श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार चक्रधारी श्रीकृष्ण ने जब अपने स्वकुल का विनाश किया, तो शेष बचा पृथ्वी का भार भी कम
हो गया होगा ऐसा उसे लगा और इससे उसे अत्यन्त समाधान हो गया। जिस प्रकार माली जमीन में अदरक बोता
है, पानी डालकर उसकी सेवा करता है और अन्त में उसे खन कर निकाल लेता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी
अपने यादववंश की हालत कर दी। यादवों का उसने ही अपने सामर्थ्य से संरक्षण किया था और उसी ने उन्हें मार
भी डाला। इससे मैं ममत्त्व से कितना दूर हूँ इसका उसने दिग्दर्शन कर डाला। कृष्ण समस्त यादवों का प्रतिपालक
था; उनके प्रति उसने आज तक ममत्व प्रकट किया था और अन्त में कुल का नाश कर उसने अभिमानरहित होना
भी प्रकट किया। अपने साथ-साथ स्त्री-बच्चों का और पूरे कुल नाश करने पर भी ज्ञाता को मोह नहीं उत्पन्न
होता। इस नित्यमुक्तता का श्रीकृष्ण ने आचरण कर दिखाया। ज्ञाता के मन में अहंकार तथा ममता नहीं होती, पूरे
कुल के साथ पुत्रनाश होने पर भी ज्ञाता को जरा भी दुःख नहीं होता यह श्रीकृष्ण ने दिखला दिया। ब्राह्मण के
भयंकर-शाप को उसने झूठ सिद्ध नहीं होने दिया। कुलक्षय का काम करने से श्रीकृष्ण को सुख प्राप्त हुआ। यह
देखकर बलराम ने भी अपने मन में विचार किया कि मेरा अवतार कार्य समाप्त हो गया।
रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।
तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६ ॥
फिर बलराम ने भी समुद्रतट पर अटल आसन लगाया और निर्वाण ध्यान प्रारम्भ किया। देह में प्राण को
आकृष्ट कर सारा देहाभिमान छोड़ दिया और परम पुरुष का ध्यान करते ही वह भी तद्रूप हो गया। घट का
आकाश जिस प्रकार सहज ही महदाकाश हो जाता है, उसी प्रकार देहाभिमान का त्याग करते ही बलराम
संकर्षणस्वरूप हो गया। मनुष्यधारी का जो रूप लिया था वह देह निःशेष छोड़ दिया और अपने पहले के स्वरूप
में रह लिया। समुद्र तट पर उसने अपना निर्जीव देह त्याग दिया। बलराम का यह निर्वाण देखकर श्रीकृष्ण ने भी
अपनी तैयारी प्रारम्भ की।
रामनिर्याणमालोक्य भगवान् देवकीसुतः।
निषसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥ २७॥
बलराम ने देह त्याग किया यह देखकर श्रीकृष्ण ने भी स्वयं निजधाम जाने की तैयारी की। पृथ्वीपालक,
श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण चुपचाप अश्वत्थ के नीचे वीरासन लगाकर बैठ गया। जिसके स्वरूप के माधुर्य से ब्रह्मदेव
और शंकर भी पागल हो गये, जिसके दर्शन को छोड़ दृष्टि आधे क्षण के लिये भी दूर नहीं जाती, दृष्टि से स्वाद
चखा यह देख रसना मन ही मन तड़फड़ाने लगी। वह उसके कीर्तन रस का स्वाद चटखारे लेकर लेने लगी।
बिना प्राशन किये ही अत्यन्त मधुर कृष्णरस जिह्वा चखने लगी तब विषय रस अपने आप ही फीका पड़ गया
और संसार नीरस हो गया। श्रीकृष्ण की कीर्ति जब कान में पड़ती है तब त्रिविध तापों की शान्ति होती है और
उसके गुणनाम की कीर्ति का वर्णन करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती हैं। जिसके चरण कमलों का
तुलसी से सुगन्धित हुए मकरंद को नाक से ग्रहण करने से बाकी सारे गन्ध तुच्छ लगने लगते हैं, जिसके देह का
स्पर्श होने से देहबुद्धि का नाश हो जाता है, ऐसे आनन्द की मूर्ति जो श्रीकृष्ण है वह शरीर में प्रत्येक अंग को
सुखद मालूम होता है। इच्छापूर्वक जिसके चरणों का वन्दन करने से समाधि भी लजा जाती है, वह श्रीकृष्ण
अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था। श्रीकृष्ण का वह आखिरी ध्यान शुक्राचार्य को बहुत
अच्छा लगा और वे प्रसन्नता से उसके ध्यान का वर्णन करने लगे।