श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
तीसवाँ अध्याय ८१७
ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृताः ।
जघ्नुर्द्विषस्तैः कृष्णेन वार्यमाणास्तुतं च ते ॥ २१ ॥
यादवों ने पटेर हाथ में लेते ही वे वज्र की दहकने लगे। फिर अत्यन्त प्रखर होकर उन्होंने 'परिधि' की
आकृति धारण कर ली। फिर वे उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। पहले अन्य शस्त्रों का उन पर कोई प्रभाव नहीं
होता था लेकिन पटेर की मार से वे तत्काल मर जाते थे। उस पटेर की मार के आगे यादवों की चल नहीं पा रही थी
और वे एक-दूसरे का शिरच्छेद कर गिराने लगे। रण में शेष यादवों को मारने के बाद जो महावीर यादव थे वही
बच गये। ये यादव हाथी की तरह उन्मत्त थे और किसी के वश में आने लायक नहीं थे, इसलिये उनका निश्चित
रूप से निर्दलन करने के लिये श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा पूरी करने की दृष्टि से दौड़ कर गये। उसने उनसे कहा, यह पटेर
ब्रह्मशाप से उत्पन्न हुआ है, उसे हाथ भी मत लगाइये, युद्ध की इच्छा छोड़िये, मेरी बात मानिये। इस प्रकार धर्मनीति
सुनाकर श्रीकृष्ण उनका निवारण करने लगा लेकिन शेष बचे हुए यादव उसे मारने के लिये उसकी ओर दौड़ पड़े।
यह सब कृष्ण की माया की ही लीला थी। उन्हें अचूक मृत्यु प्राप्त हुई। किसी ने कहा, पहले इस कृष्ण की ही
पिटाई करें, यह हमें ठगने आया है, कहकर वे हाथ में पटेर लेकर दौड़े। किसी ने कहा, देखते क्या हो, उसका झोंटा
पकड़ो, उससे इतना डरते क्यों हो ? किसी ने कहा, श्रीकृष्ण को मैं एक ही झटके में गिरा दूँगा।
प्रत्यनीकं मन्यमाना बलभद्रं च मोहिताः ।
हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिनः ॥ २२ ॥
किसी ने कहा, अरे उसे देखो ! उधर बलराम खड़ा हे वही हमारा मुख्य शत्रु है। पहले इसे ही मारें और
इस प्रकार यादवों का एक झुण्ड उस पर चढ़ गया। उन दुष्टों में अत्यन्त तेज नशा चढ़ने के कारण वे वज्र सरीखा
पटेर हाथ में लेकर बलराम पर चढ़ गये। तब उसका रक्त भी उबलने लगा।
अथ तावपि संक्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन ।
एरकामुष्टिपरिधौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि ॥ २३ ॥
शुक्राचार्य परीक्षित से बोले, यादवों पर मृत्यु ने अधिकार जमाया, इसलिये वे आततायी लोग रामकृष्ण को
ही मारने के लिये उद्यत हो उठे। वे हमें ही मारने आये हैं यह देख उन्हें भी क्रोध आ गया और वे भी युद्ध करने
लगे। उन्होंने भी वह दहकता हुआ परिधि हाथ में लेकर यादवों को अपना पराक्रम दिखाया। रामकृष्ण का
विनाश करने के लिये सभी जातियों और सभी गोत्र के लोग उन दोनों पर टूट पड़े। तब कृष्ण कालशक्ति से क्षुब्ध
हो गया। अपने सारे कुल का संहार हुआ देख श्रीकृष्ण को अपने कर्तव्य पूर्ण होने का विश्वास हुआ।
ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम् ।
स्पर्धाक्रोधःक्षयं वैणवोऽग्निर्यथा वनम् ॥ २४ ॥
प्रारब्ध के अनुसार वे ब्रह्मशाप से ठगे गये। कृष्ण की माया से उनकी बुद्धि का भ्रंश हो गया। मद्यपान के
उन्माद और क्रोध से उनका क्षय हुआ। बाँस के द्वीप में बाँस ही एक-दूसरे पर रगड़ कर आग की चिनगारी
निकलती है जिससे पूरा जंगल जलकर खाक हो जाता है, उसी प्रकार यादवकुल का विनाश हो गया।
एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः ।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषितः ॥ २५ ॥
८१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार चक्रधारी श्रीकृष्ण ने जब अपने स्वकुल का विनाश किया, तो शेष बचा पृथ्वी का भार भी कम
हो गया होगा ऐसा उसे लगा और इससे उसे अत्यन्त समाधान हो गया। जिस प्रकार माली जमीन में अदरक बोता
है, पानी डालकर उसकी सेवा करता है और अन्त में उसे खन कर निकाल लेता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी
अपने यादववंश की हालत कर दी। यादवों का उसने ही अपने सामर्थ्य से संरक्षण किया था और उसी ने उन्हें मार
भी डाला। इससे मैं ममत्त्व से कितना दूर हूँ इसका उसने दिग्दर्शन कर डाला। कृष्ण समस्त यादवों का प्रतिपालक
था; उनके प्रति उसने आज तक ममत्व प्रकट किया था और अन्त में कुल का नाश कर उसने अभिमानरहित होना
भी प्रकट किया। अपने साथ-साथ स्त्री-बच्चों का और पूरे कुल नाश करने पर भी ज्ञाता को मोह नहीं उत्पन्न
होता। इस नित्यमुक्तता का श्रीकृष्ण ने आचरण कर दिखाया। ज्ञाता के मन में अहंकार तथा ममता नहीं होती, पूरे
कुल के साथ पुत्रनाश होने पर भी ज्ञाता को जरा भी दुःख नहीं होता यह श्रीकृष्ण ने दिखला दिया। ब्राह्मण के
भयंकर-शाप को उसने झूठ सिद्ध नहीं होने दिया। कुलक्षय का काम करने से श्रीकृष्ण को सुख प्राप्त हुआ। यह
देखकर बलराम ने भी अपने मन में विचार किया कि मेरा अवतार कार्य समाप्त हो गया।
रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।
तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६ ॥
फिर बलराम ने भी समुद्रतट पर अटल आसन लगाया और निर्वाण ध्यान प्रारम्भ किया। देह में प्राण को
आकृष्ट कर सारा देहाभिमान छोड़ दिया और परम पुरुष का ध्यान करते ही वह भी तद्रूप हो गया। घट का
आकाश जिस प्रकार सहज ही महदाकाश हो जाता है, उसी प्रकार देहाभिमान का त्याग करते ही बलराम
संकर्षणस्वरूप हो गया। मनुष्यधारी का जो रूप लिया था वह देह निःशेष छोड़ दिया और अपने पहले के स्वरूप
में रह लिया। समुद्र तट पर उसने अपना निर्जीव देह त्याग दिया। बलराम का यह निर्वाण देखकर श्रीकृष्ण ने भी
अपनी तैयारी प्रारम्भ की।
रामनिर्याणमालोक्य भगवान् देवकीसुतः।
निषसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥ २७॥
बलराम ने देह त्याग किया यह देखकर श्रीकृष्ण ने भी स्वयं निजधाम जाने की तैयारी की। पृथ्वीपालक,
श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण चुपचाप अश्वत्थ के नीचे वीरासन लगाकर बैठ गया। जिसके स्वरूप के माधुर्य से ब्रह्मदेव
और शंकर भी पागल हो गये, जिसके दर्शन को छोड़ दृष्टि आधे क्षण के लिये भी दूर नहीं जाती, दृष्टि से स्वाद
चखा यह देख रसना मन ही मन तड़फड़ाने लगी। वह उसके कीर्तन रस का स्वाद चटखारे लेकर लेने लगी।
बिना प्राशन किये ही अत्यन्त मधुर कृष्णरस जिह्वा चखने लगी तब विषय रस अपने आप ही फीका पड़ गया
और संसार नीरस हो गया। श्रीकृष्ण की कीर्ति जब कान में पड़ती है तब त्रिविध तापों की शान्ति होती है और
उसके गुणनाम की कीर्ति का वर्णन करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती हैं। जिसके चरण कमलों का
तुलसी से सुगन्धित हुए मकरंद को नाक से ग्रहण करने से बाकी सारे गन्ध तुच्छ लगने लगते हैं, जिसके देह का
स्पर्श होने से देहबुद्धि का नाश हो जाता है, ऐसे आनन्द की मूर्ति जो श्रीकृष्ण है वह शरीर में प्रत्येक अंग को
सुखद मालूम होता है। इच्छापूर्वक जिसके चरणों का वन्दन करने से समाधि भी लजा जाती है, वह श्रीकृष्ण
अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था। श्रीकृष्ण का वह आखिरी ध्यान शुक्राचार्य को बहुत
अच्छा लगा और वे प्रसन्नता से उसके ध्यान का वर्णन करने लगे।
तीसवाँ अध्याय ८१९
विभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः॥ २८॥
वह अन्तिम ध्यान पाँच श्लोकों में निरुपित है। ध्यान देकर सुनने वाला श्रोता था परीक्षित और वक्ता था
ज्ञानमूर्ति श्रीशुक योगीन्द्र। उस समय पीपल के वृक्ष के नीचे बैठी हुई वह मूर्ति अत्यन्त तेजःपुंज तथा देदीप्यमान
थी और उससे दसों दिशाएँ प्रकाशित थीं। न धुआँ, न कोयला और जिसका रंग भी लाल न हो, ऐसी अग्नि की
ज्वाला की तरह श्रीकृष्ण के शरीर की कांति सतेज और प्रखर दिखायी दे रही थी। कृष्णमूर्ति की प्रभा से सूर्य
और चन्द्रमा का तेज भी फीका पड़ गया। शून्य के कारण आकाश के लिये भी स्थान नहीं बचा क्योंकि
सच्चिदानंद का पूरा स्वरूप ही साकार हो गया था। वह मूर्ति चैतन्य तेज और शान्ति रस से ढली हुई थी तथा
चतुर्भुज स्वरूप में व्यक्त हुई थी। इससे सभी दिशाओं से कालिमा दूर हो गयी।
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम्।
कौशेयाम्बरयुग्मेन परवीतं सुमङ्गलम्॥ २९॥
सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम्।
पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३०॥
श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वच्छ और स्वयंभू, उसके प्रत्येक अवयव में आकाश प्रतिबिम्बित है; जिससे उसकी
नीलमेघ जैसी कांति अत्यन्त तेजःपुंज और सुन्दर दिखायी देने लगी है। श्रीकृष्ण पहले ही मनोहर हैं, तिस पर
मेघ श्याम वर्ण और भी खिल उठा है। उसके कारण उसे विशेष सौन्दर्य प्राप्त हो गया था और इसीलिये स्त्री-
पुरुषों का ध्यान उसमें लगा रहता था। बेचारे साधारण स्त्री-पुरुषों की कथा का क्या वर्णन किया जाय? परमार्थ
के मार्ग पर लगे हुए विरक्त संन्यासी भी उस पर मोहित हो उठते थे। कृष्ण की मूर्ति देखकर वे पागल हो जाते
थे। श्रीकृष्ण का दर्शन होते ही शिवा को उसका नित्य ही ध्यास लगा रहता था। पार्वती ने भी अपना मन कृष्ण
को ही अर्पण कर दिया था। इस प्रकार मूल से ही अप्रतिम सौन्दर्य, उसमें सुहास्य वदन और कमल जैसे रक्तिम
वर्ण के आकर्ण सुशोभित आँखें। मस्तक पर काले केश और उसमें सुन्दर और सुवासिक फूल गुँथे हुए; और उस
पर कृष्णरूप अर्थात् काले भ्रमर उन काले बालों में लुब्ध होकर बैठे हुए। कान में मकराकार कुण्डल थे, ऐसी
छवि का वर्णन कवि करते हैं; लेकिन वह साकार में भी निर्विकार ही थे क्योंकि उस श्रवण से विकार नष्ट होते
हैं। कृष्ण श्रवण प्राप्त होने पर आकार और विकार का विलयन ही होता है। उस कृष्ण के श्रवण में वे पूर्ण
देदीप्यमान कुंडल थे। तप्तसुवर्णकांति दो पीताम्बर शोभायमान थे; एक परिधान किया हुआ और दूसरा प्रावरण
के रूप में ओढ़ा हुआ। ब्राह्मण को ही देवता मानने वाला श्रीकृष्ण लक्ष्मी को भी एक ओर रखकर दाहिनी ओर
ब्राह्मण के चरण श्रीवत्सलांछन को सुशोभित करता था।
कटिसूत्रब्रह्मसूत्र किरीटकटकाङ्गदैः।
हरिनूपुरमुद्राभिः कौस्तुभेन विराजितम्॥ ३१॥
वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधैः।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम्॥ ३२॥
गले में चमकने वाला कौस्तुभमणि, कमरे में सुशोभित रत्नजड़ित मेखला; गले में लटकने वाला यज्ञोपवीत
