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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

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पृष्ठ 168

१५८ गरीबदास जी की बानी
( ४ )
नूर नगर बेगमपुरा, पुर पट्टन थानं ।
सतगुरु सैन लखाइया, जो पद निर्बानं ॥ टेक ॥
कोकिल बानी होत है, पारख निःतंती ।
जाका मुजरा होयगा, तन काढै जंती ॥ १ ॥
अनुरागी निःतन्त है, पद पारख लीजै ।
प्रेम पियाला पीय कर, कहिं भेद न दीजै ॥ २ ॥
अनुरागी निःतन्त में, ले सुरत समोई ।
महल महरमी जाहिंगे, तन आपा खोई ॥ ३ ॥
सिंगल¹ बैन² अवाज है, जहँ सुरत समाही ।
निरत निरंतर रम रही, तहँ दूसर नाहीं ॥ ४ ॥
आसन अरसी पेख ले, सुन मंडल मेला ।
सिंगी नादू बाजहीं, जहँ गुरु न चेला ॥ ५ ॥
(सिर) छत्र अनूपम सेत है, जहँ साहब रहता ।
चौर सुहंगम दुरत हैं, यूँ सतगुरु कहता ॥ ६ ॥
झिलमिल नूर अपार है, जहँ जंत्री जोगी ।
सकल बियापी रम रहा, पारस रस भोगी ॥ ७ ॥
दृष्ट मुष्ट आवै नहीं, मौनी महबूबं ।
बिरह बिहंगम बैत³ है, असली पद खूबं ॥ ८ ॥
उज्जल भँवर अनंत है, जहँ कुंजी बैना ।
सब्द अतीत समाधिया, लख उनमुन नैना ॥ ६ ॥
घाट बाट पावै नहीं, बिन सतगुरु सैना ।
भेष परे हैं भरम में, सब फोकट फैना⁴ ॥१०॥
सुरत निरत मन पवन का, इक अंग बनाया ।
सो हंसा सुन में गये, सत लोक बसाया ॥११॥
(१) नाम संस्कृत की कबिता जारी करने वाले का; राग । (२) शब्द । (३) घर ।
(४) झूठा झगड़ा ।