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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 186 में से

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पृष्ठ 164

१५४ गरीबदास जी की बानी
कासी गहन बहन भये१ प्रानी, प्राग न्हात है माहा२ ।
बिना नाम जोनी नहिं छूटै, भरमै भूल भुलाहा ॥ १ ॥
सहस मुखी गंगा नहिं न्हाते, खोदें ऊजड़ बाहा३ ।
नारद ब्यास पूछ सुकदे कूँ, चारो वेद उगाहा४ ॥ २ ॥
पंथ पुरातन खोज लिया है, चाले अवगत राहा ।
सुकदे ज्ञान सुना संकर का, मिटी न मन की दाहा ॥ ३ ॥
दो तपिया गुन तप कूँ लागे, बंदे हूहू हाहा५ ।
लगा सराप परे भौसागर, कीन्हें गज अरु ग्राहा ॥ ४ ॥
सिव संकर के तिलक किया है, नारद सोधा साहा६ ।
ब्रह्मादिक ने चौरी रचिया, किया गौर का ब्याहा ॥ ५ ॥
इक सौ आठ गये तन परलै, बहुर किया निरबाहा ।
सिव के संग गौरजा उधरी, मिट गया काल उसाहा७ ॥ ६ ॥
ज्यूँ सर्पा की पूँछ पकर कर, अंदर उलटा जाहा ।
नीर कबीर सिंध सुखसागर, पद मिल गया जुलाहा ॥ ७ ॥
हमरा ज्ञान ध्यान नहिं बूझा, समझ न परी अगाहा ।
दासगरीब पार कस उतरै, भेंटा नहीं मलाहा ॥ ८ ॥
(१) बहे । (२) महीने भर । (३) नहर । (४) संग्रह किया ।
(५) हूहू और हाहा दो गंधर्वों के नाम हैं जो गान विद्या में बड़े निपुन थे। दोनों
में झगड़ा हुआ कि कौन बढ़ कर गाता है इसलिये वे निर्णय कराने को देवल ऋषि के
पास गये। देवल ऋषि ने उन दोनों का गाना सुन कर कहा कि हाहा का गाना बढ़
कर है इस पर हूहू हुज्जत करने लगा कि कैसे वह बढ़ कर है। मुनि जी क्रोध करके बोले
कि तुमने तो जुबान ग्राह (याने मगर) की तरह पकड़ ली इसलिए ग्राह होगे। इसी
शाप से हूहू ने मगर का जन्म पाया।
राजा इन्द्रद्युम्न द्रविण देश का राजा अगस्त्य मुनि का शिष्य था। एक दिन जब
राजा पूजा पर था गुरुजी उसके यहाँ गये। राजा ईश्वर की पूजा का निरादर
समझ कर गुरूजी के लिये आसन से नहीं उठा जिस पर मुनिजी ने शाप दिया कि
तुम गज (हाथी) की तरह बैठे रह गये इससे हाथी हो जाव जिससे राजा ने हाथी
की योनि पाई।
कृष्णावतार होने पर इन दोनों का उद्धार हुआ—देखो गज और ग्राह की कथा
पृष्ठ २० में। (६) लगन । (७) वसवास, शंका।