गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १५७
हंसा मोती चुगत है, जुग जुग आधारा ।
खात न टूटै परमधन, जो अछै भंडारा ॥ ८ ॥
अमर कच्छ हंसा भये, मिल सब्द समाये ।
औघट लंघे साधवा, वे बहुर न आये ॥ ६ ॥
सुरँग लगावे सुन्न में, सो सतगुरु सूचा ।
मुक्ताहल¹ पद बेलड़ी², फल देवै ऊँचा ॥१०॥
सतगुरु मिलिया जौहरी, जिन जन्म सुधारा ।
ज्ञान खड़ग की गुर्ज³ से, दूतर⁴ सब मारा ॥११॥
बिरह बिथा का बादला, घट अंदर बूटा⁵ ।
दास गरीब दया भई, भल सतगुरु टूटा⁶ ॥१२॥
( ३ )
चिंतामनि कूँ चेत रे, मुक्ताहल पाया ।
सतगुरु मिलिया जौहरी, जिन्ह भेद बताया ॥ टेक ॥
हीरा मनि पारस परस, लख लाल नरेसा ।
मोती जवाहर जोगिया, वह दुर्लभ देसा ॥ १ ॥
कामधेनु कलबृच्छ हैं, दरबार हमारे ।
अठ सिधि नौ निधि आँगने, नित कारज सारे ॥ २ ॥
राग छतीसौ ऋषि सबै, जहाँ रास रवानी⁷ ।
ताल तँबूरे तूर हैं, अवगत निरबानी ॥ ३ ॥
सुन में बाजै डुगडुगी, बरवै⁸ पद गावै ।
चल हंसा उस देस कूँ, जो बहुर न आवै ॥ ४ ॥
नूर महल गुलजार है, निज सब्द समाये ।
हंसा बहुर ना आवहीं, सत लोक सिधाये ॥ ५ ॥
सतगुरु मंझ दलाल है, जिन सौदा कीन्हा ।
दास गरीब दया भई, सत साहब चीन्हा ॥ ६ ॥
(१) मोती। (२) बेल। (३) गदा। (४) दूत। (५) बरसा। (६) बख्शिश की।
(७) रमनीक, सुहावना। (८) एक रागिनी का नाम।
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