गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराग बिलावल १६७
सुर नर मुनि जन सेवहीं, सनकादिक ध्यावैं।
सेस महेस मुख रटत हैं, जाका पार न पावैं ॥ ७ ॥
ब्रह्मा बिसुन महेस रे, देवा दरबारी।
संख कलप जुग हो गये, जाकी खुलै न तारी ॥ ८ ॥
परलै संख असंख रे, पल माँह बिहानी१।
गरीबदास निज नाम की, महिमा हम जानी ॥ ६ ॥
( १६ )
सुख के सागर राम हैं, जेहि धरिये ध्याना।
तिरबेनी के घाट रे, कीजे असनाना ॥ टेक ॥
नाभि कमल से उच्चरे, दम लेखे लावो।
परबी कोट अनंत हैं, सुख सागर न्हावो ॥ १ ॥
अनंत कोट धुन होत हैं, सुख सागर माहीं।
पैड़ी पंथ न महल के, जहाँ हंसा जाहीं ॥ २ ॥
औं मूल उच्चार है, जपिये मन माला।
सुछम बेद से धुन लगी, पहुँ चे चित्र साला ॥ ३ ॥
ऐनक आदि अनाद है, दुरबीन धियाना।
पलकों चौरा कीजिये, त्रिकुटी अस्थाना ॥ ४ ॥
सहस कमल दल जगमगै, जहाँ भँवर गुँजारा।
घटा गरज बहु दामिनी, अनहद झनकारा ॥ ५ ॥
गरजै सिंध अगाध रे, बिन सरवन सुनिया।
नर की क्या बुनियाद है, पहुँचत नहि मुनिया२ ॥ ६ ॥
मन पौना के गमन३ से, आगे लख भाई।
सुरत निरत के पंख ले, हंसा उड़ जाई ॥ ७ ॥
अधर बिहंगम उड़ चलै, भौंरी ले भौंरा।
गरीबदास कहु क्या करै, जा का जम जोरा ॥ ८ ॥
(१) बीत गये। (२) मुनी। (३) पहुँच।