८२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
और पैरों पर लटकने वाली शोभायमान वनमाला; मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट; उसमें चमकने वाले मूल्यवान रत्न
कीर्तिमुख के बाहुभूषण और अनेक रत्नों के हार, उपासक के यंत्र जैसी उँगलियों में अँगूठियाँ, उनमें त्रिकोण,
षट्कोण के आकार के हीरे जड़े हुए, गले में वैजयंती माला तथा मोतियों की एक लड़ी की माला और उसमें
पदक; नानाप्रकार के रत्नों के हार और सुगन्धयुक्त तुलसी की मालाएँ; पीताम्बर रत्नों से जड़ा हुआ जिसके दोनों
छोरों में मोतियों की जाली टंकी हुई; कमर में चित्रविचित्र नूपुर शोभायमान हो रहे थे, पैरों में नूपुर की झंकार
तथा पैंजनी आदि शोभा दे रहे थे। कमल से भी नाजुक श्रीकृष्ण के चरण थे। इस प्रकार देदीप्यमान कृष्ण
अप्रतिम रूप से शोभायमान था। शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध लेकर वह पीपल के आश्रय में वीरासन
लगाकर बैठा था। वह वीरासन इस प्रकार था कि दाहिना पैर नीचे रखकर उस जाँघ पर बायाँ आरक्त चरण रखा
हुआ था। सायंकाल के संधि प्रकाश को लज्जित करने वाली तथा बालसूर्य को न्यूनता दिखलाने वाली अत्यन्त
देदीप्यमान और कोमल आरक्त कांति श्रीकृष्ण के पैरों की थी।
मुसलावशेषायः खण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया ॥ ३३॥
अपने कुल की होली खेल सरस्वती के तट पर श्रीकृष्ण पीपल से टेक कर बैठा था, दाहिने पैर पर रखे
बायें पैर का उसका आरक्त तलुवा दिखायी दे रहा था। उसे मृग का मुख समझ कर 'जरा' नामक बहेलिये ने
उसका निशाना साधा और तीव्र गति से उसके पैर को छेद दिया। ब्राह्मण के शाप से जो लोहे का मूसल तैयार
हुआ था उसका चूर्ण करने के बाद यादवों ने लोहे का जो छोटा-सा टुकड़ा बच रहा था उसे समुद्र में फेंक दिया
था। समुद्र में एक मछली ने उसे निगल लिया था। उस मछली को 'जरा' नामक बहेलिये ने अपने जाल में फाँस
लिया। उसने उस मछली को चीरा, तो उसके पेट में से वह लोहे का टुकड़ा निकला। उस लोहे के टुकड़े का
बहेलिये ने बाण बनाया और उस बाण ने श्रीकृष्ण के चरण को भेद दिया। मछली के पेट में से निकले लोहे का
बाण तैयार करने से मनचाहा शिकार अवश्य प्राप्त होता है, इस विचार से बहेलिये ने उसका बाण तैयार किया
था। श्रीकृष्ण के पैर भेदने का प्रमुख कारण ब्राह्मण का शाप ही था। इसीलिये 'जरा' बहेलिया का वह बाण कृष्ण
के पैर में घुसा। लेकिन कृष्ण जरा भी नहीं चौंका। इसके विपरीत, बाण लगते ही उसे प्रसन्नता ही हुई।
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्विषः।
भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विषः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण के पैर में बाण पूरी तरह घुसते ही 'जरा' बहेलिया का हाथ तृप्त हो गया। उसने कहा, आज मैंने
बहुत बड़ा मृग मारा और वह मृग को पकड़ने के लिये दौड़ा। सामने चतुर्भुज पुरुष को देखकर 'जरा' बहेलिया
को अत्यन्त भय लगा। उसने मन ही मन कहा, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया, मैंने एक महान पुरुष को मार
दिया। हाय! हाय रे मेरा प्रारब्ध। तुमने मुझसे कितना दुष्ट कृत्य कराया। अब मुझ जैसे महापापी के असाध्य
दुःख का कौन निवारण करेगा? संसार का परमात्मा जो श्रीकृष्ण है उस पर मैंने प्रहार किया। मुझ जैसा पाप
किसी का नहीं होगा। भय से उसके शरीर में सिहरन होने लगी। उसने कहा, मेरे हाथ से बहुत बड़ा पाप हो
गया। संसार को जो ध्येयस्वरूप है, उसे ही मैंने ताप दिया। देवता भी जिसके चरणों का वंदन करते हैं, संत जिसे
साक्षात दण्डवत करते हैं, उस श्रीकृष्ण को ही मैंने बाणों से घायल कर दिया। इससे मुझे भयानक पातक लग
गया। कभी आत्महत्या करने पर वह पाप कभी नहीं गिरता और सारे संसार का प्रिय आत्मा जो श्रीकृष्ण है,
तीसवाँ अध्याय ८२१
उसकी हत्या याने कितनी बड़ी आत्महत्या का पाप मुझ पर लग गया ? सारे संसार की आत्महत्या करने वाला मैं
पूर्णरूप से पातकी हूँ। इस पाप से निवृत्त होने का कोई प्रायश्चित्त मुझे नहीं दिखायी देता। गलती से ब्रह्महत्या
होने पर, उस पाप में समूल डूब जाता है, और मैं मूर्ख पूर्ण ब्रह्म को ही तीव्र बाणों से घायल कर बैठा। मैं
मूलतया पापी बहेलिया हूँ; उसमें मैंने एक अपरिमित पाप जोड़ लिया। चित्स्वरूप जो कृष्ण परमात्मा है, उसे भी
मैंने दुःख दिया। इस पश्चात्ताप से वह इतना अधिक व्याकुल हो उठा कि उसने दौड़कर कृष्ण को साष्टांग
दण्डवत किया और उसके चरण मस्तक से लगा लिये। दैत्यों का अभिमान दूर करने वाले, मधु दैत्य का नाश
करने वाले मधुसूदन के पैर कस कर पकड़कर वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने उनके पैर कस कर पकड़
लिये, उसे उठाने का प्रयत्न करने पर भी वह नहीं उठा; और कृपादृष्टि से मुझे क्षमा करें, संसार में दयालु केवल
तुम हो, इस प्रकार विनती करने लगा।
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन।
क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमश्लोक मेऽघ ॥ ३५ ॥
अत्यन्त भयभीत हुआ वह जरा बहेलिया बोला, मैं अत्यन्त दुष्ट पापात्मा हूँ, यह अपराध मुझसे अनजाने में
हुआ। मेरे हाथ से ईश्वर लिंग भंग हुआ। जो ईश्वर प्रतिमा का उच्छेद करता है, वह मूर्तिभंग करने वाला
महापापी है। दुर्भाग्य से तुझ ईश्वर को मुझ दुष्ट ने बाण से मारा। ऐसा मैं पापकर्ता महापापी हूँ। मेरे पाप जैसा
अन्य कोई उदाहरण नहीं है। अतः हे पुरुषोत्तम! हे कृपालु! मेरा अपराध क्षमा करें। त्रिभुवन में तुम ही सच्चे
कृपालु हो। तुमने परीक्षित का गर्भ में संरक्षण किया और हे कृपामूर्ति! गजेन्द्र के आतंक के समय तुम ही रक्षार्थ
कूद पड़े थे। जब पाण्डव लाक्षागृह में थे, उस समय विवर के द्वार से तुमने ही उन्हें बाहर निकाला। अन्त में
अर्जुन का पक्ष लेकर तुमने ही भीष्म से युद्ध किया। द्रौपदी के असाध्य संकट में तुमने ही दौड़कर उसे तिल भर
भी नग्न नहीं दीखने दिया। उसकी पहनने वाली साड़ी तुम बने। तुम्हारी कृपालुता की कहानियाँ वेद और पुराण
भी वर्णन करते हैं। बड़े-बड़े सिद्ध महर्षि उत्तम श्लोक में तुम्हारी कीर्ति का गायन करते हैं। अनजाने में मैंने
दुष्कर्म किया, उसके लिये मुझे क्षमा करें। हे पुरुषोत्तम ! तुम परमात्मा होने के साथ ही कृपालु और क्षमाशील
हो। अजामिल दुराचारी था। उसने केवल तुम्हारे नाम का उच्चार किया, तभी उसका पाप भस्म हो गया। निष्पाप
करने के सम्बन्ध में तुम्हारे नाम का इतना अधिक महत्त्व है। दुर्बुद्धि लोग नाम से ही निष्पाप हो जाते हैं।
पितृघाती भी नाम से निष्पाप होते हैं; दुराचारी भी नाम से तर जाते हैं। तुम्हारे नाम की इतनी अधिक ख्याति है।
यस्यानुस्मरणं नृणामज्ञानध्वान्तनाशनम्।
वदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृतं प्रभो ॥ ३६ ॥
जिस विष्णु का नामस्मरण कोटि-कोटि जन्मों का अज्ञान नष्ट कर सभी प्रकार का कल्याण करता है, इतनी
जिसके नामस्मरण की योग्यता है, उसके शरीर को मैंने अपने हाथ से निर्वाण बाण से विद्ध किया। यह पूर्णरूप
से मेरा अपराध है। साधु-सज्जन जिसके महात्म्य का निरन्तर वर्णन करते हैं, जो स्वरूप से सच्चिद्धन है, ऐसा
वह श्रीकृष्ण सारे जगत का स्वामी है। श्रीकृष्ण का अर्थ है संसार का जीवन, ऐसे कृष्ण को भी मैंने निर्वाण बाण
से घायल किया। मेरा यह बहुत बड़ा अपराध है। कृष्ण तो पूरे त्रैलोक्य का समर्थ राजा है, मेरे हाथ से यह
राजघात हुआ। उसी प्रकार श्रीकृष्ण संसार का होने के कारण मैंने आत्मघात भी किया। श्रीकृष्ण संसार का पिता
है, अतः मैंने पितृघात भी किया। संसार का प्रतिपालन करने के कारण श्रीकृष्ण इस संसार की माँ है, अर्थात् मैंने
८२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मातृघात भी किया। श्रीकृष्ण ब्रह्मवेत्ता होने के कारण ब्राह्मण हैं, अतः मैंने ब्रह्मवध भी किया। इस अपराध से
बड़ा दूसरा कोई अपराध संसार में नहीं है। राजघात, आत्मघात, मातृघात, पितृघात, ब्रह्मघात ये सारे ही घात
श्रीकृष्ण को बाण से विद्ध करने के कारण मेरे हाथ से हुए।
तन्माऽऽशुजहिवैकुण्ठपाप्मानं मृगलब्धकम्।
यथा पुनरहं त्वेवं न कुर्यां सदतिक्रमम्॥३७॥
हे श्रीकृष्ण! ऐसे मुझ सरीखे पापात्मा को आप क्षमा करें। इस पाप का क्षालन हो सके ऐसा कोई उपाय
तत्काल बताइये तुम्हारे केवल कृपा करने से इस पाप का दोष दूर नहीं होगा अतः जब तुम मेरा वध करोगे तभी मैं
शुद्ध हो सकूँगा। मैं बहेलिया, मूल से ही पापबुद्धि हूँ; मृग का लोभी होने के कारण पशुओं का शिकार करता हूँ;
तुम अपने हाथ से मुझे मारो, तभी मेरा उद्धार होगा। हे पुरुषोत्तम ! जिस देह से मैंने पापकर्म किया, उस देह का ही
तुम नाश करो ताकि भविष्य में उसके हाथ से कोई ऐसा असत्कर्म या अधर्म न हो। तुम्हारे पैर में बाण मारकर,
इस देह से बहुत बड़ा पाप हुआ है। इसलिये हे श्रीकृष्ण ! इस देह का ही तुम वध कर दो, तभी उस महापाप की
निष्कृति होगी। जिस देह ने पापाचरण किया उसका सच्चा प्रायश्चित्त यही है कि तुम अपने हाथ से उसे भिक्षा दो
और यह कहकर उसने उनके पैर कसकर पकड़ लिये। देह ने यह पापाचरण किया है, और देह का लोभी पूरी
तरह पापी है। इसलिये तुम स्थूल, लिंग और कारण इन तीनों देहों का अपने तेजस्वी चक्र से छेदन करो।
यस्यानयोगाचरितं न विदुर्विरिञ्चो रुद्रादयोऽस्य तनयाः पतयो गिरां ये।
त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदञ्जः किं तस्य ते वयमसद्गतयो गृणीमः ॥ ३८ ॥
देहोत्पत्ति का मूल स्थूल, सूक्ष्म और कारण है। किन्तु हे श्रीकृष्ण! इन तीनों प्राकृत देहों को स्पर्श किये बिना
तुम अप्राकृत चतुर्भुज देह धारण करते हो। स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों देहों को तथा प्रकृति के तीनों गुणों
को स्पर्श किये बिना तुम अपनी योगमाया के सामर्थ्य से नानाप्रकार के अवतार देह धारण करते हो। तुम्हारे लीला
देह विचित्र हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह होते समय तुम्हें जरा भी संकोच नहीं होता। तुम्हें जन्मों का भय ही नहीं है।
जहाँ एक जन्म प्राप्त होने में ब्रह्मदेव आदि बिलकुल दीन हो जाते हैं वहीं तुम आत्मसामर्थ्य से अनेक अवतार
अर्थात् जन्म धारण करते हो। प्रारब्ध के अनुसार देह को नाना प्रकार के भोग भोगने पड़ते हैं, लेकिन तुम श्रीकृष्ण !
