श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 835, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसवाँ अध्याय ८१९
विभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः॥ २८॥
वह अन्तिम ध्यान पाँच श्लोकों में निरुपित है। ध्यान देकर सुनने वाला श्रोता था परीक्षित और वक्ता था
ज्ञानमूर्ति श्रीशुक योगीन्द्र। उस समय पीपल के वृक्ष के नीचे बैठी हुई वह मूर्ति अत्यन्त तेजःपुंज तथा देदीप्यमान
थी और उससे दसों दिशाएँ प्रकाशित थीं। न धुआँ, न कोयला और जिसका रंग भी लाल न हो, ऐसी अग्नि की
ज्वाला की तरह श्रीकृष्ण के शरीर की कांति सतेज और प्रखर दिखायी दे रही थी। कृष्णमूर्ति की प्रभा से सूर्य
और चन्द्रमा का तेज भी फीका पड़ गया। शून्य के कारण आकाश के लिये भी स्थान नहीं बचा क्योंकि
सच्चिदानंद का पूरा स्वरूप ही साकार हो गया था। वह मूर्ति चैतन्य तेज और शान्ति रस से ढली हुई थी तथा
चतुर्भुज स्वरूप में व्यक्त हुई थी। इससे सभी दिशाओं से कालिमा दूर हो गयी।
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम्।
कौशेयाम्बरयुग्मेन परवीतं सुमङ्गलम्॥ २९॥
सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम्।
पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३०॥
श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वच्छ और स्वयंभू, उसके प्रत्येक अवयव में आकाश प्रतिबिम्बित है; जिससे उसकी
नीलमेघ जैसी कांति अत्यन्त तेजःपुंज और सुन्दर दिखायी देने लगी है। श्रीकृष्ण पहले ही मनोहर हैं, तिस पर
मेघ श्याम वर्ण और भी खिल उठा है। उसके कारण उसे विशेष सौन्दर्य प्राप्त हो गया था और इसीलिये स्त्री-
पुरुषों का ध्यान उसमें लगा रहता था। बेचारे साधारण स्त्री-पुरुषों की कथा का क्या वर्णन किया जाय? परमार्थ
के मार्ग पर लगे हुए विरक्त संन्यासी भी उस पर मोहित हो उठते थे। कृष्ण की मूर्ति देखकर वे पागल हो जाते
थे। श्रीकृष्ण का दर्शन होते ही शिवा को उसका नित्य ही ध्यास लगा रहता था। पार्वती ने भी अपना मन कृष्ण
को ही अर्पण कर दिया था। इस प्रकार मूल से ही अप्रतिम सौन्दर्य, उसमें सुहास्य वदन और कमल जैसे रक्तिम
वर्ण के आकर्ण सुशोभित आँखें। मस्तक पर काले केश और उसमें सुन्दर और सुवासिक फूल गुँथे हुए; और उस
पर कृष्णरूप अर्थात् काले भ्रमर उन काले बालों में लुब्ध होकर बैठे हुए। कान में मकराकार कुण्डल थे, ऐसी
छवि का वर्णन कवि करते हैं; लेकिन वह साकार में भी निर्विकार ही थे क्योंकि उस श्रवण से विकार नष्ट होते
हैं। कृष्ण श्रवण प्राप्त होने पर आकार और विकार का विलयन ही होता है। उस कृष्ण के श्रवण में वे पूर्ण
देदीप्यमान कुंडल थे। तप्तसुवर्णकांति दो पीताम्बर शोभायमान थे; एक परिधान किया हुआ और दूसरा प्रावरण
के रूप में ओढ़ा हुआ। ब्राह्मण को ही देवता मानने वाला श्रीकृष्ण लक्ष्मी को भी एक ओर रखकर दाहिनी ओर
ब्राह्मण के चरण श्रीवत्सलांछन को सुशोभित करता था।
कटिसूत्रब्रह्मसूत्र किरीटकटकाङ्गदैः।
हरिनूपुरमुद्राभिः कौस्तुभेन विराजितम्॥ ३१॥
वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधैः।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम्॥ ३२॥
गले में चमकने वाला कौस्तुभमणि, कमरे में सुशोभित रत्नजड़ित मेखला; गले में लटकने वाला यज्ञोपवीत