श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
८०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीशुक उवाच
स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः।
शिरो निधायाशुकलाभिरार्द्रधीर्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५ ॥
जो निजमुक्ति के कारण नित्य निष्काम है; जिसने परब्रह्म का अनुभव लिया है; उस श्रीशुक्राचार्य को उद्धव
का प्रेम वर्णन करने में अत्यन्त उल्हास प्राप्त हुआ। उसने कहा, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने इस प्रकार उद्धव को
आज्ञा की; उसका प्रेम अद्भुत था, उसका वर्णन में कर रहा हूँ, सुनो। उद्धव भले ही गुणातीत हो गया हो लेकिन
उसे गुरुचरण से विलक्षण प्रेम था। उसका सद्गुरु श्रीकृष्णनाथ तो साक्षात परब्रह्म ही था। वह हरि के चरण
छोड़ना नहीं चाहता था, हरि के प्रति उसकी पूर्ण श्रद्धा थी, इसलिये उस ज्ञानसम्पन्न उद्धव को 'हरिमेधा' कहा
गया है। जो अपनी इच्छा से हरि का ध्यान करता है, उसके ध्यान के साथ उसका मन भी हरि हरण करता है; जो
हरि के समाधान का विचार करता है, उसकी बुद्धि का हरि हरण करता है। जो हरि का चिन्तन करता है, उसके
चित्त का हरि हरण करता है; जो हरि का स्मरण करता है उसका सारा संसार ही हरि हरण करता है। उस हरि के
प्रति मुक्तिपद पर पहुँचे उद्धव की सप्रेम श्रद्धा थी इसलिये उसे 'हरिमेधा' कहते थे। जो गुणातीत पद पर पहुँच
गये उन्हें भी जिसकी भक्ति प्रिय थी, उस श्रीकृष्ण ने उद्धव का जाना निश्चित किया। किन्तु बदरिकाश्रम दूर का
पल्ला था। एक बार वहाँ जाने के बाद उससे पुनः भेंट नहीं होगी इस विचार से उसका मन व्याकुल हो उठा।
यद्यपि वह सुख-दुःख से मुक्त हो चुका था, फिर भी प्रयाणकाल में उसने व्याकुल मन से श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा
की। चरणों पर मस्तक रखते समय उसकी आँखों से प्रेमाश्रु की धारा फूट पड़ी। उस धारा से श्रीकृष्ण के चरण
धुल गये।
सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुरः ।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके विभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥ ४६ ॥
अन्य लोगों का स्नेह बाधक रहता है, किन्तु वेदांत विचार उनसे साधकों को छुड़ाता है; लेकिन श्रीकृष्ण
का स्नेह वैसा नहीं है। वह सुखदायक और प्रिय रहता है। उद्धव के लिये स्वाभाविक तौर पर गुरु और परब्रह्म
दोनों एक ही थे और लोगों को दोनों में 'ऐक्य' भावना करनी होती है; लेकिन उद्धव के लिये वह स्वतःसिद्ध
था। इस प्रकार का यह स्नेह उद्धव के लिये अत्यन्त सुखदायी था। इसलिये श्रीकृष्ण को छोड़ते समय गुरुप्रेम
के कारण वह भी व्याकुल हो उठा। स्नेह, द्वेष अथवा विषय कामना से जो भी कोई श्रीकृष्ण पर लुब्ध हुआ,
उन्हें परमानन्द ही प्राप्त हुआ। ऐसे श्रीकृष्ण को कौन छोड़ना चाहेगा? अविधि से श्रीकृष्ण से रत हुए लोग भी
जब ब्रह्मादि देवताओं के लिये वंदनीय हो गये तो फिर उद्धव तो गुरुप्रेम पर न्योछावर ही था, वह श्रीकृष्ण को
कैसे छोड़ेगा ? जिसे गुरुभक्ति परब्रह्मतुल्य लगती है, उसके लिये जीवन्मुक्ति तृणप्राय है; मिली हुई मुक्ति का भी
वे त्याग कर देते हैं और अनन्यभाव से गुरुभक्ति की शरण में चले जाते हैं। सद्गुरु की आज्ञा का उल्लंघन न
किया जाय इसलिये बदरिकाश्रम जाना चाहिये यह बात सच है; किन्तु श्रीकृष्ण का प्रेम अत्यन्त मधुर है वह
