श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 838, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें८२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मातृघात भी किया। श्रीकृष्ण ब्रह्मवेत्ता होने के कारण ब्राह्मण हैं, अतः मैंने ब्रह्मवध भी किया। इस अपराध से
बड़ा दूसरा कोई अपराध संसार में नहीं है। राजघात, आत्मघात, मातृघात, पितृघात, ब्रह्मघात ये सारे ही घात
श्रीकृष्ण को बाण से विद्ध करने के कारण मेरे हाथ से हुए।
तन्माऽऽशुजहिवैकुण्ठपाप्मानं मृगलब्धकम्।
यथा पुनरहं त्वेवं न कुर्यां सदतिक्रमम्॥३७॥
हे श्रीकृष्ण! ऐसे मुझ सरीखे पापात्मा को आप क्षमा करें। इस पाप का क्षालन हो सके ऐसा कोई उपाय
तत्काल बताइये तुम्हारे केवल कृपा करने से इस पाप का दोष दूर नहीं होगा अतः जब तुम मेरा वध करोगे तभी मैं
शुद्ध हो सकूँगा। मैं बहेलिया, मूल से ही पापबुद्धि हूँ; मृग का लोभी होने के कारण पशुओं का शिकार करता हूँ;
तुम अपने हाथ से मुझे मारो, तभी मेरा उद्धार होगा। हे पुरुषोत्तम ! जिस देह से मैंने पापकर्म किया, उस देह का ही
तुम नाश करो ताकि भविष्य में उसके हाथ से कोई ऐसा असत्कर्म या अधर्म न हो। तुम्हारे पैर में बाण मारकर,
इस देह से बहुत बड़ा पाप हुआ है। इसलिये हे श्रीकृष्ण ! इस देह का ही तुम वध कर दो, तभी उस महापाप की
निष्कृति होगी। जिस देह ने पापाचरण किया उसका सच्चा प्रायश्चित्त यही है कि तुम अपने हाथ से उसे भिक्षा दो
और यह कहकर उसने उनके पैर कसकर पकड़ लिये। देह ने यह पापाचरण किया है, और देह का लोभी पूरी
तरह पापी है। इसलिये तुम स्थूल, लिंग और कारण इन तीनों देहों का अपने तेजस्वी चक्र से छेदन करो।
यस्यानयोगाचरितं न विदुर्विरिञ्चो रुद्रादयोऽस्य तनयाः पतयो गिरां ये।
त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदञ्जः किं तस्य ते वयमसद्गतयो गृणीमः ॥ ३८ ॥
देहोत्पत्ति का मूल स्थूल, सूक्ष्म और कारण है। किन्तु हे श्रीकृष्ण! इन तीनों प्राकृत देहों को स्पर्श किये बिना
तुम अप्राकृत चतुर्भुज देह धारण करते हो। स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों देहों को तथा प्रकृति के तीनों गुणों
को स्पर्श किये बिना तुम अपनी योगमाया के सामर्थ्य से नानाप्रकार के अवतार देह धारण करते हो। तुम्हारे लीला
देह विचित्र हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह होते समय तुम्हें जरा भी संकोच नहीं होता। तुम्हें जन्मों का भय ही नहीं है।
जहाँ एक जन्म प्राप्त होने में ब्रह्मदेव आदि बिलकुल दीन हो जाते हैं वहीं तुम आत्मसामर्थ्य से अनेक अवतार
अर्थात् जन्म धारण करते हो। प्रारब्ध के अनुसार देह को नाना प्रकार के भोग भोगने पड़ते हैं, लेकिन तुम श्रीकृष्ण !
प्रारब्ध के बिना ही नाना प्रकार की भोग सम्पत्ति का उपभोग करते हो। जब तक आयु है, तब तक देहधारण है,
यह वेदों ने निश्चित कर रखा है, लेकिन तुम्हारी लीला विचित्र है। तुम आयु के बिना ही देह धारण करते हो।
काल की सत्ता परम असाध्य है। ब्रह्मदेवादि देवताओं को भी मृत्यु से छुटकारा नहीं मिलता। लेकिन तुम काल और
समय न होते हुए भी स्वेच्छा से मरण का वरण करते हो। तुम्हारा योगमाया का जो योगमार्ग है, और लीला के
कारण देह की जो स्थिति है, वह सबकी समझ के बाहर है। उसका भी कारण सुनो। ब्रह्मदेव संसार का आदिकर्ता
है, लेकिन उसे भी तुम्हारी सत्ता समझ में नहीं आती। तुम नाना अवतारों के देह धारण करते हो। उन देहों का कर्त्ता
ब्रह्मदेव नहीं है। तुम अपनी लीला से किस प्रकार देह धारण करते हो? अवतार चरित्र कैसे निभाते हो? और उस
दिव्य देह का किस तरह त्याग करते हो? यह ब्रह्मदेवादि देवताओं की भी समझ में नहीं आता। जिसे तुम अत्यन्त
पूज्य मानकर सम्मान प्रदान करते हो उस त्रिकालदर्शी सदाशिव को भी तुम्हारी करनी अतर्क्य है। सदाशिव की
विनती से तुम दूसरी बार मोहिनी बने लेकिन यह बात शिवा को नहीं मालूम हुई। वह तत्काल उस पर मोहित हो
गया। योग और ज्ञान में पारंगत ब्रह्मज्ञानी सनकादिक जो माया का परदा दूर कर आत्मस्वरूप में निश्चिंत रहते हैं,