प्रारब्ध के बिना ही नाना प्रकार की भोग सम्पत्ति का उपभोग करते हो। जब तक आयु है, तब तक देहधारण है,
यह वेदों ने निश्चित कर रखा है, लेकिन तुम्हारी लीला विचित्र है। तुम आयु के बिना ही देह धारण करते हो।
काल की सत्ता परम असाध्य है। ब्रह्मदेवादि देवताओं को भी मृत्यु से छुटकारा नहीं मिलता। लेकिन तुम काल और
समय न होते हुए भी स्वेच्छा से मरण का वरण करते हो। तुम्हारा योगमाया का जो योगमार्ग है, और लीला के
कारण देह की जो स्थिति है, वह सबकी समझ के बाहर है। उसका भी कारण सुनो। ब्रह्मदेव संसार का आदिकर्ता
है, लेकिन उसे भी तुम्हारी सत्ता समझ में नहीं आती। तुम नाना अवतारों के देह धारण करते हो। उन देहों का कर्त्ता
ब्रह्मदेव नहीं है। तुम अपनी लीला से किस प्रकार देह धारण करते हो? अवतार चरित्र कैसे निभाते हो? और उस
दिव्य देह का किस तरह त्याग करते हो? यह ब्रह्मदेवादि देवताओं की भी समझ में नहीं आता। जिसे तुम अत्यन्त
पूज्य मानकर सम्मान प्रदान करते हो उस त्रिकालदर्शी सदाशिव को भी तुम्हारी करनी अतर्क्य है। सदाशिव की
विनती से तुम दूसरी बार मोहिनी बने लेकिन यह बात शिवा को नहीं मालूम हुई। वह तत्काल उस पर मोहित हो
गया। योग और ज्ञान में पारंगत ब्रह्मज्ञानी सनकादिक जो माया का परदा दूर कर आत्मस्वरूप में निश्चिंत रहते हैं,
तीसवाँ अध्याय ८२३
उन्हें भी हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी लीला का सामर्थ्य समझ में नहीं आता। उन्होंने वैकुण्ठ में क्रोध में जय-विजय को
शाप दिया था। वेदशास्त्रों में पारंगत बृहस्पति आदि जो वाणी के नियंता हैं, उन्हें भी हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी लीला का
खेल समझ में नहीं आता। जब परमार्थ के सज्ञान ज्ञाता तुम्हारी अवतार शक्ति का आकलन नहीं कर पाते, तो फिर
इन्द्रादि देवताओं को वह स्थिति कैसे मालूम हो पायेगी ? हे जगजेठी श्रीकृष्ण! इन्द्रादि देवताओं को स्वर्ग के दिव्य
भोगों की लालसा होने के कारण उनकी आँखों पर माया का आवरण रहता है, उन्हें तुम्हारी लीला की बात समझ
में नहीं आती। फिर अविद्यात्मक देह धारण करने वालों को इस बात का ज्ञान कैसे होगा ? हे श्रीकृष्ण तुम्हारी
लीला सबको सभी दृष्टियों से अतर्क्य है। ब्रह्मज्ञान भी सहज ही प्राप्त किया जा सकता है लेकिन तुम्हारी अपनी
ही लीला से देह धारण करना इसका पूर्ण आकलन बड़े-बड़े ज्ञाता भी नहीं कर पाते। तिस पर मैं तो अधम पुरुष
हूँ, अतः तुम्हारी लीला का वर्णन करना मेरे लिये असम्भव है। अब यह सब कहना व्यर्थ है। कृष्णा! मेरे देह को
दण्ड देकर मेरे पाप का निवारण करो। तुम्हारे हाथ से दण्ड पाने से मेरे सारे पापों का क्षालन होगा। इसलिये मेरा
उद्धार करने के लिये मुझ पर इतनी कृपा कीजिये। इतना कहकर उसने साष्टांग दण्डवत किया और दौड़कर उसके
दोनों पैर पकड़ लिये। यह स्तवन सुनकर श्रीकृष्ण कृपा से सन्तुष्ट हो गये।
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ ३९॥
वेदों से मंथन किया हुआ बोध; जो जगत का आनन्दकंद है, जो स्वरूप से शुद्ध आनन्द है वह श्रीकृष्ण
कृपामय होकर ब्याध से बोला, तुम जीवों का शिकार करने वाले बहेलिया हो और मुझ पर किये अपराध के
कारण भयभीत हो, किन्तु मैं तुम्हें अभय देता हूँ, क्योंकि तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न कर दिया है। लड़कों
ने सांब को स्त्रीवेश दिया था, उस कपट के कारण ब्राह्मण को कोप हुआ जिसके कारण यादव कुल को ब्राह्मण
का शाप लगा। यह त्रिविध संकल्प मेरा ही है। उस शाप में शेष बचा हुआ लोहा, उसका बाण बनाकर तुमने मृग
के शिकार के लोभ में मेरे पैर को घायल कर दिया; उसके लिये भी मेरा संकल्प ही कारण है। बुद्धि की अनादि
बुद्धि मैं हूँ, क्रिया की क्रिया भी सचमुच मैं हूँ, ऐसा होते हुए तुम व्यर्थ के अभिमान से स्वयं को अपराधी मान
रहे हो। किन्तु मेरा दर्शन ही इस पाप का प्रायश्चित्त है। मेरे एक नाम से कोटि-कोटि महापातक जलकर नष्ट हो
जाते हैं। तुमने मुझे देख लिया, मेरा दर्शन तुम्हें बड़े भाग्य से ही हुआ। क्षणार्ध की मेरी भेंट के लिये कोई
गिरिकन्दराओं में जाते हैं, कोई योग-याग का प्रयास करते हैं तो कोई हठयोग का आश्रय लेते हैं। इस प्रकार के
नाना प्रकार के प्रयासों से कोटि-कोटि कल्प तक कष्ट सहने पर भी स्वप्न में भी मेरी भेंट नहीं होती। तुमने तो
मुझे प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख लिया। मेरा दर्शन होने से समस्त पापों का नाश होता है अतः तुम पूर्ण रूप से
पुण्यात्मा ही हो। व्यर्थ में अपने मन में पाप का अभिमान मत रखो। पापाभिमान से नरक प्राप्ति, पुण्याभिमान से
स्वर्गप्राप्ति और अभिमानरहित होने पर मेरी प्राप्ति होती है, इस मेरी वचनोक्ति को सत्य समझो। तुम्हें लगता है
कि श्रीकृष्ण परब्रह्म और परमात्मा है, उसे मैंने तीक्ष्ण बाण मारा यह अत्यन्त घोर और अनिवार्य पातक है। किन्तु
लोहे का और पारस का मिलन होने पर लोहा सुवर्ण बन जाता है; लोहे का हथौड़ा यदि पारस पर मारें तो भी
उसके आघात से वह सुवर्ण ही बन जाता है; उसी प्रकार भक्ति से मेरी भेंट होने पर पातक पलक झपकते ही
नष्ट हो जाते हैं अथवा द्वेष से भी मेरी ओर देखने पर पातक नष्ट हो जाते हैं। औरों का अपराध करने पर प्राणियों
८२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
का अधःपतन होता है, लेकिन मेरा अपराध करने पर अपराधी को नित्यमुक्ति ही मिलती है। मेरा अपराध करने
से यदि नरक प्राप्ति होती है तो मेरा सारा सामर्थ्य व्यर्थ ही समझो। तो मेरे अपराध से उसे सुख ही प्राप्त होता है
और वह मुक्ति वैभव तक पहुँच कर भयमुक्त होता है। वह यदि विष भी प्राशन करे तो अमर होने से कोई नहीं
रोक सकता। उसी प्रकार द्वेष से भी वह मेरा दर्शन करे तो वह प्राणी को पावन ही करता है। जानबूझ कर घर में
आग लगाने से वह पूरे घर को भस्म कर देता है अथवा अनजाने ही छप्पर पर अग्नि रखने से भी वही बात होती
है। उसी प्रकार पूर्ण भक्ति से हो या द्वेष से हो जिसे मेरे दर्शन होता है वह अत्यन्त पावन हो जाता है। मेरा
निजधाम जाने का कार्य तुमने अनायास ही सरल कर दिया है, इसलिये मैं तुमसे अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। तुम तीनों
लोकों में परम पावन हो। जिसे तुम पूर्ण पातक समझते हो, जिस देह से तुमने मुझे बाण मारा, उसी देह से तुम
स्वर्ग के भूषण बनकर देवताओं में भी वन्दनीय होगे। यज्ञ करके याज्ञिक लोग पतनात्मक सुख प्राप्त करते हैं
लेकिन तुम्हारे साथ वैसा नहीं घटेगा। तुम अक्षय सुख ही प्राप्त करोगे। हे बहेलिये! मन के सारे संशय मिटा कर
तुम शीघ्र उठो मेरी बातें मिथ्या नहीं हैं, तुम अक्षय सुख प्राप्त करोगे। अब तुम शायद मन में यह कहोगे कि आप
तो निजधाम जा रहे हैं, फिर मैं आपके बाद अक्षय सुख किससे माँगूँगा? लेकिन मेरी आज्ञा औरों की तरह नहीं
है। तुम निश्चित रूप से अक्षय सुख प्राप्त करोगे। मेरी आज्ञा के कारण ही आज ध्रुव अपने पद पर स्थिर है।
कलिकाल भी मेरी आज्ञा का वन्दन करता है। उसे कोई भी विकल नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण के मुख से ये शब्द
निकलने की ही देर थी कि तब तक बहेलिये के लिये एक बड़ा-सा विमान नीचे उतरा।
इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा।
त्रिः परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवं ययौ॥ ४०॥
देवता और दावन जिसकी निरन्तर पूजा करते हैं, जो चराचर व्यापक परमात्मा है; जो लीला से देह धारण
करता है, बड़े-बड़े योगी जिसे वंदन करते हैं; ऐसे अत्यन्त श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने जरा बहेलिये को आज्ञा की; तभी
कृष्ण की आज्ञा से जो देदीप्यमान विमान आया था उसे देखकर जरा के मन में अत्यन्त आनन्द हुआ और वह
श्रीकृष्ण को तीन प्रदक्षिणा कर तथा उसे नमस्कार कर विमान में चढ़ गया। इस प्रकार बहेलिया विमान में
बैठकर इन्द्र, चन्द्र आदि ग्रहों को पीछे छोड़ कृष्ण की कृपा से उससे भी ऊपर के स्वर्ग में, वहाँ अक्षय सुख में
पहुँचा। जिसने पूर्ण उपकार किया, उस पर उपकार ही करना चाहिये, यह सच्चे शान्ति ज्ञान का लक्षण श्रीकृष्ण ने
स्वयं आचरण करके दिखलाया। ब्रह्मज्ञान की बकवास करने वाले अनेक होते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण वैसे नहीं थे।
उन्होंने स्वयं वैसा आचरण कर बहेलिया का उद्धार किया। सारे कुल का संहार हो गया किन्तु श्रीकृष्ण ने मोह
नहीं किया और जिसने स्वयं बाण मारकर घायल किया था, उस बहेलिया को भी सुखी कर दिया। उधर
समुद्र के तट पर दारूक रथ आकर खड़ा था। उसे श्रीकृष्ण नहीं दिखायी दिया, इसलिये वह उसकी खोज में
निकल पड़ा।
दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्य ताम्।
वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ॥४१॥
कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिये दारुक का मन छटपटा रहा था। वह कृष्ण के पगचिह्नों को
देखते हुए आगे चलने लगा। तभी कृष्ण के गले की तुलसी माला की गन्ध उसे अपनी ओर आकर्षित करने
लगी। सुवास के ही आधार पर वह आगे बढ़ा, तभी उसे दिव्यप्रकाश दिखायी पड़ा।
तीसवाँ अध्याय ८२५
तं तत्र तिग्मद्युभिरायुधैर्वृतं ह्यश्वत्थमूले कृतकेतनं पतिम्।