उसे जाने से रोक रहा था। इस प्रकार उद्धव दोतर्फा संकट में पड़ गया। श्रीकृष्ण के प्रेम से उसका पेट फटने
लगा; उसे बदरिकाश्रम का मार्ग ही नहीं दीख रहा था। श्रीकृष्ण को यदि छोड़ दें तो वह निजधाम चला
जाएगा, मुझे पुनः दिखायी नहीं देगा; इसलिये उसका गला रुंध गया। जल से भरे नूतन मेघ की तरह श्यामवर्ण,
कमलनयन आनन्दमूर्ति श्रीकृष्ण पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म है। मुकुट, कुण्डल, कमरबंद, पीले रंग का टीका धारण
उनतीसवाँ अध्याय ८०३
किया हुआ, गले में एक लड़ी का पदक और कंठ में कौस्तुभमणि। पैरों में पैंजनी की रुनझुन, बाहों में बाजुबंद
और कटि पर शोभा देने वाला पीत रंग का पीताम्बर, पैरों तक लटकी हुई वनमाला ऐसा अत्यन्त सुन्दर
घनश्याम देखकर मन तृप्त हो जाता था। श्रीकृष्ण का ऐसा दर्शन पुनः प्राप्त नहीं होगा इसलिये उद्धव प्रेमविह्वल
हो उठा। उद्धव पूर्णब्रह्म हो चुका था। उसे सगुण की इतनी चाह कैसे हो गयी? क्योंकि कृष्णप्रभा से प्रकाशित
होने वाली चिद्धन आत्मवस्तु श्रीकृष्ण ही था। घी जमा हुआ हो या पतला हो, लेकिन वह घी के गुण से वंचित
नहीं होता; उसी प्रकार सगुणानर्गुणत्त्व के साँचे में ढली हुई परब्रह्म की मूर्ति साक्षात् श्रीकृष्ण ही थे। सगुण रूप
त्याज्य है और निर्गुण रूप पूज्य है यह विचार भी आज की स्थिति का है। जो तृण-पाषाण को भी ब्रह्मरूप
मानता है, वह सगुण रूप का कभी भी तिरस्कार नहीं करेगा। इस प्रकार उद्धव को सगुण के लिये सगुण और
निर्गुण ये दोनों ही रूप समान थे किन्तु गुरु की दृष्टि से श्रीकृष्ण पर उसका अत्यन्त प्रेम था। इसलिये उसे
छोड़कर जाने में उद्धव अत्यन्त विह्वल हो उठा। किन्तु आज्ञा का उल्लंघन करना नहीं चाहता था, इसलिये
बदरिकाश्रम जाने के लिये उद्यत हुआ तो श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने में अत्यन्त कष्ट हुआ। जाने से पहले वह
श्रीकृष्ण के चरणों पर लोट गया। पैरों को आलिंगन में बाँधकर उसे हृदय से कसकर बाँध लिया लेकिन वहाँ
से निकल कर जाने का साहस नहीं हुआ। यदि मैं यहाँ से चला गया तो पुनः श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं होंगे। इस
विचार से उसकी अवस्था अत्यन्त कठिन हो गयी और उसके पैर ठिठक कर वहीं रह गये। कृष्ण के चरणामृत
से ही मैं तृप्त हो गया हूँ। मुझे अब महातीर्थों की आवश्यकता नहीं है। ऐसा होते हुए भी मेरा प्रारब्ध मुझे
श्रीकृष्ण का वियोग करा रहा है। इतना कहकर वह थर-थर काँपने लगा; उसका गला रुंध गया, आँखों में
आँसू भर आये और वह बार-बार सुबकने लगा। वह रोमांचित होकर पसीने से तर हो गया। वह जाने के लिये
बिलकुल तैयार हो गया; श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरता, फिर वहाँ से चला जाता और पुनः आकर चरणों पर
लोट जाता। उद्धव का वह श्रद्धा भाव देखकर श्रीकृष्ण परमानंद से सन्तुष्ट हो गये। वे मन ही मन बोले, मेरे
प्रति इसका अत्यन्त स्नेह है; और गुरुत्व भावना से तो वह अनन्य हो गया है। श्रीकृष्ण को उस पर दया आयी
और उसने अपने चरणों की पादुकाएँ उद्धव को सौंप दीं। उसने उन्हें अपने मस्तक से लगाया। उसे मस्तक से
लगाते ही उद्धव भूल गया कि मैं कृष्ण से दूर जा रहा हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उसे उपदेश दिया। वे पादुकाएँ
मस्तक पर रखते ही उसकी व्याकुलता अपने आप शान्त हो गयी और वह श्रीकृष्ण को नमस्कार कर उनसे
आज्ञा लेकर जाने के लिये निकला। त्रिवार प्रदक्षिणा कर उसने श्रीकृष्ण का मुखावलोकन किया; उसके चरणों
