया
के पवन से डरता है। (५) खोजी।