गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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तन मन छाकै प्रेम से, मन मंगल महली ।
दुलहिन दास गरीब है, जहाँ सेज सलहली¹ ॥ ६ ॥
( ९ )
सुन्न सरोवर हंस मन, मोती चुग आया ।
अगर दीप सतलोक में, ले अजर झराया ॥ टेक ॥
हंस हिरंबर हेत है, हैरान निसानी ।
सुख सागर मुक्ता भये, मिल बारह बानी² ॥ १ ॥
पिंड अंड ब्रह्मांड से, वह न्यारा नादू ।
सुन्न समभिया बेग रे, गये बाद बिबादू ॥ २ ॥
सतगुरु सार जु गाइया, धर कूंची ताला ।
रंग महल में रोसनी, घट भया उजाला ॥ ३ ॥
दीपक जोड़ा नूर का, ले अस्थिर बाती ।
बहुर न भौजल आवहीं, निरगुन के नाती ॥ ४ ॥
नाम सहर बेगमपुरा, जहाँ लागी ताली ।
सब घट मन मौजूद है, नाहीं कोउ खाली ॥ ५ ॥
अजब दिवाना देस है, जहाँ हिल मिल रहिये ।
कहता दास गरीब है, मुक्ता पद लहिये³ ॥ ६ ॥
( १० )
ज्ञान तुरंगम⁴ पाड़िया⁵, ताजी दरियाई ।
पासर⁶ घाली प्रेम की, चित चाबुक लाई ॥ टेक ॥
प्रेम धाम से ऊतरे, हुकमी सैलानी ।
सब्द सिध मेला करें, हंसों के दानी ॥ १ ॥
असंख जुग परलै गये, जब के गुन गाऊँ ।
ज्ञान गुरज है दस्त में, ले हंस चिताऊँ ॥ २ ॥
(१) सुखाली। (२) खालिस सोना। (३) पाइये। (४) घोड़ा। (५) इकट्ठा किया।
(६) डोरी, फंदा।