गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० गरीवदास जी की बानी
लखी करोड़ी चल गये, बहु जोड़ खजाना ।
जा तन चंदन लेपते, सो धरे मसाना ॥ १ ॥
हस्ती घोड़े पालकी, दल बल बहु साजा ।
सवा लाख संगी गये, रावन से राजा ॥ २ ॥
कुम्भकरन से बीर थे, लंका छत्रधारी ।
नाम बिना बंस बूड़ि है, समझावै नारी ॥ ३ ॥
भभीछन पद भेदिया, निरगुन निरबाना ।
रावन दई बिसार रे, तज गरब गुमाना ॥ ४ ॥
बड़ चकवै१ काल चक्र पड़े, जिन नाम बिसारा ।
कंस केसि चानूर से, धर बाल पछारा ॥ ५ ॥
हिरनाकुस समझे नहीं, पहलाद पढ़ावै ।
उदर बिनासा आन कर, तब कौन छुड़ावै ॥ ६ ॥
जरासिंध से मारिया, और सहस्राबाहू ।
ग्राह से गजहि छुड़ाइया, निज नाम है साऊ२ ॥ ७ ॥
दूसासन पर लै गये, एकोतर३ भाई ।
दुरजोधन की देह कूँ, तन गीधन खाई ॥ ८ ॥
निरगुन निरभय नाम है, भज लोजो सोई ।
अगर दीप सतलोक में, तब बासा होई ॥ ६ ॥
सहस अठासी दीप में, उतपति की खानी ।
दास गरीब भक्ती मिलै, जब थिर होय प्रानी ॥१०॥
( ७ )
ज्ञान की अँखियाँ रँग भरी, लै नहि निज नूरी ।
मिरगा बाहर भरमही, नाभी कस्तूरी ॥ टेक ॥
पीतंबर मस्तक बना, त्रिकुटी अति सोहै ।
सो घट छाना४ ना रहै, पद५ परसा लोहै ॥ १ ॥
(१) चक्रवर्ती राजा । (२) सहायक । (३) एक से एक । (४) खाली । (५) त्रिकुटी
पद को "पारस" कहा है ।