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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 869 में से

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पृष्ठ 836

८२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
और पैरों पर लटकने वाली शोभायमान वनमाला; मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट; उसमें चमकने वाले मूल्यवान रत्न
कीर्तिमुख के बाहुभूषण और अनेक रत्नों के हार, उपासक के यंत्र जैसी उँगलियों में अँगूठियाँ, उनमें त्रिकोण,
षट्कोण के आकार के हीरे जड़े हुए, गले में वैजयंती माला तथा मोतियों की एक लड़ी की माला और उसमें
पदक; नानाप्रकार के रत्नों के हार और सुगन्धयुक्त तुलसी की मालाएँ; पीताम्बर रत्नों से जड़ा हुआ जिसके दोनों
छोरों में मोतियों की जाली टंकी हुई; कमर में चित्रविचित्र नूपुर शोभायमान हो रहे थे, पैरों में नूपुर की झंकार
तथा पैंजनी आदि शोभा दे रहे थे। कमल से भी नाजुक श्रीकृष्ण के चरण थे। इस प्रकार देदीप्यमान कृष्ण
अप्रतिम रूप से शोभायमान था। शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध लेकर वह पीपल के आश्रय में वीरासन
लगाकर बैठा था। वह वीरासन इस प्रकार था कि दाहिना पैर नीचे रखकर उस जाँघ पर बायाँ आरक्त चरण रखा
हुआ था। सायंकाल के संधि प्रकाश को लज्जित करने वाली तथा बालसूर्य को न्यूनता दिखलाने वाली अत्यन्त
देदीप्यमान और कोमल आरक्त कांति श्रीकृष्ण के पैरों की थी।
मुसलावशेषायः खण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया ॥ ३३॥
अपने कुल की होली खेल सरस्वती के तट पर श्रीकृष्ण पीपल से टेक कर बैठा था, दाहिने पैर पर रखे
बायें पैर का उसका आरक्त तलुवा दिखायी दे रहा था। उसे मृग का मुख समझ कर 'जरा' नामक बहेलिये ने
उसका निशाना साधा और तीव्र गति से उसके पैर को छेद दिया। ब्राह्मण के शाप से जो लोहे का मूसल तैयार
हुआ था उसका चूर्ण करने के बाद यादवों ने लोहे का जो छोटा-सा टुकड़ा बच रहा था उसे समुद्र में फेंक दिया
था। समुद्र में एक मछली ने उसे निगल लिया था। उस मछली को 'जरा' नामक बहेलिये ने अपने जाल में फाँस
लिया। उसने उस मछली को चीरा, तो उसके पेट में से वह लोहे का टुकड़ा निकला। उस लोहे के टुकड़े का
बहेलिये ने बाण बनाया और उस बाण ने श्रीकृष्ण के चरण को भेद दिया। मछली के पेट में से निकले लोहे का
बाण तैयार करने से मनचाहा शिकार अवश्य प्राप्त होता है, इस विचार से बहेलिये ने उसका बाण तैयार किया
था। श्रीकृष्ण के पैर भेदने का प्रमुख कारण ब्राह्मण का शाप ही था। इसीलिये 'जरा' बहेलिया का वह बाण कृष्ण
के पैर में घुसा। लेकिन कृष्ण जरा भी नहीं चौंका। इसके विपरीत, बाण लगते ही उसे प्रसन्नता ही हुई।
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्विषः।
भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विषः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण के पैर में बाण पूरी तरह घुसते ही 'जरा' बहेलिया का हाथ तृप्त हो गया। उसने कहा, आज मैंने
बहुत बड़ा मृग मारा और वह मृग को पकड़ने के लिये दौड़ा। सामने चतुर्भुज पुरुष को देखकर 'जरा' बहेलिया
को अत्यन्त भय लगा। उसने मन ही मन कहा, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया, मैंने एक महान पुरुष को मार
दिया। हाय! हाय रे मेरा प्रारब्ध। तुमने मुझसे कितना दुष्ट कृत्य कराया। अब मुझ जैसे महापापी के असाध्य
दुःख का कौन निवारण करेगा? संसार का परमात्मा जो श्रीकृष्ण है उस पर मैंने प्रहार किया। मुझ जैसा पाप
किसी का नहीं होगा। भय से उसके शरीर में सिहरन होने लगी। उसने कहा, मेरे हाथ से बहुत बड़ा पाप हो
गया। संसार को जो ध्येयस्वरूप है, उसे ही मैंने ताप दिया। देवता भी जिसके चरणों का वंदन करते हैं, संत जिसे
साक्षात दण्डवत करते हैं, उस श्रीकृष्ण को ही मैंने बाणों से घायल कर दिया। इससे मुझे भयानक पातक लग
गया। कभी आत्महत्या करने पर वह पाप कभी नहीं गिरता और सारे संसार का प्रिय आत्मा जो श्रीकृष्ण है,