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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 869 में से

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पृष्ठ 837

तीसवाँ अध्याय ८२१
उसकी हत्या याने कितनी बड़ी आत्महत्या का पाप मुझ पर लग गया ? सारे संसार की आत्महत्या करने वाला मैं
पूर्णरूप से पातकी हूँ। इस पाप से निवृत्त होने का कोई प्रायश्चित्त मुझे नहीं दिखायी देता। गलती से ब्रह्महत्या
होने पर, उस पाप में समूल डूब जाता है, और मैं मूर्ख पूर्ण ब्रह्म को ही तीव्र बाणों से घायल कर बैठा। मैं
मूलतया पापी बहेलिया हूँ; उसमें मैंने एक अपरिमित पाप जोड़ लिया। चित्स्वरूप जो कृष्ण परमात्मा है, उसे भी
मैंने दुःख दिया। इस पश्चात्ताप से वह इतना अधिक व्याकुल हो उठा कि उसने दौड़कर कृष्ण को साष्टांग
दण्डवत किया और उसके चरण मस्तक से लगा लिये। दैत्यों का अभिमान दूर करने वाले, मधु दैत्य का नाश
करने वाले मधुसूदन के पैर कस कर पकड़कर वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने उनके पैर कस कर पकड़
लिये, उसे उठाने का प्रयत्न करने पर भी वह नहीं उठा; और कृपादृष्टि से मुझे क्षमा करें, संसार में दयालु केवल
तुम हो, इस प्रकार विनती करने लगा।
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन।
क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमश्लोक मेऽघ ॥ ३५ ॥
अत्यन्त भयभीत हुआ वह जरा बहेलिया बोला, मैं अत्यन्त दुष्ट पापात्मा हूँ, यह अपराध मुझसे अनजाने में
हुआ। मेरे हाथ से ईश्वर लिंग भंग हुआ। जो ईश्वर प्रतिमा का उच्छेद करता है, वह मूर्तिभंग करने वाला
महापापी है। दुर्भाग्य से तुझ ईश्वर को मुझ दुष्ट ने बाण से मारा। ऐसा मैं पापकर्ता महापापी हूँ। मेरे पाप जैसा
अन्य कोई उदाहरण नहीं है। अतः हे पुरुषोत्तम! हे कृपालु! मेरा अपराध क्षमा करें। त्रिभुवन में तुम ही सच्चे
कृपालु हो। तुमने परीक्षित का गर्भ में संरक्षण किया और हे कृपामूर्ति! गजेन्द्र के आतंक के समय तुम ही रक्षार्थ
कूद पड़े थे। जब पाण्डव लाक्षागृह में थे, उस समय विवर के द्वार से तुमने ही उन्हें बाहर निकाला। अन्त में
अर्जुन का पक्ष लेकर तुमने ही भीष्म से युद्ध किया। द्रौपदी के असाध्य संकट में तुमने ही दौड़कर उसे तिल भर
भी नग्न नहीं दीखने दिया। उसकी पहनने वाली साड़ी तुम बने। तुम्हारी कृपालुता की कहानियाँ वेद और पुराण
भी वर्णन करते हैं। बड़े-बड़े सिद्ध महर्षि उत्तम श्लोक में तुम्हारी कीर्ति का गायन करते हैं। अनजाने में मैंने
दुष्कर्म किया, उसके लिये मुझे क्षमा करें। हे पुरुषोत्तम ! तुम परमात्मा होने के साथ ही कृपालु और क्षमाशील
हो। अजामिल दुराचारी था। उसने केवल तुम्हारे नाम का उच्चार किया, तभी उसका पाप भस्म हो गया। निष्पाप
करने के सम्बन्ध में तुम्हारे नाम का इतना अधिक महत्त्व है। दुर्बुद्धि लोग नाम से ही निष्पाप हो जाते हैं।
पितृघाती भी नाम से निष्पाप होते हैं; दुराचारी भी नाम से तर जाते हैं। तुम्हारे नाम की इतनी अधिक ख्याति है।
यस्यानुस्मरणं नृणामज्ञानध्वान्तनाशनम्।
वदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृतं प्रभो ॥ ३६ ॥
जिस विष्णु का नामस्मरण कोटि-कोटि जन्मों का अज्ञान नष्ट कर सभी प्रकार का कल्याण करता है, इतनी
जिसके नामस्मरण की योग्यता है, उसके शरीर को मैंने अपने हाथ से निर्वाण बाण से विद्ध किया। यह पूर्णरूप
से मेरा अपराध है। साधु-सज्जन जिसके महात्म्य का निरन्तर वर्णन करते हैं, जो स्वरूप से सच्चिद्धन है, ऐसा
वह श्रीकृष्ण सारे जगत का स्वामी है। श्रीकृष्ण का अर्थ है संसार का जीवन, ऐसे कृष्ण को भी मैंने निर्वाण बाण
से घायल किया। मेरा यह बहुत बड़ा अपराध है। कृष्ण तो पूरे त्रैलोक्य का समर्थ राजा है, मेरे हाथ से यह
राजघात हुआ। उसी प्रकार श्रीकृष्ण संसार का होने के कारण मैंने आत्मघात भी किया। श्रीकृष्ण संसार का पिता
है, अतः मैंने पितृघात भी किया। संसार का प्रतिपालन करने के कारण श्रीकृष्ण इस संसार की माँ है, अर्थात् मैंने