गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १५५
॥ राग बिलावल ॥
रब¹ राजिक² तू महरमी³, करतार बिनानी ।
अवगत अलख अलाह तू, कादिर परवानी ॥टेक॥
खालिक मालिक मेहरबाँ, सरबंगी स्वामी ।
निःचल अचल अगाध तू, निरगुन निःकामी ॥ १ ॥
राम रहीम करीम तू, कुदरत से न्यारा ।
गंध पुहुप ज्यूँ रम रहा, फूला गुलजारा ॥ २ ॥
पूरन ब्रह्म परम गुरू, अकाल अबिनासी ।
सब्द अतीत बिहंगमा, किस काल उदासी ॥ ३ ॥
अनुरागी निःतन्त कूँ, तन मन सब अरपूँ ।
सीस करूँ तिस वारने, चित चंदन चरचूँ ॥ ४ ॥
उस साहब महबूब कूँ, कर हर दम मुजरा ।
चित से नेक न बीसरूँ, दिल अंदर हुजरा⁴ ॥ ५ ॥
पत-राखन तू परद-पोस⁵, साहब दिल दाना ।
मीरा⁶ मेरे मेहर कर, पेखूँ खिलखाना⁷ ॥ ६ ॥
नूर निहारूँ नजर से, नैनों भर देखूँ ।
मूरत सूरत सकल कूँ, चसमों में पेखूँ ॥ ७ ॥
तेज पूँज की सेज है, सुन मंडल सीरा⁸ ।
अदली तखत खवास है, जहँ आप कबीरा ॥ ८ ॥
कुंभक ऊपर कुंभ है, गागर पर गगरी ।
संत बिबेकी पहुँचसी, उस अवगत नगरी ॥ ६ ॥
अवगत नगर निधान है, बेगमपुर बासा ।
बिरह बियोगी बिंध रहै, जहँ सब्द निवासा ॥१०॥
तन मन मिरतक ह्वै रहै, दिल दुई उठावै ।
सब्द समुंदर सिध में, ले अंग मिलावै ॥११॥
(१) साहब । (२) अन्नदाता । (३) सर्वज्ञ । (४) कोठा । (५) ऐब ढकने वाला ।
(६) स्वामी । (७) खिलवत खाना । (८) उत्तम भूमि ।