स्नेहप्लुतात्मा निपपात पादयो रथादवप्लुत्य सबाष्पलोचनः ॥ ४२ ॥
इतने में तेजस्वी प्रकाश से युक्त दिव्य आयुधों के साथ मेघश्याम श्रीकृष्ण उसे दिखाई पड़ा। अश्वत्थ के
नीचे वीरासन लगाकर बैठा हुआ तथा अपनी प्रभा से सतेज दिखाई देने वाला श्रीकृष्ण दारुक को दिखाई दिया।
कृष्ण को देखते ही वह तत्काल रथ से कूद पड़ा और अंतःकरण के अत्यन्त प्रेम से उद्वेलित होकर उसने श्रीहरि
के चरण पकड़ लिये। उसकी आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी और उसका शरीर थर-थर काँपने लगा। वह
बोला, हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे बिना आँखों के आगे अन्धकार छा रहा है।
आपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो दृष्टिः प्रणष्टा तमसि प्रविष्टा।
दिशो न जाने न लभे च शान्तिं यथा निशायामुडुपे प्रणष्टे ॥ ४३ ॥
हे प्रभो, श्रीकृष्ण! सुनो। तुम्हारे चरण नहीं दिखाई देते तो आँखों को पूरा संसार ही नहीं दिखाई देता। फिर
दिशाओं की गणना कौन करे? ज्ञान के साथ विवेक भी नष्ट होता है। जरा भी सुख नहीं मालूम होता। तुम्हारे न
दिखायी देने से मैं जड़, मूढ़ और मूर्ख होकर रह गया हूँ। जिस रात्रि में चन्द्रमा का उदय नहीं होता ऐसी
अमावस्या के बीहड़ अँधेरे में जैसी अवस्था होती है, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे बिना संसार में सर्वत्र अँधेरा
ही छा जाता है। किन्तु तुम्हारे चरण दिखाई देते ही, जिस प्रकार सूर्य के किरण फैलते ही अँधेरे के साथ रात्रि
समाप्त होती है, उसी प्रकार सारा अज्ञान नष्ट हो जाता है।
इति ब्रुवति सूते वै रथो गरुडलाञ्छनः।
खमुत्पपात राजेन्द्र साश्वध्वज उदीक्षतः ॥ ४४ ॥
दारुक इस प्रकार विनती कर रहा था, तभी उसे एक अत्यन्त अद्भुत और अलौकिक आश्चर्य दिखाई पड़ा।
वह यह कि पास में खड़ा रथ बिना पंख के ही आकाश में उड़ गया। चारों घोड़ों के साथ, गरुड़ध्वज के साथ वह
श्रीकृष्ण का रथ दारुक के देखते-देखते ऊर्ध्व गति से आकाश में उड़ गया। शुक कहते हैं, हे परीक्षित! श्रीकृष्ण
निजधाम जाते समय अपना ऐश्वर्य और सम्पत्ति स्वेच्छा से ऊर्ध्व गति से ले गये। इस लोक में अपनी कीर्ति कायम
रख वे अपना वैभव और विलास सम्पत्ति तथा अपनी शक्ति सँभालकर अपनी सत्ता से ऊर्ध्वगति से ले गये।
तमन्वगच्छन् दिव्यानि विष्णुप्रहरणानि च।
तेनातिविस्मितात्मानं सूतमाह जनार्दनः ॥ ४५ ॥
वह रथ ऊर्ध्व मण्डल में जाते ही शंख, चक्र, गदा, पद्म, ये आयुध भी तत्काल उनके पीछे-पीछे चल पड़े।
यह देखकर दारुक आश्चर्यचकित रह गया। उसने मन ही मन कहा, मैं नित्य जिसकी धुरा पर बैठकर श्रीकृष्ण
का रथ हाँकता था, वह रथ कृष्ण आकाश मार्ग से ले जाकर मुझे यहाँ क्यों छोड़ गये? मुझे यहाँ छोड़कर
श्रीकृष्ण अपने दिव्य अस्त्र भी ले गये। मैं अभागा था, इसीलिये श्रीकृष्ण ने मेरी उपेक्षा की। मैं रथ से कूद पड़ा
यही मैंने गलती की। अन्यथा मैं भी रथ के साथ ही आकाश में गया होता। श्रीकृष्ण मुझ पर क्यों नाराज हो उठे?
जिसने पैर पर बाण मारा उस बहेलिया का भी उद्धार किया और मैं भाग्यहीन, अभागा, इसीलिये श्रीकृष्ण ने मेरा
त्याग किया। श्रीकृष्ण नित्य मुझे दिखायी देता था, धुरा पर बैठकर मैं उसके अश्व हाँकता था। वह मैं अब कृष्ण
के बिना रह गया। सारांश, मेरा ही भाग्य खोटा था। मैं श्रीकृष्ण का सारथी, सारे त्रिभुवन में लोग मुझे जानते थे,
८२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही मैं अब अलग-थलग पड़ गया। श्रीकृष्ण मुझसे क्यों रुष्ट हो गये? जीवनपर्यंत कृष्ण का सुख भोगा अब
वियोग का दुःख भोगना पड़ा। कृष्ण ! तुमने मुझे क्यों वंचित किया? मैं तुम्हारा दीनदास हूँ। मेरे शब्द की तुमने
आज तक कभी भी उपेक्षा नहीं की। उसे ही श्रीहरि ! तुमने अब दूर ढकेल दिया? अपराधी बहेलिये को भी तारा;
अश्वध्वज के साथ रथ को भी आकाश में ले गये और मेरा उद्धार करने में क्यों हिचकिचा रहे हो? इस प्रकार
वह अत्यन्त व्याकुल हो गया। श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखकर उसे रुलाई आ गयी। आँखें आँसुओं से भर
आयीं। दारुक फुक्का फाड़कर सर नीचा करके रोने लगा। फिर बोला, अन्त में श्रीकृष्ण मुझसे विन्मुख हो गये,
इसका मुझे अत्यन्त दुःख है। वह दुःख से छटपटाने लगा। हाथ से सिर पीटने लगा। हे विधाता! मर जाओ। मेरे
ललाट पर तुमने यह क्या लिख दिया? फिर वह श्रीकृष्ण नाथ से बोला, तुम्हारे आगे विधाता की क्या बिसात
है? मैं यदि तुम्हें छोड़कर रहा, तो अत्यन्त दीन-हीन हो जाऊँगा। श्रीकृष्ण ! तुम्हारे सामर्थ्य पर मैं कलिकाल को
भी डाँट-फटकार देता था; उसे ही तुमने काल का दास और संसार पर पोषित बना दिया। उसका यह भाषण
सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम डरो मत।" और उसे गुप्त सलाह देकर वहाँ से चला गया। देखो! काल की गति
के अनुसार आज तुम ही मेरे निकट के रह गये हो। तुम्हें मैंने अपने काम के ही लिये रख लिया। तुम अब शीघ्र
द्वारका जाओ।
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।
संकर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मदशाम् ॥ ४६ ॥
द्वारकायां च न स्थेयं भवद्भिश्च स्वबन्धुभिः।
मया त्यक्तां यदुपरीं समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ ४७ ॥
स्वं स्वयं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः।
अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ ॥ ४८ ॥
द्वारका जाकर यादव आपस में कलह करके मर गये, यह पूरा वृत्तांत लोगों को दे दो। उसी प्रकार बलराम
द्वारा योगगति से देह विसर्जन करने की बात, तथा मेरी अवस्था के बारे में भी बताना। तुम वहाँ जाकर सबसे
कह दो कि वे द्वारका में न रहें, शीघ्र बाहर निकलें, यह मेरी आज्ञा उनसे कह दो। द्वारका छोड़कर जाने का
कारण तुम्हें बताता हूँ। दारुक ! तुम उत्तमज्ञानी हो, तुम्हारे ऊपर मेरा पूर्ण विश्वास है। इसीलिये तुम्हें यहाँ रोककर
अन्त समय का गुप्त रहस्य बताता हूँ। वह रहस्य यही है कि द्वारका जाकर वहाँ से सबको बाहर निकालो।
इसका कारण यह है कि मेरे द्वारका छोड़ते ही समुद्र चारों ओर से आकर इस नगर को डुबो देगा। मैंने समुद्र से
जमीन माँग कर ही वहाँ द्वारका बसायी थी, इसलिये मेरे निजधाम जाते ही वह आकर इसे डुबा देगा। इसलिये
तुम अतिशीघ्र जाओ और मेरे माता-पिता तथा अन्य सारे लोगों को द्वारका से बाहर निकालो। समुद्र वह स्थान
डुबा दे इससे पहले स्त्री-बच्चों आदि सबको बाहर निकालो। शासन समाप्त हो जाने से रास्ते चारों से भर जायेंगे
इसलिये कोई इक्का-दुक्का बाहर न निकले। अर्जुन को साथ में ले कर सब लोग इन्द्रप्रस्थ जायें, ताकि वह मार्ग
में आपकी सुरक्षा करेगा। कृष्ण का यह भाषण सुनकर दारुक को पुनः रुलाई आ गयी। उसकी जाने की इच्छा
नहीं थी और मछली जिस प्रकार पानी के बिना तड़पती है, उसी प्रकार उसके प्राण व्याकुल हो उठे। वह बोला,
अपने सारे कुल का विनाश कर श्रीकृष्ण आखिर चला ही गया। और मैं यह अपना काला मुँह लेकर यह वृत्तांत
बताने जाऊँगा। लोग कहेंगे कि श्रीकृष्णरूपी निजसुख खोकर यह अपना काला मुँह दिखाने यहाँ आया है। इस
प्रकार सबके दुःख का कारण मैं बनूँगा। मेरा भाषण सुनकर सबका प्राणांत हो जाएगा इसलिये इतना भयंकर
दुःख देने के लिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगा क्योंकि जिन्हें यह बात बताऊँगा वह उनके लिये जानलेवा ही सिद्ध हो
सकती है। कृष्ण! इतना घोर निष्ठुर मैं नहीं हो सकता। हे श्रीकृष्ण! चींटियों के बिल को आग लगाने की तरह
मुझे यह वार्ता द्वारका में मेरे इष्टमित्रों को बतानी होगी। फले-फूले वन में जैसे कोई आग लगा दे, उस प्रकार
कृष्ण निधन का दहकता समाचार सुहृदों के कानों तक कौन ले जायेगा? डूबने वाले के मस्तक पर जिस प्रकार
शिला नहीं रखी जाती उसी प्रकार कृष्ण के साथ पूरे कुल का विनाश हो गया यह समाचार मैं इष्ट मित्रों को नहीं
बताऊँगा। कृष्ण! आप्त इष्टों को सुख देने के बजाय महद्दुःखों की राशि लेकर मैं इष्ट मित्रों के पास नहीं
जाऊँगा। अब आप कहेंगे कि तुम बुद्धिमान हो, सारे जनम में तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, ऐसा
होते हुए अब अन्त समय में तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों कर रहे हो? तो हे कृष्ण! अंतकाल का आपका
सुख देखने में मुझे प्रसन्नता हो रही है। उसे छोड़ लोगों को दुःख देने के लिये मैं नहीं जाऊँगा। कुलनाश का
दुःख अत्यन्त भयंकर है। कृष्ण का निधन तो और भी अधिक तापदायक है। अतः ऐसा भाषणरूपी विष मैं
संसार को नहीं दे सकता। तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँ तो संसार को महद्दुःख देना होगा और यदि तुम्हारी
अवज्ञा करूँ तो मुझे नरक भोगना होगा। इसलिये अब स्वयं ही विष खाकर तुम्हारे सामने मरूँ यही अच्छा होगा।
इससे मुझे निश्चित रूप से अलौकिक उत्तम गति प्राप्त होगी। इतना कहकर दारुक ने साष्टांग दण्डवत किया
और मस्तक पर श्रीकृष्ण ने दोनों पैर रख लिये। दारुक की वह भक्ति देखकर श्रीकृष्ण का हृदय पसीज उठा और
जिससे उसका शोक और मोह नष्ट होगा ऐसा मर्म वह उसे बताने लगा।
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचनामेतां विज्ञायोपशमं व्रज ॥ ४९ ॥