को नमस्कार किया और उसकी आज्ञा से चला गया। अब तृतीय स्कंध की कथा सुनें—उद्धव को विदुर का
दर्शन हुआ, दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन देकर कुशल क्षेम पूछा। तब कृष्ण के निधन की वार्ता सुनाते
समय उद्धव की चर्या पर दुःख की हलकी सी छटा भी नहीं दिखायी दी। इससे विदुर ने भाँप लिया कि इसे
ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ है। मरता गुरु हो और रोता हुआ चेला हो तो समझ लो कि ज्ञान व्यर्थ गया। इस पार
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण प्रसन्न हुआ, इसलिये इसकी मोह ममता वाली वृत्ति समाप्त हो गयी, इसलिये यह परमानंद में
निमग्न होकर आत्मस्वरूप में झूम रहा है। शब्दों को स्पर्श किये बिना ही वह बोल रहा है, पृथ्वी का स्पर्श
किये बिना ही यह सहज रूप से चल रहा है, नामरूप में रहकर भी नामरूप को स्पर्श नहीं करता; जिह्वा के
बिना ही रसास्वादन करता है; नेत्रों के बिना ही देखता रहता है; इन्द्रियों के बिना ही निर्मल सुख का
निजात्मतृप्ति से भोग कर रहा है। निर्विकल्प आत्मज्ञान; तिसपर भक्ति, ज्ञान, वैराग्य! उद्धव की ऐसी स्थिति
देखकर विदुर के मन को अत्यन्त संतोष हुआ। फिर उसने उद्धव से विनती की कि हे भगवन्! श्रीकृष्ण तुझ
andवारिधि? Wait, let's look: कारुण्यthen space, thenवारिधिwith a visarga or danda? Let's look at the end of line 7: कारुण्य वारिधिfollowed by।(single danda). Wait, is there a visarga afterवारिधि? Look at वारिधि: there seems to be a visarga : or just danda? Wait, it looks likeवारिधिः।orवारिधि ।? Wait, let's look closely at वारिधि: वा रि धि ।. There is a single danda ।`.
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Is itसंबंध श्लोक?
Wait, if the verse is:
क्वाहं कीटकवत्तुच्छः क्व च कारुण्यवारिधिः ।
तेनाहं स्मारितोऽस्म्यथ मुमुर्षुः केशवं यथा ॥ १ ॥
Wait, is this verse composed by Eknath himself, or from somewhere?
Eknath often wrote Sanskrit summary verses or connecting verses in his Bhagavata!
And what does the text before it say?
Let's look at the label:
Is it `
उनतीसवाँ अध्याय ८०५
पहुँचा और उसे प्रदक्षिणा कर उसके चरणों के पास बैठ गया और मैत्रेय का ज्ञान सुनकर और कृष्ण का निर्वाण
देखकर उद्धव वहाँ से चला गया। हे परीक्षित! वह वृत्तांत सुनो।
ततस्तमन्तर्हृदि संनिवेश्य गतो महाभागवतो विशालाम्।
यथोपदिष्टं जगदेकबन्धुना तपः समास्थाय हरेरगाद् गतिम्॥४७॥
जो संसार का विश्रामस्थल है; जो पुरुषों में पुरुषोत्तम है; उस आत्माराम को हृदय में धारण कर उद्धव प्रेम
से चला गया। कृष्ण की पूर्ण स्थिति को निश्चयपूर्वक हृदय में धारण कर उद्धव स्वानंद स्थिति में विशाल तीर्थ
के लिये चल पड़ा। उद्धव स्वानंद की स्थिति में पहुँच गया था इसलिये वह जहाँ जाता था वहाँ के लोग भक्ति,
ज्ञान और वैराग्य से पावन हो जाते थे। जैसी भी विवेकशक्ति और विरक्ति दिखायी देती, उसी के अनुसार
बोधकशक्ति से ज्ञान और भक्ति का उपदेश करते हुए वह त्रिभुवन का उद्धार करता चला गया। जिनकी उद्धव से
भेंट होती, उनका हरिभजन में मिलना होता, संसार का भय वह उनकी दृष्टि में लाता ही नहीं था, इतना वह श्रेष्ठ
उपदेशक था। भगवद्भक्ति जो भी करते हैं उन्हें 'भागवत' कहते हैं; उद्धव मुक्ति प्राप्त करके भी भजन करता
