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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१५६ गरीबदास जी की बानी
खोजी खोज न पावहीं, गुरु भेद बिचारं ।
चार बेद चितवत भये, भूले भरम अचारं ॥ १२॥
पुरान अठारह गम नहीं, क्या गावै ज्ञानी ।
मौनी महल न पावहीं, बिन सतगुरु बानी ॥ १३॥
अष्ट योग जाने नहीं, षट कमल कसीसं ।
पाँचो मुद्रा वार हैं, पारख जगदीसं ॥ १४॥
बावन अच्छर ना चढ़ै, वह बिरहा बंगी ।
दास गरीब पिछानिया, सो हर दम संगी ॥ १५॥
( २ )
मतवालों के महल की, सूफी क्या पावै ।
अरस खुरदनी१ खीर है, सतगुरु बतलावै ॥टेक॥
सुन्न दरीबे हाट है, जहँ अमृत चुवता ।
ज्ञानी घाट न पावहीं, खाली सब कबिता ॥ १ ॥
टाँक२ बिकै नहिं मोल कूँ, जो तुलै न तौला ।
कूँची३ सब्द लगाय कर, सतगुरु पट खोला ॥ २ ॥
फूल झरै भाठी सरै४, जहँ फिरैं पियाले ।
नूर महल बेगमपुरा, घूमैं मतवाले ॥ ३ ॥
त्रिकुटी सिंध पिछान ले, तिरबेनी धारा ।
बेड़े५ बाट बिहंगमी, उतरै भौ पारा ॥ ४ ॥
अठसठ तीरथ ताल हैं, उस तरवर माहीं ।
अमर कंद६ फल नूर के, कोइ साधू खाहीं ॥ ५ ॥
नौ सै नदी अचूक७ हैं, उस मंझ तलाई ।
मेरुदंड कूँ छेद कर, सतगुरु बतलाई ॥ ६ ॥
मान सरोवर कुञ्ज है, जहँ हंसा खेलै ।
भौसागर की बाट तय, सतगुरु सत बोलै ॥ ७ ॥
(१) खाने के लायक । (२) चार माशे का बाट । (३) कुञ्जी । (४) चुवै । (५) छोटी
नाव । (६) खाने की पुत्ती । (७) परिपूर्ण ।