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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 839, कुल 869 में से

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पृष्ठ 839

तीसवाँ अध्याय ८२३
उन्हें भी हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी लीला का सामर्थ्य समझ में नहीं आता। उन्होंने वैकुण्ठ में क्रोध में जय-विजय को
शाप दिया था। वेदशास्त्रों में पारंगत बृहस्पति आदि जो वाणी के नियंता हैं, उन्हें भी हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी लीला का
खेल समझ में नहीं आता। जब परमार्थ के सज्ञान ज्ञाता तुम्हारी अवतार शक्ति का आकलन नहीं कर पाते, तो फिर
इन्द्रादि देवताओं को वह स्थिति कैसे मालूम हो पायेगी ? हे जगजेठी श्रीकृष्ण! इन्द्रादि देवताओं को स्वर्ग के दिव्य
भोगों की लालसा होने के कारण उनकी आँखों पर माया का आवरण रहता है, उन्हें तुम्हारी लीला की बात समझ
में नहीं आती। फिर अविद्यात्मक देह धारण करने वालों को इस बात का ज्ञान कैसे होगा ? हे श्रीकृष्ण तुम्हारी
लीला सबको सभी दृष्टियों से अतर्क्य है। ब्रह्मज्ञान भी सहज ही प्राप्त किया जा सकता है लेकिन तुम्हारी अपनी
ही लीला से देह धारण करना इसका पूर्ण आकलन बड़े-बड़े ज्ञाता भी नहीं कर पाते। तिस पर मैं तो अधम पुरुष
हूँ, अतः तुम्हारी लीला का वर्णन करना मेरे लिये असम्भव है। अब यह सब कहना व्यर्थ है। कृष्णा! मेरे देह को
दण्ड देकर मेरे पाप का निवारण करो। तुम्हारे हाथ से दण्ड पाने से मेरे सारे पापों का क्षालन होगा। इसलिये मेरा
उद्धार करने के लिये मुझ पर इतनी कृपा कीजिये। इतना कहकर उसने साष्टांग दण्डवत किया और दौड़कर उसके
दोनों पैर पकड़ लिये। यह स्तवन सुनकर श्रीकृष्ण कृपा से सन्तुष्ट हो गये।
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ ३९॥
वेदों से मंथन किया हुआ बोध; जो जगत का आनन्दकंद है, जो स्वरूप से शुद्ध आनन्द है वह श्रीकृष्ण
कृपामय होकर ब्याध से बोला, तुम जीवों का शिकार करने वाले बहेलिया हो और मुझ पर किये अपराध के
कारण भयभीत हो, किन्तु मैं तुम्हें अभय देता हूँ, क्योंकि तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न कर दिया है। लड़कों
ने सांब को स्त्रीवेश दिया था, उस कपट के कारण ब्राह्मण को कोप हुआ जिसके कारण यादव कुल को ब्राह्मण
का शाप लगा। यह त्रिविध संकल्प मेरा ही है। उस शाप में शेष बचा हुआ लोहा, उसका बाण बनाकर तुमने मृग
के शिकार के लोभ में मेरे पैर को घायल कर दिया; उसके लिये भी मेरा संकल्प ही कारण है। बुद्धि की अनादि
बुद्धि मैं हूँ, क्रिया की क्रिया भी सचमुच मैं हूँ, ऐसा होते हुए तुम व्यर्थ के अभिमान से स्वयं को अपराधी मान
रहे हो। किन्तु मेरा दर्शन ही इस पाप का प्रायश्चित्त है। मेरे एक नाम से कोटि-कोटि महापातक जलकर नष्ट हो
जाते हैं। तुमने मुझे देख लिया, मेरा दर्शन तुम्हें बड़े भाग्य से ही हुआ। क्षणार्ध की मेरी भेंट के लिये कोई
गिरिकन्दराओं में जाते हैं, कोई योग-याग का प्रयास करते हैं तो कोई हठयोग का आश्रय लेते हैं। इस प्रकार के
नाना प्रकार के प्रयासों से कोटि-कोटि कल्प तक कष्ट सहने पर भी स्वप्न में भी मेरी भेंट नहीं होती। तुमने तो
मुझे प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख लिया। मेरा दर्शन होने से समस्त पापों का नाश होता है अतः तुम पूर्ण रूप से
पुण्यात्मा ही हो। व्यर्थ में अपने मन में पाप का अभिमान मत रखो। पापाभिमान से नरक प्राप्ति, पुण्याभिमान से
स्वर्गप्राप्ति और अभिमानरहित होने पर मेरी प्राप्ति होती है, इस मेरी वचनोक्ति को सत्य समझो। तुम्हें लगता है
कि श्रीकृष्ण परब्रह्म और परमात्मा है, उसे मैंने तीक्ष्ण बाण मारा यह अत्यन्त घोर और अनिवार्य पातक है। किन्तु
लोहे का और पारस का मिलन होने पर लोहा सुवर्ण बन जाता है; लोहे का हथौड़ा यदि पारस पर मारें तो भी
उसके आघात से वह सुवर्ण ही बन जाता है; उसी प्रकार भक्ति से मेरी भेंट होने पर पातक पलक झपकते ही
नष्ट हो जाते हैं अथवा द्वेष से भी मेरी ओर देखने पर पातक नष्ट हो जाते हैं। औरों का अपराध करने पर प्राणियों