था, इसलिये वह 'महाभागवत' है। उद्धव ने जिस भक्ति को स्वीकार किया था, उसकी तो नित्यमुक्ति दासी थी;
इसलिये उद्धव की स्थिति को महाभागवत स्थिति कहना चाहिये। अत्यन्त निर्मल शान्ति और अत्यन्त प्रांजल
आत्मानुभव, और मोक्ष के बाद भी भजनशीलता, ऐसा उद्धव अत्यन्त श्रेष्ठ भक्त था। ऐसी विशालता होते हुए भी
वह 'विशाल' तीर्थ पहुँचा। अब उस तीर्थ को विशाल क्यों कहते हैं, उसकी भी कथा सुनाता हूँ। जहाँ केवल
श्रद्धा से ही चित्त की शुद्धि होती है, श्रवण मात्र से ही बुद्धि निर्विकल्प होती है और 'नारायण' नाम से मोक्षसिद्धि
होती है; अतः बदरिकाश्रम को विशाल कहते हैं। वहाँ लोककल्याण के लिये नारायण आज भी अनुष्ठान कर रहे
हैं। मोक्षमार्ग पर लगने वाले पर उसकी पूर्ण कृपा होती है। इस प्रकार बदरिकाश्रम को 'विशालत्व' प्राप्त हुआ
है। जहाँ अल्प तप से ही बड़ा फल प्राप्त होता है, अल्प ध्यान से परिपूर्ण ज्ञान होता है, अल्प विरक्ति से ही मोक्ष
प्राप्त होता है; ऐसा बदरिकाश्रम विशाल रूप से फलप्रद होता रहता है। जो अन्तर्यामी गोविन्द, जो संसार का
सुहृद और बन्धु है, उसी प्रकार जो प्रसिद्ध आत्माराम है, जिससे उद्धव को आत्मज्ञान हुआ उस श्रीकृष्ण ने जैसा
उपदेश किया था, उसी के अनुसार उद्धव वहाँ रहा। इससे लोगों को परमार्थ निष्ठा पर विश्वास हुआ। उद्धव की
स्थिति, उसकी ज्ञानभक्ति, उसकी विरक्ति लोगों के लिये उपदेशस्वरूप हो गयी। गुरु ही जहाँ विषयासक्त होता है
वहाँ शिष्य को विरक्ति कैसे आयेगी? गुरु की प्रवृत्ति ही जहाँ अधर्म की हो वहाँ शिष्य को निवृत्ति कभी नहीं
होगी। इसलिये उद्धव जैसा आचरण कर रहा था, उसी प्रकार सभी लोग आचरण करने लगे। इस प्रकार उद्धव
बदरिकाश्रम में विरक्त होकर रहा। कृष्ण उसे जिस प्रकार पढ़ा कर गया था, उसी के अनुसार वह व्यवहार करने
लगा। उसके धर्म से सारे लोग परमार्थी और विरक्त बन गये। परब्रह्म की सच्ची प्राप्ति कराकर श्रीकृष्ण निजधाम
चले गये थे। वही ब्रह्मस्थिति उद्धव में रात-दिन विद्यमान थी। आसन लगाकर बैठने या जाने पर भी उसका
ब्रह्मत्व टूटता नहीं था। विरक्ति और भोगासक्ति ये दोनों ही शरीर पर दिखायी देती हैं, किन्तु उद्धव की ब्रह्मस्वरूप
स्थिति इन दोनों से परे थी। वह विरक्ति में होते हुए भी विरक्त नहीं था और भोग में रहते हुए भी भोगासक्त नहीं
था; इन दोनों से परे वह सदा ब्रह्मस्वरूप ही था। उसी में प्रारब्ध क्षय से देह की मृत्यु होने पर भी उद्धव ब्रह्म में
पूर्ण ब्रह्म ही होकर रहा था। जन्म और मरण वह जानता ही नहीं था। श्रीकृष्ण ने उद्धव के देह की देहबुद्धि पूरी
तरह नष्ट करके उसे निःसन्देह ब्रह्मस्वरूप का अनुभव दृढ़ कर दिया था। हे परीक्षित! ऐसे उद्धव को देह के
८०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अन्त में विदेह कैवल्य की प्राप्ति हुई यह कहना वक्ता का भ्रम है। सोने का कंगन बनाओ या उसे तोड़ो लेकिन
यह सब सोने को नहीं मालूम होता, उसी प्रकार जन्म और मरण केवल देह के ही लिये है। उद्धव परिपूर्ण
परब्रह्म था। देह में रहते हुए भी वह नित्यमुक्त विदेही ही था। उसे देह के अन्त में विदेह मोक्षप्राप्ति हुई, यह
कहना भी केवल लौकिकता है। देह जाये या रहे, उस सम्बन्ध में ज्ञाताओं को कोई दुःख नहीं होता। उनकी
ब्रह्मभावना अखण्ड और अनस्यूत रहती है। देह को दैव चलाता है और मरण भी दैव ही लाता है। ज्ञाता ब्रह्म में
ही पूर्णब्रह्म होकर रहने के कारण, जन्म और मरण उसे मालूम नहीं होता। देह रहे या जाये, मैं परब्रह्म ही हूँ।
