श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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का अधःपतन होता है, लेकिन मेरा अपराध करने पर अपराधी को नित्यमुक्ति ही मिलती है। मेरा अपराध करने
से यदि नरक प्राप्ति होती है तो मेरा सारा सामर्थ्य व्यर्थ ही समझो। तो मेरे अपराध से उसे सुख ही प्राप्त होता है
और वह मुक्ति वैभव तक पहुँच कर भयमुक्त होता है। वह यदि विष भी प्राशन करे तो अमर होने से कोई नहीं
रोक सकता। उसी प्रकार द्वेष से भी वह मेरा दर्शन करे तो वह प्राणी को पावन ही करता है। जानबूझ कर घर में
आग लगाने से वह पूरे घर को भस्म कर देता है अथवा अनजाने ही छप्पर पर अग्नि रखने से भी वही बात होती
है। उसी प्रकार पूर्ण भक्ति से हो या द्वेष से हो जिसे मेरे दर्शन होता है वह अत्यन्त पावन हो जाता है। मेरा
निजधाम जाने का कार्य तुमने अनायास ही सरल कर दिया है, इसलिये मैं तुमसे अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। तुम तीनों
लोकों में परम पावन हो। जिसे तुम पूर्ण पातक समझते हो, जिस देह से तुमने मुझे बाण मारा, उसी देह से तुम
स्वर्ग के भूषण बनकर देवताओं में भी वन्दनीय होगे। यज्ञ करके याज्ञिक लोग पतनात्मक सुख प्राप्त करते हैं
लेकिन तुम्हारे साथ वैसा नहीं घटेगा। तुम अक्षय सुख ही प्राप्त करोगे। हे बहेलिये! मन के सारे संशय मिटा कर
तुम शीघ्र उठो मेरी बातें मिथ्या नहीं हैं, तुम अक्षय सुख प्राप्त करोगे। अब तुम शायद मन में यह कहोगे कि आप
तो निजधाम जा रहे हैं, फिर मैं आपके बाद अक्षय सुख किससे माँगूँगा? लेकिन मेरी आज्ञा औरों की तरह नहीं
है। तुम निश्चित रूप से अक्षय सुख प्राप्त करोगे। मेरी आज्ञा के कारण ही आज ध्रुव अपने पद पर स्थिर है।
कलिकाल भी मेरी आज्ञा का वन्दन करता है। उसे कोई भी विकल नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण के मुख से ये शब्द
निकलने की ही देर थी कि तब तक बहेलिये के लिये एक बड़ा-सा विमान नीचे उतरा।
इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा।
त्रिः परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवं ययौ॥ ४०॥
देवता और दावन जिसकी निरन्तर पूजा करते हैं, जो चराचर व्यापक परमात्मा है; जो लीला से देह धारण
करता है, बड़े-बड़े योगी जिसे वंदन करते हैं; ऐसे अत्यन्त श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने जरा बहेलिये को आज्ञा की; तभी
कृष्ण की आज्ञा से जो देदीप्यमान विमान आया था उसे देखकर जरा के मन में अत्यन्त आनन्द हुआ और वह
श्रीकृष्ण को तीन प्रदक्षिणा कर तथा उसे नमस्कार कर विमान में चढ़ गया। इस प्रकार बहेलिया विमान में
बैठकर इन्द्र, चन्द्र आदि ग्रहों को पीछे छोड़ कृष्ण की कृपा से उससे भी ऊपर के स्वर्ग में, वहाँ अक्षय सुख में
पहुँचा। जिसने पूर्ण उपकार किया, उस पर उपकार ही करना चाहिये, यह सच्चे शान्ति ज्ञान का लक्षण श्रीकृष्ण ने
स्वयं आचरण करके दिखलाया। ब्रह्मज्ञान की बकवास करने वाले अनेक होते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण वैसे नहीं थे।
उन्होंने स्वयं वैसा आचरण कर बहेलिया का उद्धार किया। सारे कुल का संहार हो गया किन्तु श्रीकृष्ण ने मोह
नहीं किया और जिसने स्वयं बाण मारकर घायल किया था, उस बहेलिया को भी सुखी कर दिया। उधर
समुद्र के तट पर दारूक रथ आकर खड़ा था। उसे श्रीकृष्ण नहीं दिखायी दिया, इसलिये वह उसकी खोज में
निकल पड़ा।
दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्य ताम्।
वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ॥४१॥
कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिये दारुक का मन छटपटा रहा था। वह कृष्ण के पगचिह्नों को
देखते हुए आगे चलने लगा। तभी कृष्ण के गले की तुलसी माला की गन्ध उसे अपनी ओर आकर्षित करने
लगी। सुवास के ही आधार पर वह आगे बढ़ा, तभी उसे दिव्यप्रकाश दिखायी पड़ा।