मेरे धर्म का जो लक्षण है उस पर यदि तुम दृढ़ होकर रहो तो मेरा ज्ञान विज्ञान तुम्हें प्राप्त होकर तुम स्वयं
ब्रह्मस्वरूप होकर रहोगे। अब तुम पूछोगे कि धर्म का लक्षण क्या है? तो हे दारुक! ध्यान देकर सुनो। मेरे सारे
सद्धर्म ऐसे हैं। हृदय में नित्य मेरा ध्यान रखो, मुख में मेरा नामकीर्तन रहने दो। कानों से मेरी कथा श्रवण करो
और हाथों से नित्य मेरी पूजा करो। आँखों से मेरी मूर्ति का दर्शन करो, पैरों से मेरे मन्दिर में जाओ और रसना से
मेरे तीर्थ का प्राशन करो और मेरे प्रसाद का आदर के साथ भक्षण करो। मुझे साष्टांग नमस्कार करो। मेरे भक्तों
का आनन्दपूर्वक आलिंगन करो। प्रेमपूर्वक मेरी सेवा किये बिना एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दो। देखो, इस प्रकार
मेरी सेवा करते हुए सभी प्राणियों में मेरा ही भाव रखना, यह सभी धर्मों का राजा है। इसमें विघ्न प्रवेश कर ही
नहीं सकता। समस्त प्राणियों में जब मैं ही दिखायी देने लगता हूँ तो वैराग्य पूर्णरूप से भर जाता है। तब
देहाभिमान को नष्ट करने वाला शुद्ध ज्ञान सहज उत्पन्न हो जाता है। देहाभिमान नष्ट होने पर आशा भी शून्य रह
जाती है, तभी निरपेक्षता पूर्णरूप से, अपने आप प्राप्त होती है। यह निरपेक्षता ऐसी ही है कि जिस प्रकार ज्ञाता
लोग मृगजल की उपेक्षा करते हैं, उसी प्रकार विषय मिलने पर इन्द्रिय उनकी उपेक्षा करते हैं। इस दृष्टि से
चराचर की ओर देखने पर सारा व्यवहार ही मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार डोर का आकार सर्प की तरह
लगता है, उसी प्रकार संसार का भास भी भ्रम के ही कारण होता है। उसी प्रकार विषय में व्यवहार और संसार
यह भी मिथ्या और मायिक ही है। जिस प्रकार सीप का रंग चाँदी की तरह दिखायी देता है लेकिन उसका कोई
अलंकार नहीं बनता उसी प्रकार यह संसार भी मिथ्या अर्थात् भासमान मायिक व्यवहार है। संसार का भान ही
मूलतयः मिथ्या है, उसका बन्धन भ्रांत व्यक्ति को ही होता है। अतः उसमें भुक्ति भी शुद्ध भ्रम ही है। हम पूर्ण
८२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ज्ञानी हैं; हमने संसार बन्धन तोड़ कर नित्यमुक्ति प्राप्त की; यह बकवास भी मायिक ही है। जो जानता है कि
संसार मायिक सृष्टि है, उसका मन मन से लजाता है। इसी का नाम 'विज्ञान' है। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति
और संसार का भान ये सब मिथ्या बातें हैं यह बात पूरी तरह मन में अंकित होना इसी का नाम 'विज्ञान' है, यह
ध्यान में रखो। साधक का पूर्णतयः ब्रह्मस्वरूप होना यही विज्ञान का प्रमुख लक्षण है और संसार में 'मैं' या 'तू'
जैसी बात का न दिखायी देना, इसी का नाम 'उपराम' है। ऐसा उपशम जिसे प्राप्त होता है, उसमें और मुझमें
कोई भेद नहीं है। यह निरूपण सुनते ही दारुक के हृदय में वह संकेत चमत्कारपूर्ण ढंग से अंकित हो गया। कोई
सुवर्ण का अलंकार देखने जाय और स्वयं ही सुवर्ण बन जाय, उसी प्रकार मैं भी कृष्णरस से ही ओतप्रोत हूँ। इस
देहलोभ का यह वियोग व्यर्थ का है। मैं स्वयं ही कृष्णरूप हूँ। मुझमें और कृष्ण में भिन्नता जरा भी नहीं है।
पूर्णत्त्व से परिपूर्ण ब्रह्म हूँ, यह पहचान उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गयी।
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य पुनः पुनः।
तत्पादौशीर्ष्यू पाधाय दुर्मनाः प्रययौ पुरीम्॥५०॥
कृष्ण का यह भाषण सुनकर उन्होंने श्रीकृष्ण की आज्ञा शिरसावंद्य की और मन का खेद भुलाकर वह
श्रीकृष्ण के चरणों में लग गया। त्रिवार प्रदक्षिणा कर तथा पुनः-पुनः श्रीकृष्ण चरणों का नमन कर अन्त में उनके
चरणों पर मस्तक रख दिया और उनकी आज्ञा लेकर निकल पड़ा। ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण है इसका ज्ञान कराने वाला
श्रीकृष्ण निजधाम की ओर चल पड़ा। इससे दारुक को अत्यन्त दुःख हुआ। कृष्ण का पुनः दर्शन नहीं होगा इससे
अत्यन्त खिन्न होकर वह द्वारका चला गया। दारुक को द्वारका भेजा, इतने में मैत्रेय कृष्ण के पास आया। उस समय
उसे भी श्रीकृष्ण ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया। ब्रह्मज्ञान का वह उपदेश विधि शुक ने तृतीय स्कंध में बताया है।
कृष्ण का निर्वाण देखने के लिये उद्धव छिप कर बैठा था। उसने ज्ञान का वह निरूपण सुनकर संतोष से श्रीकृष्ण को
नमस्कार किया। उसी समय श्रीकृष्ण ने स्वमुख से मैत्रेय को बताया कि तुम्हारे पास विदुर आयेगा, उसे भी तुम
गुह्यज्ञान का उपदेश करो। मैत्रेय को उपदेश कर भगवान ने उसे अपने आश्रम में भेजा। तब उद्धव भी श्रीकृष्ण को
नमस्कार कर बदरिकाश्रम चला गया। दारुक को द्वारका भेजा, मैत्रेय को अपने आश्रम में भेजा, उद्धव को
बदरिकाश्रम भेजा और जरा व्याध को स्वर्ग भेजा। घोड़ों सहित अपने रथ और अस्त्रों को पहले भेज दिया, अब
स्वयं भी आनन्दपूर्वक निजधाम की ओर प्रस्थान करेगा। उसे निजधाम जाते देखने देवतागण आयेंगे। वह रसपूर्ण
और सुमधुर प्रसंग अगले अध्याय में आयेगा। जो अजन्मा होते हुए जन्म लेता है, विदेही होते हुए देह धारण करता
है; स्वयं अक्षयी होते हुए मृत्यु दिखलाता है वह श्रीकृष्ण अत्यन्त मोहक है। जिसका निजधाम प्रयाण शिवब्रह्मादि
देवताओं के लिये भी अतर्क्य है उसका उपलक्षण मैं बताऊँगा। श्रोतागण मुझे अवधान दें। श्रीकृष्ण का निजनिर्वाण
एकादश स्कंध का शिखर है जिसे देहाभिमान नहीं होता वह पूर्ण परिपक्व ब्रह्म है। जन्म लेने पर भी भय नहीं है;
देह में विचरण करने पर भी भय नहीं है और देह का त्याग करने पर भी भय नहीं है; यह ब्रह्मस्वरूप की परिपूर्णता
श्रीहरि ने दिखा दी है। एकनाथ जनार्दन की शरण में है। आगे अत्यन्त रसपूर्ण और सुमधुर निरूपण है। उसका
सद्गुरू कृपा से आख्यान सुनाऊँगा। संतजन कृपया ध्यानपूर्वक श्रवण करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे पारमहंससंहितायां
एकाकार टीकायां परमार्थ स्वकुलनिर्दलनम् नाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥ ३०॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥
इकतीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु अच्युत ! तुम्हें नमस्कार है। तुम देहधारी होते हुए भी देहातीत हो। गुणों में रहते
हुए भी निर्गुणत्व से विचरण करते हो। तुम्हें देह के प्रति ममता नहीं है। बचपन में तुमने विष प्राशन किया था;
पूतना का प्रत्यक्ष शोषण किया था और दावाग्नि का प्राशन किया था। तुम वैकुण्ठ के सिंहासन को सुशोभित
करते हो, तुम्हें देहाभिमान नहीं है। स्वयं गोपालकों के साथ रहकर उनके साथ कबड्डी खेलते हो। कर्मशील
ब्राह्मण कर्म के बल पर तुम तक पहुँचने के लिये सदा छुआछूत का आश्रय लेते हैं और तुम ग्वालों के बेटों के
साथ मिल-जुल कर खाना खाते थे। जिसे दुराचार कहते हैं, वह व्यभिचार कर गोपियों का उद्धार किया। तुम्हारा
यह चरित्र वेदशास्त्रों को भी अगम्य है। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और एक लाख साठ हजार बच्चे खेलते हुए
भी, तुम्हें बाल ब्रह्मचारी के रूप में सनत्कुमार वंदन करते हैं। तुम्हारे ब्रह्मचर्य की महत्ता को शुक नारद भी मान्य
करते हैं और मारुति भी चरणों पर लोटते हैं। तुम ऐसे निष्ठावान ब्रह्मचारी हो। व्रतबंध होने के पूर्व ही तुमने
ग्वालों की लड़कियों का भोग किया, तुम निश्चय ही ऊर्ध्वरेता हो, तुम्हें भीष्म भी वन्दन करते हैं। नौ लाख गौवों
की रस्सी से भी तुम नहीं बँध सके लेकिन श्रद्धा के बल पर रासक्रीड़ा में तुम्हें गोपियों ने बाँध लिया। तुम उनकी
इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे थे। छह महीने तक तुमने उनके साथ क्रीड़ा की। इस प्रकार काम को स्पर्श किये बिना
तुम स्त्रियों का काम पूरा कर रहे थे। विधि वेदार्थ को लज्जित कर तुमने सारी गोपियों को तारा। गोपियों को
अद्भुत प्रेम से तारा; वेणुगीत से गौओं का उद्धार किया और श्रीकृष्ण ! निजयोग सामर्थ्य से समस्त ग्वालों का
तारा। दुष्ट बुद्धि कंस और अपराधी व्याध को भी तारा। श्रीकृष्ण ! तुम संसार की सीमा होते हुए भी कृपालु हो।
कृष्ण की बात नहीं काट सकता था इसलिये यम भी गुरु के पुत्र को वापस ले आया। जो कलिकाल से भी कभी
हार नहीं मानता, उस श्रीकृष्ण ने क्या देह त्याग कर दिया ? देव निजधाम जाते हैं यह अध्याय भागवत का कलश
है। इसका गहन अभिप्राय शुकदेव परीक्षित को बताते हैं। कलश के ऊपर कोई चीज नहीं चढ़ायी जाती। उसी
प्रकार भगवान निजधाम जाने के बाद निरूपण कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसीलिये उसे कलश कहते हैं।
वेदशास्त्रों का रहस्य यही है कि अहँभाव नहीं होना चाहिये। श्रीकृष्ण का निजधामगमन ब्रह्मादि देवताओं के
लिये भी अतर्क्य है। फिर भी जनार्दन की कृपा होने के कारण एकनाथ उसका विशद वर्णन करके बताएगा।
दारुक द्वारका जाने के बाद श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल पड़े। उस समय उनका निर्वाणकाल का दर्शन लेने
के लिये समस्त देवतागण वहाँ आये। उसी अर्थ का निरूपण श्रीशुक्राचार्य बता रहे हैं और श्रोता परीक्षित भी
कृष्ण का निर्वाण सुनने के लिये सावधान होकर बैठा है।
श्रीशुक उवाच
अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः ।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्वराः ॥ १ ॥
पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः ।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजाः ॥ २ ॥
८३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो व्यास का प्राण है, योगियों का मुकुटमणि है, वह श्रीशुक स्वयं श्रीकृष्ण के निर्वाण का निरूपण कर रहे
हैं। शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने निजधाम के लिये प्रस्थान किया उस समय सारे देवतागण
विमानों में बैठकर अत्यन्त तीव्रता से वहाँ आये। ब्रह्मदेव द्रुत गति से आये। शंकर भी पार्वती को लेकर आये।
इन्द्रप्रमुख सारे देवतागण अपने गणों के साथ वहाँ आये। सनकादिक मुनियों की पंक्तियाँ तथा दक्ष आदि प्रजापति
भी वहाँ आये। अर्यमादि आदि पितर आये और कपिलादि महासिद्ध भी दौड़ते हुए आये। गन्धर्व और विद्याधर
आये। यक्ष, चारण, किन्नर तथा विभीषणादि बड़े-बड़े राक्षस भी श्रीकृष्ण को देखने के लिये दौड़ते हुए आये।
श्रीकृष्ण को देखने के लिये पाताल से नाग भी आये; जिन्हें 'महोरग' अर्थात् प्रचण्ड सर्प कहते हैं, वे भी शीघ्रता
से आये। दत्तात्रेय आदि द्विज आये। नारद भी कौतुक देखने आये। उसी प्रकार गरुड़ आदि पक्षी भी तत्परता से
एकत्र हो गये। रंभा, उर्वशी, मेनका आदि अष्टनायिका अप्सरा भी कृष्णदर्शन के हेतु वहाँ एकत्र हो गयीं।
कृष्णस्वरूप देखने की लालसा से देवताओं का समूचा समुदाय वहाँ एकत्र हो गया।
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः ।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरेः कर्माणि जन्म च ॥ ३ ॥
कृष्ण को देखने के लिये दृष्टि आतुरता से दौड़ रही थी। सर्वत्र गड़बड़ी मच गयी। कृष्णरूप की माधुरी
इतनी विलक्षण थी। अब पुनः कृष्ण का दर्शन कैसे होगा ? इसलिये कृष्ण का निर्वाण काल का दर्शन लेने के लिये
सारे देवतागण अत्यन्त आतुरता से वहाँ आये हुए थे। घनश्याम जैसी सुन्दर मूर्ति तो सौन्दर्य की पराकाष्ठा थी। उस
कृष्ण के निजधाम जाने पर फिर हमें दर्शन कब मिलेगा ? देवताओं को श्रीकृष्ण दर्शन की लालसा लगी हुई थी।
इसीलिए वे अत्यन्त शीघ्रता से दर्शन के लिये आये थे। कोई श्रीकृष्ण के कार्यों का वर्णन कर रहा था, तो कोई
उसके चरित्र के गीत गा रहा था, इस प्रकार सभी उनके दर्शन के लिये अत्यन्त आतुरता से आये थे।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः ।
कुर्वन्तः संकुलं राजन् भक्त्या परमया युताः ॥ ४ ॥
आकाश में चारों ओर विमानों की भीड़ लगी हुई थी। उनमें बैठे देवताओं ने श्रीकृष्ण को देखते ही उनकी
जय-जयकार की। श्रीकृष्ण को देखकर उनका अन्तःकरण भक्ति से आर्द्र हो उठा और उन सबने मिलकर
अनवरत पुष्पवृष्टि की। कृष्ण के चारों ओर फूलों का ढेर लग गया। उस समय साँवले सलोने श्रीकृष्ण की शोभा
अत्यन्त न्यारी लग रही थी।
भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनोविभुः ।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत् ॥ ५ ॥
समस्त देवतागण तीव्र गति से वहाँ एकत्र हो गये। तब सामने ही खड़ा ब्रह्मदेव श्रीकृष्ण को दिखायी पड़ा
और अपनी ही जैसी विभूति शंकर को भी श्रीकृष्ण ने देखा। उसी प्रकार इन्द्रादि देवतागण, जो उनकी अपनी ही
विभूतियाँ थीं उन्हें देखकर श्रीकृष्ण ने अपनी पद्मपत्र जैसी पलकें सहज ही बन्द कर लीं। आँखें खोलीं, बन्द
कीं, लेकिन उसमें कोई परिवर्तन नहीं दिखायी दिया। वह आत्मस्वरूप से परिपूर्ण आत्मा ही था; फिर कृष्ण ने
आँखें क्यों बन्द कर ली थीं ? देवताओं का समुदाय देखकर कृष्ण ने कुछ बोले बिना आँखें बन्द कर लीं, उसका
कारण सुनिये। श्रीकृष्ण जब द्वारका में थे, उस समय बड़े-बड़े देवतागण प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने देवकी
इकतीसवाँ अध्याय ८३१
पुत्र श्रीकृष्ण से आदरपूर्वक बिनती की थी कि हम दासों की ओर कृपा की दृष्टि से देखें (अर्थात् हमारा रक्षण
करें) समस्त देवताओं का समुदाय, स्वर्लोकादि लोकपाल ये सब तुम्हारे दास हैं इसलिये निजधाम जाते समय
एक बार हमारे यहाँ आकर हमारे आश्रम को पवित्र करें। उन सब देवताओं को श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
था कि यादवकुल का क्षय होने के बाद, अन्त में मैं इस मार्ग से अवश्य आऊँगा। श्रीकृष्ण का भाषण सुनकर सारे
देवताओं को अत्यन्त आनन्द हुआ था; वे समझ गये कि श्रीकृष्ण हमारे वश में हैं, इसीलिये उन्होंने हमारा वचन
अस्वीकार नहीं किया। उस दिन का स्मरण कर इस मौके का लाभ उठाने के लिये देवताओं का समुदाय यहाँ
आया था। उनका वह अभिमान उतर जाने के लिये ही श्रीकृष्ण ने आँखें बन्द कर ली थीं। देवताओं का समुदाय
बहुत बड़ा है, मैं किसके-किसके यहाँ जाऊँ? उनको छकाने के लिये ही भगवान ने आँखें बन्द कर समाधि
लगाने का अभिनय किया। कृष्ण परिपूर्ण परब्रह्म ही था। उसके लिये न समाधि है, न व्युत्थान है। उसने समाधि
लगाने का केवल अभिनय किया। योगियों को स्वच्छंद मृत्यु रहती है लेकिन श्रीकृष्ण की स्थिति वैसी भी नहीं
थी। शंकरादि देवताओं को भी उसकी गति अतर्क्य थी। वही स्थिति शुक्राचार्य परीक्षित को बताते हैं।
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६॥
जो योगी लोग कलिकाल को भी जीत कर इच्छा मृत्यु प्राप्त करते हैं, वे पूर्णरूप से अग्निधारणा कर,
अपना देह जलाकर स्वरूप में मिल जाते हैं। जैसे घृत पिघलता है, उसी प्रकार जो सगुण है वह निर्गुणत्व प्राप्त
करता है। इसी को 'योगाग्निधारण' कहते हैं। कृष्ण देह दहन कदापि नहीं होगा। श्रीकृष्ण का स्वरूप परिपूर्ण
था। वह योगधारणा क्यों करेगा? उसका देह लीलाविग्रही था। तो फिर दहन किसका किया जाय? उसे आँखों से
देखना ही पर्याप्त है, ध्यान वहीं लग जाता है। मन उसी में लगा रहता है। कृष्ण का सौन्दर्य परिपूर्ण तथा संसार
को मोहित करने वाला है। जिसके सौन्दर्य का दर्शन कर मदन स्वयं गर्भ में आ गये थे, चैतन्यघन श्रीकृष्ण के
चरणों को देखकर लक्ष्मी भी मोहित हो गयी थीं। योगी सदा जिसका ध्यान करते रहते हैं, शंकर आदि भी
जिसका नित्य चिंतन करते हैं; ऐसे सर्व-मंगल का जो अधिष्ठान है, वही चैतन्यघन श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण स्वयं
आत्माराम होने के कारण वह संसार को भी आराम ही दिलाने वाला है। वह लीलाविग्रही घनश्याम ध्यानगम्य
और चिद्रूप है। जमे हुए घृत की जैसे मूर्ति बनायी जाय, उसी प्रकार चैतन्य में ढली हुई कृष्णमूर्ति स्वलीला से
बनी हुई थी। इसीलिये जब उस देह ने दावाग्नि प्राशन किया, तो उस पर कालिया सर्प के विष का असर नहीं
हुआ क्योंकि वह देह था ही नहीं। फिर उसे मृत्यु कैसे आयेगा? कृष्ण जिसके हृदय में प्रकट होता है, वह देह में
होते हुए भी विदेही हो जाता है, ऐसे उस कृष्ण में देहत्व कैसे होगा? कृष्ण का देह नष्ट नहीं हुआ; दर्पण का
प्रतिबिम्ब जिस प्रकार स्वयं में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार जो भास था वह मूल स्वरूप में मिल गया।
जिसका नामस्मरण करते ही भक्तों का जन्म-मरण समाप्त हो जाता है, वह कृष्ण ही यदि मर जायेगा तो भक्तों
का उद्धार कौन करेगा? आत्ममाया की लीला से कृष्ण, कृष्ण के रूप में प्रकट हुआ था, वह लीला छोड़कर
निजरूप में निजत्व में स्थिर हो गया। कृष्ण देह को न ले गया, न छोड़ गया। उसने लीला से ही उसे भक्तों के
ध्यान में रखा और स्वयं निजधाम चला गया। जैसी भक्त की श्रद्धा होती है, वैसा ही भगवान होता है। इसलिये
देखो! वह भक्त के ध्यान में ही अपना देह स्थापित कर, निजधाम न जाकर ही चला गया। कृष्ण की मूर्ति यद्यपि
सगुण साकार थी, लेकिन उस देह का दहन होना सम्भव नहीं था क्योंकि सारा संसार ही श्रीकृष्ण के आश्रय में
८३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण, यदि कृष्ण के देह का दहन होता तो सारे संसार का ही दहन हो जाता। जिसने अपनी माँ को
बचपन में, पेट में अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया था, उस कृष्ण के देह का दहन हो जाने पर संसार की
बात करना ही सम्भव नहीं होगा। श्रीकृष्ण का देह विदेहरूप था, उसका दहन कैसे होता ? कृष्ण का रहना और
जाना अकेले कृष्ण ही जानें। उसके सम्बन्ध में वेद की वाचा भी मौन हो जाती है। उसका ज्ञान यहाँ नहीं चल
पाता। कृष्ण की यह अगम्य गति ब्रह्मदेव और शंकर के भी समझ में नहीं आती। उनका विचार था कि श्रीकृष्ण
हमारे साथ चलेंगे। इसी विचार से देवताओं का समुदाय आनन्दित हुआ और उन्होंने बड़े आनन्दोत्सव का
आयोजन किया।
दिवि दुन्दुभयोनेदुः पेतुः सुमनसश्च खात्।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्चानु तं ययुः ॥७॥
देव अत्यन्त आनन्दित हुए, उन्होंने दुन्दुभी बजाना शुरू किया और आकाश से श्रीकृष्ण पर दिव्य पुष्पों की
वर्षा की। वैकुण्ठ तथा स्वर्ग से श्रीकृष्ण मृत्युलोक में सम्पत्ति ले आये थे, वह अब हमें वापस मिल जायेगी यह
सोच कर देवतागण हर्षित हो गये और वे कृष्ण पर बार-बार पुष्पवृष्टि करने लगे, किन्तु शंकरादि देवतागण जब
ध्यानपूर्वक श्रीकृष्ण की ओर देख रहे थे तभी अतर्क्य गति से श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। कैसे गये, किसी को
