गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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( १७ )
कर साहब की बंदगी, बैरागर ले रे।
समरथ साँई सीस पर, तो कूँ क्या भै रे॥ टेक ॥
सील संतोष बिबेक हैं, अरु ज्ञान बिज्ञाना।
दया धरम चित चौतरे, बाँचो परवाना॥ १ ॥
धरम धजा जहँ फरहरै, होहि जग१ ज्योणारा।
कथा कीरतन होत है, साहब दरबारा॥ २ ॥
सुमता२ माता मित्र है, रख अकल यकीनं।
सत्त धरे तें खुलत है, दिल में दुरबीनं॥ ३ ॥
जा के पिता बिबेक से, अरु भाव से भाई।
या पटतर३ नहिं और है, कुछ बहिन सगाई४ ॥ ४ ॥
दृढ़ के डुंगर५ चढ़ गये, जहँ गुफा अनादं।
लागी सब्द समाध रे, धन सतगुरु साधं॥ ५ ॥
सहस मुखी जहँ गंग है, तालिब तिरबेनी।
जहाँ ध्यान असनान कर, परबी सुख चैनी॥ ६ ॥
कोट करम कसमल६ कटै, उस परबी नहाये।
वह साहब राजी नहीं, कुछ नाचे गाये॥ ७ ॥
अगर मूल महकंत है, जहँ गंध सुगंधा।
एक पलक के ध्यान से, कटिहै सब फंदा॥ ८ ॥
दो मुड़ की भाठी चुवै, जहँ सुखमन पोता।
इला पिंगला एक कर, सुखसागर गोता॥ ६ ॥
अबल बली बारियाम है, निरगुन निरबानी।
अनंत कोट बाजे बजैं, बाजैं सहदानी७ ॥१०॥
तन मन निःचल हो गया, निज पद से लागे।
एक पलक के ध्यान से, दुन्दर८ सब भागे ॥११॥
(१) यज्ञ। (२) सुमति, अच्छी बुद्धि। (३) बराबर। (४) सगी, अपनी। (५)
पहाड़। (६) पाप। (७) शहनाई। (८) दुन्द, अंधकार।