जिस प्रकार डोर में साँप का मिथ्यापन डोर के ही कारण मिथ्या होता है। जहाँ का मृगजल घट गया वहाँ की
भूमि सूख गयी, ऐसा यदि कहें तो क्या जहाँ जल भरा रहता है वहाँ की भूमि गीली रहती है ? उसी प्रकार देह
की वर्तमान स्थिति समूल मिथ्या है ऐसा प्रतीत होता है तो उस देह का अन्त होने पर विदेह कैवल्य की प्राप्ति
हो, ऐसा नहीं होता। इस प्रकार बदरिकाश्रम में अनेक दिन रहने के बाद उसी निजदेह के अन्त में वह भगवद्गति
को प्राप्त हो गया। यह कहना भी केवल लौकिक दृष्टि से ही है। वह प्रारम्भ से अन्त तक परब्रह्मस्वरूप ही था,
वह अपने स्वाभाविक स्वरूप से मिल गया। उद्धव की भगवद्भक्ति और अंतकाल की उसकी स्थिति का विचार
कर शुक्राचार्य को अत्यन्त आनन्द हुआ और वे कृष्ण कृपा का वर्णन करने लगे।
य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्।
कृष्णेन योगेश्वरसेविताङ्घ्रिणा सच्छ्रद्धयाऽऽसेव्य जगद् विमुच्यते ॥ ४८ ॥
जो योगेश्वर योगमार्ग से (अथवा ज्ञानमार्ग से) जीवन्मुक्ति तक पहुँचते हैं, वे भी कृष्ण चरणों की सेवा
करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण की मूर्ति पूज्य है। उनके चरणों पर सनकादिक सरीखे संत तल्लीन रहते हैं, ब्रह्मदेव जैसे
देवता भी उनके आगे रंक की तरह प्रतीक्षारत रहते हैं। उस श्रीकृष्ण ने स्वानंद की स्थिति में अपनी भक्ति प्रकट
की। उद्धव पर उसकी अत्यन्त कृपा थी इसीलिये उसने अपने मुख से उसे सुनायी। भगवद्भक्ति यही एक
महासागर है; उसमें धैर्य मंदराचल है; और गुरु-शिष्य यही मंथन करने को तत्पर होने वाले सुर और असुर हैं।
श्रद्धा और विश्वास ये मथनी को खम्भे से बाँधने वाली दो डोरियाँ हैं और बोध नामक मजबूत रस्सी से उन्होंने
मंथन करना शुरू किया। उसी मंथन में पहले 'अहं ज्ञाता' अर्थात मैं ज्ञानी नामक अहंकाररूपी हलाहल की
उत्पत्ति हुई। उसे विवेकरूपी शंकर ने कंठ में धारण कर, पुनः 'मैं' का अहंकार नहीं होगा इसलिये निगल
लिया। इस प्रकार अभिमानरहित होकर मंथन कर भक्तिसाररूपी अमृत निकाला ओर.उसे श्रीकृष्ण ने कृपा कर
उद्धव को अर्पण किया। धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति इन चार पुरुषार्थों से भी श्रेष्ठ भक्तिसारामृत उद्धव के हाथ में
दिया। निजबोध का पात्र निजानुभव से स्वच्छ धोकर उसमें यह सारामृत भरकर उद्धव को उसका प्राशन कराया।
उससे उद्धव तृप्त हुआ, त्रिविध तापों से मुक्त हुआ परमसुख से सुखी हुआ और ब्रह्मस्वरूप में परब्रह्म से ही
मिला। इस प्रकार उद्धव भक्तिसारामृत प्राशन कर परम सन्तुष्ट हुआ। श्रीकृष्ण निजभक्तों पर इस प्रकार कृपा
करता था। कृष्ण और उद्धव का यह पूरा संवाद अर्थात भक्तिसारामृत रूपी गुह्यज्ञान, इसका जो श्रवण, मनन और
अनवरत चिन्तन से सेवन करेगा, उसके भय से संसारबंधन दूर भाग जायेगा। स्वप्न में भी उसे जन्म-मरण का
दर्शन नहीं होगा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसकी संगति में रहकर जो इस कथा की भक्ति में रंग
जायेंगे उन्हें भी, हे परीक्षित् ! संसार बंधन की कल्पांत में भी बाधा नहीं होती। जिसकी इस कथा पर पूर्ण श्रद्धा
होगी, जिसे इस कथा की लगन होगी, जो इस कथा का अनुष्ठान करेगा वह सारे संसार का उद्धार करने वाला
उनतीसवाँ अध्याय ८०७
होगा। जो सूर्य के घर में रहता है, उसके लिये अन्धकार का अस्तित्व ही नहीं होता और जो उसके ही गाँव में
जाकर रहेगा वह भी रात्रि से वंचित रहेगा। जब सूर्य के लिये रात्रि नहीं है तो फिर दिन का उदय कैसे होगा ?
