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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 869 में से

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पृष्ठ 842

८२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही मैं अब अलग-थलग पड़ गया। श्रीकृष्ण मुझसे क्यों रुष्ट हो गये? जीवनपर्यंत कृष्ण का सुख भोगा अब
वियोग का दुःख भोगना पड़ा। कृष्ण ! तुमने मुझे क्यों वंचित किया? मैं तुम्हारा दीनदास हूँ। मेरे शब्द की तुमने
आज तक कभी भी उपेक्षा नहीं की। उसे ही श्रीहरि ! तुमने अब दूर ढकेल दिया? अपराधी बहेलिये को भी तारा;
अश्वध्वज के साथ रथ को भी आकाश में ले गये और मेरा उद्धार करने में क्यों हिचकिचा रहे हो? इस प्रकार
वह अत्यन्त व्याकुल हो गया। श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखकर उसे रुलाई आ गयी। आँखें आँसुओं से भर
आयीं। दारुक फुक्का फाड़कर सर नीचा करके रोने लगा। फिर बोला, अन्त में श्रीकृष्ण मुझसे विन्मुख हो गये,
इसका मुझे अत्यन्त दुःख है। वह दुःख से छटपटाने लगा। हाथ से सिर पीटने लगा। हे विधाता! मर जाओ। मेरे
ललाट पर तुमने यह क्या लिख दिया? फिर वह श्रीकृष्ण नाथ से बोला, तुम्हारे आगे विधाता की क्या बिसात
है? मैं यदि तुम्हें छोड़कर रहा, तो अत्यन्त दीन-हीन हो जाऊँगा। श्रीकृष्ण ! तुम्हारे सामर्थ्य पर मैं कलिकाल को
भी डाँट-फटकार देता था; उसे ही तुमने काल का दास और संसार पर पोषित बना दिया। उसका यह भाषण
सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम डरो मत।" और उसे गुप्त सलाह देकर वहाँ से चला गया। देखो! काल की गति
के अनुसार आज तुम ही मेरे निकट के रह गये हो। तुम्हें मैंने अपने काम के ही लिये रख लिया। तुम अब शीघ्र
द्वारका जाओ।
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथः।
संकर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मदशाम् ॥ ४६ ॥
द्वारकायां च न स्थेयं भवद्भिश्च स्वबन्धुभिः।
मया त्यक्तां यदुपरीं समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ ४७ ॥
स्वं स्वयं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च नः।
अर्जुनेनाविताः सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ ॥ ४८ ॥
द्वारका जाकर यादव आपस में कलह करके मर गये, यह पूरा वृत्तांत लोगों को दे दो। उसी प्रकार बलराम
द्वारा योगगति से देह विसर्जन करने की बात, तथा मेरी अवस्था के बारे में भी बताना। तुम वहाँ जाकर सबसे
कह दो कि वे द्वारका में न रहें, शीघ्र बाहर निकलें, यह मेरी आज्ञा उनसे कह दो। द्वारका छोड़कर जाने का
कारण तुम्हें बताता हूँ। दारुक ! तुम उत्तमज्ञानी हो, तुम्हारे ऊपर मेरा पूर्ण विश्वास है। इसीलिये तुम्हें यहाँ रोककर
अन्त समय का गुप्त रहस्य बताता हूँ। वह रहस्य यही है कि द्वारका जाकर वहाँ से सबको बाहर निकालो।
इसका कारण यह है कि मेरे द्वारका छोड़ते ही समुद्र चारों ओर से आकर इस नगर को डुबो देगा। मैंने समुद्र से
जमीन माँग कर ही वहाँ द्वारका बसायी थी, इसलिये मेरे निजधाम जाते ही वह आकर इसे डुबा देगा। इसलिये
तुम अतिशीघ्र जाओ और मेरे माता-पिता तथा अन्य सारे लोगों को द्वारका से बाहर निकालो। समुद्र वह स्थान
डुबा दे इससे पहले स्त्री-बच्चों आदि सबको बाहर निकालो। शासन समाप्त हो जाने से रास्ते चारों से भर जायेंगे
इसलिये कोई इक्का-दुक्का बाहर न निकले। अर्जुन को साथ में ले कर सब लोग इन्द्रप्रस्थ जायें, ताकि वह मार्ग
में आपकी सुरक्षा करेगा। कृष्ण का यह भाषण सुनकर दारुक को पुनः रुलाई आ गयी। उसकी जाने की इच्छा
नहीं थी और मछली जिस प्रकार पानी के बिना तड़पती है, उसी प्रकार उसके प्राण व्याकुल हो उठे। वह बोला,
अपने सारे कुल का विनाश कर श्रीकृष्ण आखिर चला ही गया। और मैं यह अपना काला मुँह लेकर यह वृत्तांत
बताने जाऊँगा। लोग कहेंगे कि श्रीकृष्णरूपी निजसुख खोकर यह अपना काला मुँह दिखाने यहाँ आया है। इस