मालूम नहीं हुआ। हम सब माया के नियंता हैं, सर्वद्रष्टा तथा सर्वज्ञाता हैं ऐसा देवताओं को अभिमान था, किन्तु
श्रीकृष्ण ने उन सबको लज्जित कर दिया। कृष्ण की गति अतर्क्य थी, वह ब्रह्मदेव और शंकर की भी समझ में
नहीं आयी इसलिये वे चकित रह गये। अन्य सारे देवता भी आश्चर्य करने लगे। देवतागण आश्चर्य कर रहे हैं,
तभी सत्य, धर्म, धृति और कीर्ति ये देवता भी लक्ष्मी के साथ पृथ्वी छोड़कर कृष्ण की ओर देखकर चल दीं।
सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति इनकी श्रीकृष्ण चरणों के पास बस्ती थी, इसलिये वे भी पृथ्वी छोड़कर तत्काल
कृष्ण के साथ चल दीं। लेकिन हे परीक्षित ! शायद तुम सोचोगे कि क्या सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति ये सभी
पृथ्वी छोड़ कर चली गयीं ? उसके बारे में भी सुनो। हे कुरुश्रेष्ठ! मेरा विचार है कि जिनके हृदय में श्रीकृष्ण की
मूर्ति अंकित रहती है, वहाँ सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति का साम्राज्य रहता है। केवल भक्तों का अनुग्रही
श्रीकृष्ण स्वयं लीलाविग्रही (अर्थात् स्वेच्छा से, विग्रह अर्थात् देह धारण करने वाला) कृष्ण की गति ब्रह्मादि
देवताओं की भी समझ में नहीं आयी।
देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः ॥८॥
इन्द्र, बृहस्पति और मुख्य रूप से ब्रह्मदेव इन सभी देवताओं को भ्रम में डालकर श्रीकृष्ण ने निजधाम में
प्रवेश किया। हरि की यह महिमा अतर्क्य है। श्रीकृष्ण की अतर्क्य गति, देवताओं को भी अपने सामर्थ्य से नहीं
मालूम हुई इसलिये वे मन ही मन विस्मित होकर अपने-अपने गंतव्य स्थल की ओर चल पड़े। वे इस बात से
चकित थे कि कृष्ण की गति अलक्ष्य है। वह समझ में आने लायक नहीं है। शंकर के लिये भी वह अतर्क्य है।
कृष्ण की ऐसी अतर्क्य गति, जो देवताओं को दैवी शक्ति के रहते भी समझ में नहीं आयी, वही शुक्राचार्य दृष्टांत
देकर परीक्षित को समझा रहे हैं।
सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्याहित्वाभ्रमण्डलम्।
गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यै स्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥ ९ ॥
इकतीसवाँ अध्याय ८३३
मेघमण्डल में बिजली कड़कती है, लेकिन वह कहाँ से आती है और कहाँ जाती है, यह जिस प्रकार
पृथ्वी पर के लोगों को नहीं मालूम होता; उसी प्रकार कृष्ण की अवतार शक्ति भी देवताओं को नहीं मालूम हुई।
वैकुण्ठ से आना और वापस जाना यह कृष्ण को सम्भव ही नहीं है क्योंकि वह सदा-सर्वदा परिपूर्ण भरा ही हुआ
है। आकाश में बस्ती करने के लिये जिस प्रकार खाली मकान नहीं मिलेगा, उसी प्रकार श्रीकृष्ण परमात्मा सर्वत्र
व्याप्त होने के कारण उसे दूसरी ओर जाने के लिये कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम गया।
उसकी महिमा अत्यन्त अद्भुत है। कृष्ण की महत्ता अतर्क्य होने के कारण उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं चलता
यह सोचकर देवतागण अपने-अपने गंतव्य स्थान की ओर चल दिये।
ब्रह्मरुद्रायस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा ॥ १० ॥
"हम अपने सामर्थ्य से माया के नियंता हैं। योग की दुर्गम गति हमें मालूम है, हम त्रिभुवन में सर्वद्रष्टा
अर्थात् सर्वज्ञ हैं।" इस प्रकार का अहंकार देवताओं में था। कृष्ण की गति देखकर उनकी जानकारी पानी पानी
हो गयी। लज्जा से अहंकार चूर-चूर हो गया। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति करना प्रारम्भ किया। शंकर पाँच मुखों
से स्तुति करने लगा। ब्रह्मदेव चार मुखों से कीर्ति का वर्णन करने लगा। कृष्ण की अगम्य गति देखकर समस्त
देवतागण आश्चर्यचकित रह गये। श्रीकृष्ण की स्तुति करके देवताओं को संतोष ही नहीं हो रहा था। वे उसी
प्रकार उनकी कीर्ति का वर्णन करते-करते अपने-अपने लोक चले गये। पहले कृष्ण की जो गति बतायी थी उसी
को अत्यन्त प्रेमपूर्वक, स्पष्ट करके श्रीशुकाचार्य पुनः परीक्षित को सुनाते हैं।
राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।
सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥
राजा परीक्षित! सुनो। श्रीकृष्ण इन सारे कारणों का कारण था। वह माया की भी चेतनाशक्ति था। जिसे
व्यक्तित्व नहीं है और वर्ण नहीं है, जिसे रूप नहीं है और गुण भी नहीं है, उस श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से ही
यदुवंश में अवतार लिया था। जो सारे वंश का मूल पुरुष, जो गोत्रों का गोत्रज, जो सारे जातियों की जाति, वही
यह श्रीकृष्ण स्वयं सबका आदिस्थान है। यदुवंश में उसका जन्म, अथवा गोवर्धन पर्वत उठाना आदि कर्म, उसी
प्रकार स्वकुल का क्षय, अथवा स्वयं का निर्वाण, यह सारा योगमाया का खेल है। उसी की सत्ता से उसने मत्स्य
कूर्मादि अवतार लिये। अन्त में उसी सत्ता से वह श्वेतवराह भी बना। श्रीकृष्ण की यह योग्यता अतर्क्य है।
श्रीकृष्ण केवल अवतार ही नहीं, अपितु वह तो चित्स्वरूप पूर्णब्रह्म है। उसका चरित्र अत्यन्त अतर्क्य, वह
ब्रह्मदेव, शंकर आदि के भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, उसी प्रकार
यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ। दर्पण में जिस प्रकार व्यक्ति के हाव-भाव दिखायी देते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण के
कर्म थे। हाथ से दर्पण गिरा दें तो जिस प्रकार सामने का प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार कृष्ण का निधन
मिथ्या और मायिक है। जिस प्रकार बहुरूपिया अनेक प्रकार के वेश धारण करता है और फिर उसे उतार देता है,
लेकिन बहुरूपिया नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का अवतार था। यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ था, फिर
भी वह सारे कर्मों से अलिप्त ही था। सृष्टि, स्थिति और अन्त होने पर भी वह नित्यमुक्त ही था। उसमें परम
अद्भुत ऐसे क्या होगा? किसी से किसी भी प्रकार की सहायता लिये बिना कृष्ण स्वयं ही सृष्टि की उत्पत्ति
करता है; उसका उचित प्रतिपालन करता है और फिर उसका संहार कर स्वयं शेष रहता है। कृष्ण उत्पत्ति,
८३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्थिति और लय करता है, उसकी यह महत्ता संसार में प्रत्यक्ष दिखायी देती है। कृष्ण सारे कर्म करके भी सदा
अविकारी रहता है। कभी भी विकारी नहीं होता। वह प्रत्येक प्राणिमात्र का अंतर्यामी है। संसार के सारे कर्मों का
कर्ता होते हुए भी वह अकर्ता और स्वस्वरूप से विदेही ही था। ऐसे श्रीकृष्ण की महिमा अगाध है। शिव, इन्द्र
और ब्रह्मदेव भी उसकी थाह नहीं पा सकते। उसका देह ही विदेह रूप था। उसी योग से वह निजधाम गया,
इसी अवतार में कृष्ण ने देह में विदेह कर्म दिखला दिया। यह तुम्हें पहले बता ही दिया है और भी बताता हूँ,
सुनो। उसने सात दिन तक अपने हाथ पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र का घमण्ड चूर कर दिया था। स्वयं
दावाग्नि प्राशन कर अग्नि को लज्जित किया और रासक्रीड़ा करके मदन का गर्व भी शान्त कर दिया। समुद्र को
पीछे हटा कर अपनी द्वारका नगरी बसायी और निद्रा भंग किये बिना सारी मथुरा द्वारका ले आये। सब्जी का पत्ता
खिलाकर सारे ऋषियों को तृप्त किया और अपने अंतर्यामी होने का लक्षण दिखला दिया। इसी देह से वह बछड़े
और उसका पालन करने वाला गोपाल बना और ब्रह्मदेव को लज्जित कर उसका अहंकार नष्ट किया।
मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।
जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२॥
श्रीकृष्ण ने इसी देह से यमलोक जाकर यम का निग्रह कर मृत गुरुपुत्र को वापस लाया। उत्तरा के गर्भ में
ब्रह्मास्त्र की महाशक्ति से तुम जल रहे थे, ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से तुम्हारा संरक्षण किया।
तुम्हारा संरक्षण करने का कारण यही था कि तुम्हारी माँ उसकी शरण में चली गयी और कृष्ण शरणागत की रक्षा
करने वाला है तथा भक्तों का संकट दूर करने वाला है। द्वारका में अर्जुन ने यादवों के सामने प्रतिज्ञा की थी कि
षष्ठी के दिन द्विज के पुत्र का मैं संरक्षण करूँगा। लेकिन वह लड़का उसी रात सदेह अदृश्य हो गया। तब उस
ब्राह्मण ने अर्जुन की भर्त्सना की। इससे अर्जुन को लज्जित होना पड़ा। इससे कृष्ण के मन में दया का उदय हुआ
और वह भक्त की सहायता के लिये आ पहुँचा। अर्जुन को लेकर कृष्ण रथ में बैठा और क्षीरसागर की ओर चल
पड़ा। वहाँ नारायण के पास उस ब्राह्मण का पुत्र था, उसे द्वारका लाया। इस प्रकार श्रीकृष्ण भक्त का संकट स्वयं
दूर करते थे। श्रीकृष्ण प्रताप की महिमा अलौकिक है और भी सुनो। बाणासुर की सहायता करने शंकर युद्ध
करने आया, उस समय कृष्ण ने नंदी, भृंगी, वीरभद्र तथा कार्तिक स्वामी आदि के साथ शंकर को पराजित
किया। उग्र से भी उग्र, भयंकर से भी भयंकर कालाग्निरुद्र को पराजित कर बाणासुर की भुजाओं का भार कम
कर दिया। कृष्ण का वचन भी अगाध है। जिसने महान अपराध किया था, उस जरा व्याध को अपने वचन पर
दृढ़ रह कर देह के साथ स्वर्ग भेज दिया। इतना सामर्थ्य जिस श्रीकृष्ण के पास था, क्या वह अपना देह बचाने में
असमर्थ था ? लेकिन उसके देह में देहत्व था ही नहीं। वह निजात्म रूप से निजधाम गया। इतना सामर्थ्य होते