उसी प्रकार स्वरूप के पास बन्धन और मोक्ष अत्यन्त मिथ्या हैं। उसी प्रकार यदि इस कथा का अनुसंधान नहीं हो
पाया, केवल श्रवण ही सम्भव हुआ तो उसे भी संसार बंधन की बाधा नहीं होगी। खैर, उसे भी छोड़ो। जिससे
इस कथा का श्रवण भी नहीं हुआ, लेकिन यदि उसने प्रेम से उसका पठन किया तो भी प्रत्येक श्लोक के साथ
उसके दुःख और दोष का भस्म हो जायेगा। जिससे श्रवण पठन का प्रयास सम्भव न हो, वह यदि इस ग्रन्थ के
निरूपण की बातें गाँठ में बाँध लेता है तो वह भी संसार में देवताओं को वंद्य होगा। अधिक क्या कहें ? जिसे इस
कथा से प्रेम होगा, जिसे इस कथा से भक्ति होगी, उसकी संगत जिन्हें अच्छी लगेगी, उन्हें भी यम और काल
वन्दन करेंगे। इस कथा के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखकर जो इसका सेवन करता है, जो श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण और
मनन करता है, उससे दूर श्रीकृष्ण कभी नहीं जाते। भोली-भाली कथाएँ सुनकर जिसकी इस कथा पर श्रद्धा
होती है, उसके हृदय में श्रीकृष्ण प्रकट होकर वे धीरे-धीरे संसारपाश तोड़ देते हैं। इस प्रकार श्रद्धालुओं के प्रति
श्रीकृष्ण प्रभु दयालु है। इसीलिये श्री शुक्राचार्य उन्हें अत्यन्त श्रद्धा से नमन करते हैं।
भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं निगमकृतदुपजहे भृङ्गवद् वेदसारम्।
अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान् पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि॥ ४९॥
संसारभय से त्रस्त होकर जो श्रीकृष्ण की शरण में आये, उनका संसारभय दूर हो इसलिये श्रीकृष्ण ने
वेदार्थ का मंथन किया और उपनिषद्वार का भी मंथन कर यह ज्ञान-विज्ञान का रूप सार निकाला। बड़े-बड़े
ज्ञाता भी जिसके लिये थक गये वे भी उसका पार नहीं पा सके। तुम कहोगे कि निगमों का मंथन करने के कारण
वेदों को कष्ट हुआ होगा, किन्तु कृष्ण वेदों का आदिकर्ता होने के कारण उसने वेदों को जरा भी दुःख नहीं होने
दिया। जिस प्रकार बछड़ा जब स्वयं ही माँ का दूध पीने लगता है तब उसके पैर नहीं बाँधने पड़ते, उसी प्रकार
जब श्रीकृष्ण ही वेदों का मंथन करने लगे, तब वेदों को भी कोई व्यथा नहीं हुई। श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था; वेदार्थ का
सार निकालने में राजहंस था; उसने वेदों को दुःख दिये बिना वेद का सार निकाल लिया। इस प्रकार मथ कर
निकाला हुआ वेदार्थ का सार अथवा ज्ञान-विज्ञान सारामृत कृष्ण ने एकत्र कर कृपापूर्वक भक्तों के कल्याणार्थ
अर्पण किया। जिस प्रकार भ्रमर कमल को दुःख पहुँचाये बिना उसका मकरंद आहिस्ते से निकाल लेता है, उसी
प्रकार श्रीकृष्ण ने वेदों का मंथन कर यह शुद्ध सार निकाला है। इस प्रकार कृपालु और भक्तों के हितैषी श्रीकृष्ण
ने वेदसारामृत निकाल कर निर्भय होकर अपने भक्तों को दिया। इस प्रकार अपने सेवकों को पूर्ण वेदसारामृत
पिलाकर श्रीकृष्ण ने उनका जन्म-मरण और संसार का भय नष्ट कर दिया। माया संसार का मूल कारण है;
लेकिन श्रीकृष्ण माया का भी मूल कारण है। 'सच्चिदानन्दघन' नाम का जो स्वरूप है, वही 'श्रीकृष्ण' हैं। माया
के योग से मनुष्य वेष धारण करने वाला, पुरुषों में पुरुष श्रेष्ठ, पूर्णज्ञान के कारण ज्ञाननिष्ठ ऐसा जो श्रीकृष्ण है
वह समस्त वंद्य पुरुषों में अत्यन्त श्रेष्ठ है। उसे काया, वाचा, मन से सभी प्रकार से अनन्य शरण जाकर श्रीशुक
