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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 869 में से

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पृष्ठ 833

तीसवाँ अध्याय ८१७
ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृताः ।
जघ्नुर्द्विषस्तैः कृष्णेन वार्यमाणास्तुतं च ते ॥ २१ ॥
यादवों ने पटेर हाथ में लेते ही वे वज्र की दहकने लगे। फिर अत्यन्त प्रखर होकर उन्होंने 'परिधि' की
आकृति धारण कर ली। फिर वे उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। पहले अन्य शस्त्रों का उन पर कोई प्रभाव नहीं
होता था लेकिन पटेर की मार से वे तत्काल मर जाते थे। उस पटेर की मार के आगे यादवों की चल नहीं पा रही थी
और वे एक-दूसरे का शिरच्छेद कर गिराने लगे। रण में शेष यादवों को मारने के बाद जो महावीर यादव थे वही
बच गये। ये यादव हाथी की तरह उन्मत्त थे और किसी के वश में आने लायक नहीं थे, इसलिये उनका निश्चित
रूप से निर्दलन करने के लिये श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा पूरी करने की दृष्टि से दौड़ कर गये। उसने उनसे कहा, यह पटेर
ब्रह्मशाप से उत्पन्न हुआ है, उसे हाथ भी मत लगाइये, युद्ध की इच्छा छोड़िये, मेरी बात मानिये। इस प्रकार धर्मनीति
सुनाकर श्रीकृष्ण उनका निवारण करने लगा लेकिन शेष बचे हुए यादव उसे मारने के लिये उसकी ओर दौड़ पड़े।
यह सब कृष्ण की माया की ही लीला थी। उन्हें अचूक मृत्यु प्राप्त हुई। किसी ने कहा, पहले इस कृष्ण की ही
पिटाई करें, यह हमें ठगने आया है, कहकर वे हाथ में पटेर लेकर दौड़े। किसी ने कहा, देखते क्या हो, उसका झोंटा
पकड़ो, उससे इतना डरते क्यों हो ? किसी ने कहा, श्रीकृष्ण को मैं एक ही झटके में गिरा दूँगा।
प्रत्यनीकं मन्यमाना बलभद्रं च मोहिताः ।
हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिनः ॥ २२ ॥
किसी ने कहा, अरे उसे देखो ! उधर बलराम खड़ा हे वही हमारा मुख्य शत्रु है। पहले इसे ही मारें और
इस प्रकार यादवों का एक झुण्ड उस पर चढ़ गया। उन दुष्टों में अत्यन्त तेज नशा चढ़ने के कारण वे वज्र सरीखा
पटेर हाथ में लेकर बलराम पर चढ़ गये। तब उसका रक्त भी उबलने लगा।
अथ तावपि संक्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन ।
एरकामुष्टिपरिधौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि ॥ २३ ॥
शुक्राचार्य परीक्षित से बोले, यादवों पर मृत्यु ने अधिकार जमाया, इसलिये वे आततायी लोग रामकृष्ण को
ही मारने के लिये उद्यत हो उठे। वे हमें ही मारने आये हैं यह देख उन्हें भी क्रोध आ गया और वे भी युद्ध करने
लगे। उन्होंने भी वह दहकता हुआ परिधि हाथ में लेकर यादवों को अपना पराक्रम दिखाया। रामकृष्ण का
विनाश करने के लिये सभी जातियों और सभी गोत्र के लोग उन दोनों पर टूट पड़े। तब कृष्ण कालशक्ति से क्षुब्ध
हो गया। अपने सारे कुल का संहार हुआ देख श्रीकृष्ण को अपने कर्तव्य पूर्ण होने का विश्वास हुआ।
ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम् ।
स्पर्धाक्रोधःक्षयं वैणवोऽग्निर्यथा वनम् ॥ २४ ॥
प्रारब्ध के अनुसार वे ब्रह्मशाप से ठगे गये। कृष्ण की माया से उनकी बुद्धि का भ्रंश हो गया। मद्यपान के
उन्माद और क्रोध से उनका क्षय हुआ। बाँस के द्वीप में बाँस ही एक-दूसरे पर रगड़ कर आग की चिनगारी
निकलती है जिससे पूरा जंगल जलकर खाक हो जाता है, उसी प्रकार यादवकुल का विनाश हो गया।
एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः ।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषितः ॥ २५ ॥