हुए वह निजधाम क्यों गया ? उसी देह से इस लोक में रहने में क्या उसे किसी का भय था ? ऐसा विकल्प
तुम्हारे मन में शंका उत्पन्न कर सकता है। तो सुनो। श्रीकृष्ण के मन में लोकाभिमान जरा भी नहीं था। उसकी
स्थिति स्वेच्छा की थी। (अर्थात् अन्य जीवों की तरह कर्म परतंत्र नहीं था।)
तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्ययेष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक्।
नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३॥
माया तथा उसके सत्त्वादि तीनों गुणों का कारण स्वयं श्रीकृष्ण हैं। अनादित्व के कारण उसका कोई कारण
नहीं है। अनंतकोटि ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, स्थिति और लय करके भी वह अलिप्त ही रहता है। श्रीकृष्ण में अनेक
इकतीसवाँ अध्याय ८३५
अद्भुत सामर्थ्य थे। संसार में जो बड़ी-बड़ी शक्तियाँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण की शक्ति के अंश से ही सामर्थ्य प्राप्त
हुआ है। उसका देह विदेहस्थिति का होने के कारण ही वह अपनी इच्छा से निजधाम गया। श्रीकृष्ण के मन में
इहलोक की आसक्ति नहीं थी और वैसे निजधाम के प्रति भी आतुरता नहीं थी। इसी देह से इस लोक में रहना
भी उसे उपयुक्त नहीं लगा क्योंकि उसने सोचा कि मेरे देह की अगम्य स्थिति को देखकर साधकों की स्थिति
बिगड़ जायेगी। मेरा देह चैतन्यघन होने के कारण उसे विषय की बाधा नहीं होती, यह देखकर साधक भी
देहसाधना करने लगेंगे। वायु का पूर्ण निरोध कर अपना देह अमर कर, मेरी तरह विषय सेवन करने का उन्हें
मोह होगा और देहाभिमान भी बढ़ेगा और ऐसा देहाभिमान बढ़ने पर उनका निजात्मज्ञान नष्ट हो जायेगा। इस
विचार से श्रीकृष्ण विदेहरूप से निजधाम चले गये। मेरे आत्मज्ञान का आकलन तो नहीं होगा लेकिन योगी लोग
मेरी तरह विषयसेवन अवश्य करने लगेंगे। इसीलिये वह निजधाम चला गया। जिसके देह का दर्शन करने से मन
अंतर्बाह्य तृप्त हो जाता है, वह देह ही मिथ्या है यह दिखाकर वह निजधाम चला गया। इस प्रकार देहाभिमान
छोड़ने के लिये ही कृष्ण ने निजधाम का गमन किया। उस कृपा सागर ने साधक जनों को तारने के लिये ही यह
दीक्षा दी। यहाँ तक वैराग्य की स्थिति दृढ़ हो और देहाभिमान के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर आत्मज्ञान साध्य किया
जाय यही दीक्षा श्रीकृष्ण ने दी। इसके अतिरिक्त, श्रीकृष्ण ने जिस देह से अनेक लीलायें कीं लेकिन उस देह के
कर्म से ज्ञाता को दोष नहीं लगता, यह भी उन्होंने प्रकट किया। जय मिले या पराजय, किसी भी स्थिति में ज्ञाता
का मन मलिन नहीं होता। जिसे पुरुषों का और स्त्रियों का भास भी मिथ्या लगता है, वह व्यभिचार में भी
निरन्तर ब्रह्मचारी ही है। स्त्री बच्चों के साथ गृहस्थी करते हुए भी कोई नित्य संन्यासी हो सकता है यह लक्षण
भी श्रीकृष्ण ने अपने अवतार में दिखला दिया। मूलरूप में ग्वाला, लेकिन शीघ्र ही मथुरा में पूर्ण स्वामित्व प्राप्त
हुआ और अन्त में स्वयं सेवक ही बना लेकिन पूर्णत्व में बाधा नहीं आयी। एक के घर जूठन उठायी, एक के
घोड़ों को नहलाया-धुलाया फिर भी पूर्णत्व में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी। किसी को उसके मृत पुत्र
लौटाये; किसी के पूरे कुल का ही नाश कर दिया लेकिन इन दोनों कृतियों में उसका ज्ञान मलिन नहीं हुआ यह
भी दिखा दिया। एक का पूर्ण समर्थक बना तो दूसरे का कट्टर शत्रु बन गया लेकिन चराचर में स्थापित ऐक्य
रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। जिसके चरणों पर गिरते ही उनका उद्धार हो गया, वह स्वयं भी किसी के चरणों पर
मस्तक रखता है। उसके ज्ञान का महत्त्व किन शब्दों में वर्णन किया जाय? परस्पर विरुद्ध कृतियों में भी उसके
ज्ञान में कमी नहीं आयी। अन्य ज्ञातागण अपना ज्ञान शब्दों में व्यक्त करते हैं किन्तु कृष्ण की बात वैसी नहीं थी।
उसने उसके अनुसार आचरण कर मार्ग दिखला दिया। ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ लक्षण श्रीकृष्ण ने अपने आचरण में
दिखला दिये, फिर भी पूर्णत्व के कारण अपने में कोई कमी नहीं आने दी। जिस देह की इतनी ख्याति है, जिस
देह के कारण ही दीनजनों का उद्धार होता है, जिस देह को देव, दानव और मानव भी वन्दन करते हैं और जिस
देह की कीर्ति त्रैलोक्य वर्णन करता है, उस देह का निःशेष अभिमान त्याग कर, अपनी मूर्ति स्वभक्तों के ध्यान में
रखकर श्रीकृष्ण निजधाम चला गया। श्रीकृष्ण देह को ले भी नहीं गये और छोड़ भी नहीं गये। वह लीला विग्रह
से समस्त विश्व में व्याप्त होकर, वह लीलादेह अपने भक्तों के ध्यान में प्रतिष्ठित किया और स्वयं निजात्म योग
से निजधाम चला गया।
य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।
प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४॥
श्रीकृष्ण अवतार के अन्त में कृष्ण की जो परमगति हुई, वह सर्वोत्तम योगस्थिति है। वह देवश्रेष्ठों को भी
८३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अतर्क्य है। उस गति से ऊँची कोई गति ही नहीं है। इसीलिये ज्ञाता वेदशास्त्र में उसे 'परा पदवी' कहते हैं। कृष्ण
की इस 'परमपदवी' का जो कोई भक्तियुक्त भावना से, शुद्ध अंतःकरण से, नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल पठन
करेगा; भक्तियुक्त हृदयकमल में जो इन श्लोकों की जपमाल करेगा और नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल जिह्वाग्र पर
रखेगा, जो प्राण रहने तक इस नियम को भंग नहीं करेगा, वह उत्तमत्व प्राप्त करेगा। कृष्ण की इस उपाधि का
गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण छुएँगी। उनकी भी उपेक्षा कर वह स्वयं कृष्ण उपाधि तक निश्चित रूप से
पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह विद्याओं का जन्मस्थान है। उनका जो प्रातःकाल पठन करेगा, वह
पूर्ण रूप से कृष्ण उपाधि तक पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक भुवनों का जीवन है। उनका नियमपूर्वक पठन करने से
कृष्ण की पूर्ण उपाधि अवश्य प्राप्त होगी। ये चौदह श्लोक चौदह पदों का गयावर्जन है। उनका नियमपूर्वक पठन
करने से विष्णुपद पर पिण्डदान करने का फल प्राप्त होता है। (जीव को शिवपद का समाधान प्राप्त होता है) ये
चौदह श्लोक चौदह इन्द्रों के जीवों का जीवन है। उनका नियम से पठन करने से हम इन्द्रों के भी इन्द्र बन जाते
हैं। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह काण्डों का पूर्ण वेद ही है। उसका नियमपूर्वक पठन करने से वेद पठन का
समाधान प्राप्त होता है। इनका नियमपूर्वक पाठ करने से संसार के गुण, कर्म, वर्ण आदि का निराकरण होकर
पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है। प्रातःकाल इसका नियमपूर्वक पठन करने से परिपूर्ण ब्रह्म प्राप्त होगा और जो इसका
त्रिकाल पाठ करेगा वह तो अपने ही देह से कृष्णस्वरूप बन जायेगा और जो इसके पठन के अलावा इसके अर्थ
पर विचार करेगा वह स्वयं श्रीकृष्ण ही हो जायेगा। श्रीकृष्ण की उपाधि उसकी दासी बनकर रहेगी। कृष्ण
उपाधि (अर्थात् कृष्ण का निर्वाण वृत्तांत) के श्रवण, पठन और अर्थ से भी साधकों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है,
यही परमार्थ सिद्धि का गूढ़ निरूपण है। इसमें अधिक साधना की भी आवश्यकता नहीं है, अनायास ही ब्रह्मज्ञान
की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से तथा नियमपूर्वक पठन करने से कृष्ण की पूर्ण उपाधि प्राप्त होती है। तक्षक के भय
से मुक्त होने के लिये तथा देह में रहकर विदेहता प्राप्त करने के लिये यह अत्यन्त सरल उपाय है ऐसा शुक्राचार्य
ने परम कृपा से परीक्षित को बताया। जो नियमपूर्वक इसका पठन करेगा उसे पूर्णब्रह्म की प्राप्ति होगी, ऐसी
शुक्राचार्य की पूर्ण प्रतिज्ञा है। इतना सुलभ उपाय होते हुए जो उस पर श्रद्धा नहीं रखेगा वह अविद्या का घरजमाई
होकर रहेगा और उसका संसार डूब जायेगा। वह अविद्या का गुलाम, विषयों में पला हुआ श्वान सदा अहंकार
के गड्ढे में बैठकर भौंकता रहेगा। उन मूर्खों की बात न करो। इससे मिला हुआ आनन्द कम हो जायेगा। कहने
का तात्पर्य यह है कि इन श्लोकों के पठन से परब्रह्म की भेंट होती है। कृष्ण की इस निजानंद उपाधि का वर्णन
करने में मैं दीन असमर्थ हूँ। लेकिन जनार्दन ने कृपापूर्वक यह निरूपण मुझसे कराया। एका (जनार्दन) की शरण
में है। श्रीकृष्ण उपाधि का निरूपण इस एकादश स्कंध का कलश है। उसे व्यासजी ने पूर्ण कराया। यह निरूपण
समाप्त हुआ यह जनार्दन की पूर्ण कृपा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। वहाँ का वृत्तांत शुक्राचार्य
परीक्षित को बताते हैं।
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।
पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिञ्चत् कृष्णविच्युतः ॥ १५ ॥
दारुक ने द्वारका की ओर देखा तो वह प्राणहीन प्रेत की तरह अथवा पदच्युत राजा की तरह कलाहीन
दिखायी देने लगी। रस निचोड़ने के बाद जिस प्रकार ऊख दिखायी देता है; अथवा जिस प्रकार दाना के बिना
भूसा दिखायी देता है, उसी प्रकार कृष्ण के बिना द्वारका भी चारों ओर से उदास दिखायी देने लगी। दारुक