ने स्वयं ही श्रद्धापूर्वक नमस्कार किया। श्रीशुक ने नमन किया यह देखकर परीक्षित के मन में भी प्रेम उत्पन्न
हुआ और उसने भी कहा कि भक्त कृपालु केवल एक श्रीकृष्ण ही हैं। उद्धव ने परम निर्वाण प्राप्त किया यहाँ
ज्ञानकथा का निरूपण समाप्त हुआ। संसार में भगवद्भजन श्रेष्ठ है क्योंकि श्रीकृष्ण भक्त के अधीन रहता है।
भक्तों के मनोरथ श्रीकृष्ण पूरे करता है और अन्त में उसे अपना पद भी देता है। भक्तों पर उसकी इतनी अगाध
८०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कृपा रहती है। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर चले उस समय यदि उद्धव ने ये प्रश्न नहीं किये होते, तो श्रीकृष्ण ने
यह परमामृत का कथन नहीं किया होता। लेकिन उद्धव का संसार पर बहुत उपकार है क्योंकि उसी के कारण
श्रीकृष्ण ने भक्ति-ज्ञान-वैराग्य के सार का कथन किया। उद्धव के धर्म से सारा त्रिभुवन संसार समुद्र पार कर
लेगा। ऐसे गुप्त ज्ञान का श्रीकृष्ण ने भजन के साथ कथन किया। चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर उद्धव ने हरिभक्ति
की महिमा बढ़ायी। त्रैलोक्य को पार करने के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की। एकादश स्कंध के बहाने
भक्ति और मुक्ति का पौसरा बैठा दिया। जड़ जीवों के उद्धार के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की।
गाय के स्तन में दूध भरा होता है लेकिन वह बछड़े के बिना हाथ में नहीं आता उसी प्रकार श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान
उद्धव ने प्रकट किया। कृष्ण और उद्धव का यह संवाद वास्तव में गहन ज्ञान है। उसका व्याख्यान मैं अपूर्ण ज्ञानी
कैसे कर पाऊँगा ? कृष्ण और उद्धव का यह गहन ज्ञान लोगों तक पहुँचाने में सर्वज्ञ जनार्दन ही सहायक हुआ।
श्लोक के पदों के अर्थ की संगति, ज्ञान की परिपाक स्थिति, वैराग्ययुक्त भक्ति और मुक्ति इनकी व्युत्पत्ति मैं नहीं
जानता। मेरा 'मैं'पन भी जनार्दन ही बन गया। अतः इस पदार्थ का स्पष्टीकरण करने वाला वही एक है।
एकनाथ को एकपन की भावना से ऐक्यता सहज ही सम्भव हुई और 'एका-जनार्दन' इस नाम से यह ग्रन्थ
भगवान ने ही तैयार किया। अर्थ करते समय जनार्दन ही मेरी बुद्धि बन गया। उसी प्रकार कवित्वयुक्त पदबंध भी
वही बोला। मेरा नाम, रूप, कर्म, गुण आदि मिथ्या ही है; लेकिन वह भी जनार्दन ही बना। 'एकपन' उसे इतना
अधिक प्रिय है। नाम से तथा भाव से भी 'एक' होने के कारण जनार्दन प्रसन्न हुआ; उसने मेरे नाम की ही तरह
संसार में 'एकपन-ऐक्य' प्रकट किया। 'एका' इस नाम का जनार्दन को इतना अधिक कौतूहल है कि वह एक
में ही अनेक प्रकट करता है और अनेक में एक को अविकारी दिखा देता है। जिसका नाम भी एक है और भाव
भी एक है उसका भगवान से सदा ऐक्य रहता है। इसलिये आगे वह एक और अनेक देखने पर भी उसमें भिन्नता
नहीं रहती। यह एकत्व जब तक प्राप्त नहीं होता, तब तक भगवान को प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती और एकत्व के
बिना अकर्त्तात्मता भी नहीं मालूम होती। जब तक कर्तव्य का अभाव है, तब तक, भगवान कभी नहीं मिलेंगे।
अहंकार के ही पास बन्धन रहता है; उसे छोड़ते ही मुक्ति मिलती है। नामस्वरूप में ऐक्य देखना यही मेरा
अनुष्ठान है। इसीलिये जनार्दन सन्तुष्ट होकर वह मेरा 'मैं'पन बन गया है। कठपुतलियों के खेल में कुछ
पुतलियाँ नाराज होती हैं तो कुछ प्रसन्न दिखायी देती हैं, लेकिन वह सब खेल दिखलाने का कौशल होता है।
