गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १६५
उलट मेरुडंड चढ़ गये, देखा सो देखा।
संख कोटि रबि झिलमिलैं, गिनती नहिं लेखा॥ १॥
बरन बरन के तेज हैं, पँचरंग परेवा१।
मूरत कोट असंख्य हैं, जा मध इक देवा॥ २॥
(जाके) ब्रह्मा झाडू देत हैं, संकर करें पंखा।
सेस चरन चंपी लगैं२, अगमी गढ़ बंका॥ ३॥
धर ऐनक दुरबीन कूँ, धुन ध्यान लगावै।
उलट कमल अरसा३ चढ़े, तब नजरों आवै॥ ४॥
सूछम मूरत सोहनी, अगमै इक-रासा।
रहता रमता राम है, घट पिंड न स्वासा॥ ५॥
जो देखा सो किस कहूँ, अचरज इक ख्याला।
कहता दास गरीब है, निज रूप बिसाला॥ ६॥
( १४ )
सोई साध अगाध है, आपा न सरावै४।
पर निंदा नहिं संचरै, चुगली नहिं खावै॥ टेक॥
काम क्रोध त्रिस्ना नहीं, आसा नहिं राखै।
साँचे सूँ परचा भया, जब कूड़ न भाखै॥ १॥
एकै नजर निरंजना, सबही घट देखै।
ऊँच नीच अंतर नहीं, सब एकै पेखै॥ २॥
सोई साध सिरोमनी, जप तप उपकारी।
भूले कूँ उपदेस दे, दुर्लभ संसारी॥ ३॥
अकल५ यकीन पठाय दे, भूले कूँ चेतै।
सो साधू संसार में, हम बिरले भेंटे॥ ४॥
सूतक६ खोवैं सत कहैं, साँचे सूँ लावैं।
सो साधू संसार में, हम बिरले पावैं॥ ५॥
(१) कबूतर—यहाँ हंस से मतलब है। (२) मुक्की लगाना, पाँव दाबना। (३) अर्श।
(४) सराह्रै। (५) बुद्धि। (६) अशुद्धता।
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