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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 843, कुल 869 में से

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पृष्ठ 843

प्रकार सबके दुःख का कारण मैं बनूँगा। मेरा भाषण सुनकर सबका प्राणांत हो जाएगा इसलिये इतना भयंकर
दुःख देने के लिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगा क्योंकि जिन्हें यह बात बताऊँगा वह उनके लिये जानलेवा ही सिद्ध हो
सकती है। कृष्ण! इतना घोर निष्ठुर मैं नहीं हो सकता। हे श्रीकृष्ण! चींटियों के बिल को आग लगाने की तरह
मुझे यह वार्ता द्वारका में मेरे इष्टमित्रों को बतानी होगी। फले-फूले वन में जैसे कोई आग लगा दे, उस प्रकार
कृष्ण निधन का दहकता समाचार सुहृदों के कानों तक कौन ले जायेगा? डूबने वाले के मस्तक पर जिस प्रकार
शिला नहीं रखी जाती उसी प्रकार कृष्ण के साथ पूरे कुल का विनाश हो गया यह समाचार मैं इष्ट मित्रों को नहीं
बताऊँगा। कृष्ण! आप्त इष्टों को सुख देने के बजाय महद्दुःखों की राशि लेकर मैं इष्ट मित्रों के पास नहीं
जाऊँगा। अब आप कहेंगे कि तुम बुद्धिमान हो, सारे जनम में तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, ऐसा
होते हुए अब अन्त समय में तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों कर रहे हो? तो हे कृष्ण! अंतकाल का आपका
सुख देखने में मुझे प्रसन्नता हो रही है। उसे छोड़ लोगों को दुःख देने के लिये मैं नहीं जाऊँगा। कुलनाश का
दुःख अत्यन्त भयंकर है। कृष्ण का निधन तो और भी अधिक तापदायक है। अतः ऐसा भाषणरूपी विष मैं
संसार को नहीं दे सकता। तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँ तो संसार को महद्दुःख देना होगा और यदि तुम्हारी
अवज्ञा करूँ तो मुझे नरक भोगना होगा। इसलिये अब स्वयं ही विष खाकर तुम्हारे सामने मरूँ यही अच्छा होगा।
इससे मुझे निश्चित रूप से अलौकिक उत्तम गति प्राप्त होगी। इतना कहकर दारुक ने साष्टांग दण्डवत किया
और मस्तक पर श्रीकृष्ण ने दोनों पैर रख लिये। दारुक की वह भक्ति देखकर श्रीकृष्ण का हृदय पसीज उठा और
जिससे उसका शोक और मोह नष्ट होगा ऐसा मर्म वह उसे बताने लगा।
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचनामेतां विज्ञायोपशमं व्रज ॥ ४९ ॥
मेरे धर्म का जो लक्षण है उस पर यदि तुम दृढ़ होकर रहो तो मेरा ज्ञान विज्ञान तुम्हें प्राप्त होकर तुम स्वयं
ब्रह्मस्वरूप होकर रहोगे। अब तुम पूछोगे कि धर्म का लक्षण क्या है? तो हे दारुक! ध्यान देकर सुनो। मेरे सारे
सद्धर्म ऐसे हैं। हृदय में नित्य मेरा ध्यान रखो, मुख में मेरा नामकीर्तन रहने दो। कानों से मेरी कथा श्रवण करो
और हाथों से नित्य मेरी पूजा करो। आँखों से मेरी मूर्ति का दर्शन करो, पैरों से मेरे मन्दिर में जाओ और रसना से
मेरे तीर्थ का प्राशन करो और मेरे प्रसाद का आदर के साथ भक्षण करो। मुझे साष्टांग नमस्कार करो। मेरे भक्तों
का आनन्दपूर्वक आलिंगन करो। प्रेमपूर्वक मेरी सेवा किये बिना एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दो। देखो, इस प्रकार
मेरी सेवा करते हुए सभी प्राणियों में मेरा ही भाव रखना, यह सभी धर्मों का राजा है। इसमें विघ्न प्रवेश कर ही
नहीं सकता। समस्त प्राणियों में जब मैं ही दिखायी देने लगता हूँ तो वैराग्य पूर्णरूप से भर जाता है। तब
देहाभिमान को नष्ट करने वाला शुद्ध ज्ञान सहज उत्पन्न हो जाता है। देहाभिमान नष्ट होने पर आशा भी शून्य रह
जाती है, तभी निरपेक्षता पूर्णरूप से, अपने आप प्राप्त होती है। यह निरपेक्षता ऐसी ही है कि जिस प्रकार ज्ञाता
लोग मृगजल की उपेक्षा करते हैं, उसी प्रकार विषय मिलने पर इन्द्रिय उनकी उपेक्षा करते हैं। इस दृष्टि से
चराचर की ओर देखने पर सारा व्यवहार ही मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार डोर का आकार सर्प की तरह
लगता है, उसी प्रकार संसार का भास भी भ्रम के ही कारण होता है। उसी प्रकार विषय में व्यवहार और संसार
यह भी मिथ्या और मायिक ही है। जिस प्रकार सीप का रंग चाँदी की तरह दिखायी देता है लेकिन उसका कोई
अलंकार नहीं बनता उसी प्रकार यह संसार भी मिथ्या अर्थात् भासमान मायिक व्यवहार है। संसार का भान ही
मूलतयः मिथ्या है, उसका बन्धन भ्रांत व्यक्ति को ही होता है। अतः उसमें भुक्ति भी शुद्ध भ्रम ही है। हम पूर्ण