गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १६१
सील संतोष बिबेक रे, और ज्ञान विज्ञाना।
दया दुलीचे बैठ कर, है ब्रह्म समाना ॥ २ ॥
छिमा छत्र जेहि ढुरत है, तामस नहिं तेजं।
सो नर परसे जानिये, अवगत की सेजं ॥ ३ ॥
कमल हिरंबर खिल रहे, अनुभौ अनुरागी।
दास गरीब सतलोक के, सोई बैरागी ॥ ४ ॥
( ८ )
सजन सुराही हाथ है, अमृत का प्याला।
हम बिरहिन बिरहै रँगी, कोई पूछै हाला ॥ टेक ॥
चोखा फूल चुवाइया, बिरहिन के ताईं।
मतवाला महबूब है, मेरा अलख गुसाईं ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीय कर, मैं भई दिवानी।
कहा कहूँ उस देस की, कुछ अकथ कहानी ॥ २ ॥
बरवै राग सुनाय कर, गल डारी फाँसी।
गाँठ घुली१ खुलै नहीं, साजन अबिनासी ॥ ३ ॥
गुझ की बात किस कूँ कहूँ, कोई महरम जानै।
अगली पिछली मत गई, बेधी इक तानै२ ॥ ४ ॥
सुन्न मँडल सतलोक से, बिरहा चल आया।
मुझ बिरहिन के लेन कूँ, मेरे सजन पठाया ॥ ५ ॥
रोम रोम में राग है, बिरहा रँग रासी।
लोक बेद झूठे लगे, पिछली बुध नासी ॥ ६ ॥
अनहद नादू बाजहीं, अमरापुर माँई।
सुन्न मँडल सतलोक कूँ, दुलहिन उठ धाई ॥ ७ ॥
अरस गुमठ गुलजार है, गैबी गलताना।
सेत धजा जहँ फरहरैं, पँचरंग निसाना ॥ ८ ॥
(१) मज़बूत हो गई। (२) एक ही तान में बेध दिया।