कठपुतली को उसका अर्थ मालूम नहीं होता। उसी प्रकार मेरे नाम से कविता लिखकर जनार्दन वक्ता बन गया
है। इसीलिये इस ग्रन्थ की कथा साधु-संतों को पसन्द है। ग्रन्थ लिखते समय यदि देह की अहंता विद्यमान हो तो
एक भी ओवी नहीं लिखी जाएगी। यहाँ जनार्दन ही कर्ता बन जाने के कारण इस ग्रन्थ का अर्थ ठीक-ठीक लग
सका। सज्जनों को चाहिये कि वे आत्मदृष्टि से ही इसकी ओर देखें। केवल संस्कृत वन्दनीय है और प्राकृत निंद्य
है, यह कहना क्या उचित है? यह भी अभिमान की ही बात है और अहंकार परमार्थ में बाधक है। जौहरी
मजदूर लगाकर खान खोदता है और उसमें उसे मूल्यवान रत्न मिलता है; लेकिन यदि वैसा ही रत्न उसे झाडू
लगाते समय कचरे में मिल जाए तो क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति उसे फेंक देगा ? उसी प्रकार संस्कृत पढ़ने के
प्रयास में परमार्थ साध्य नहीं होता और अगर देशी भाषा में वह चीज प्राप्त हो जाय तो ज्ञाता उस पर टूट पड़ेंगे।
चकोर चन्द्रामृत प्राशन करता है और वही कौवे को खाने के लाले पड़ जाते हैं, उसी प्रकार यह देशी भाषा का
ग्रन्थ है। उसका फलीभूत होना ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर है। भगवान को भाषा का अभिमान नहीं है, उसके
लिये संस्कृत और प्राकृत दोनों एक समान है। जिस भाषा में ब्रह्मज्ञान पढ़ा जाता है, उससे श्रीकृष्ण सन्तुष्ट रहता
उनतीसवाँ अध्याय ८०१
है। यदि सुवर्ण के फूल हों तो उसमें ताजा और बासी का प्रश्न नहीं उठता। उसी प्रकार संस्कृत और प्राकृत ये
दोनों भाषाएँ ब्रह्म कथन की दृष्टि से समान ही हैं। संस्कृत भाषा में निन्दा करने से क्या वह पवित्र हो जायेगी ?
या प्राकृत भाषा में हरिकथा करने से क्या वह व्यर्थ हो जायेगी ? नहीं, बिलकुल नहीं। भाषा का जितना भी
अभिमान करें, वह वक्ता के लिये बाधक ही होता है। जिस भाषा में ब्रह्म कथन किया जाता है वह भाषा हरि
चरणों में पवित्र ही होती है। श्री जनार्दन का यह कवितारूपी बागीचा है जिसमें ब्रह्मरस बह रहा है। इसका
माधुर्य संतजन जानते हैं। इसीलिये यह ग्रन्थ इस रूप में तैयार हुआ है। उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण ने स्वयं ब्रह्मज्ञान
दिया वह संसार बन्धन तोड़कर दीनजनों का उद्धार हो इसलिये वह एकादश स्कंध सरीखा ग्रन्थ जिसमें शुद्ध
परमार्थ भरा हुआ है और बड़े-बड़े कवि अपने स्वयं के लाभ के लिये उस पर टूट पड़ रहे हैं। पके हुए फल पर
जहाँ तोता चोंच मारता है, वहीं चींटी भी जा पहुँचती है। उसी प्रकार महाकवियों का पीछा करते-करते मैं भी
प्राकृत भाषा में अपने हित के लिये पहुँच गया हूँ। सार्वभौम राजा के थाली के पास बड़े-बड़े भी नहीं जा पाते
लेकिन मक्खी सहज ही जा पहुँचती है। उसी प्रकार हमें यह प्राकृत ग्रन्थ मिल गया है। पिता के साथ खाना खाते
समय बालक मीठा पकवान पहले खाता है, उसी प्रकार महाकवियों के अनुभव का परमार्थ प्राकृत के द्वारा मुझे
भी मिला। मुझे सद्गुरुचरण का लाभ हुआ, जिससे यह निरूपण चला। जनार्दन स्वामी अत्यन्त कृपालु हैं।
उन्होंने ही यह ग्रन्थ पूरा किया। आप कहेंगे अब परमार्थ समाप्त हुआ, इसके आगे महान अनर्थ है। लेकिन ऐसी
बात नहीं है। गुह्य-ज्ञान का अनुभव कैसा होता है यह श्रीकृष्ण स्वयं दिखला देंगे। माता, पिता, स्त्री, पुत्र तथा
अन्य लोग, जाति, गोत्र, सुहृद, सज्जन आदि के साथ सारे कुल की मृत्यु हो गयी फिर भी श्रीकृष्ण ने उनके प्रति
ममता नहीं रखी। श्रीकृष्ण की आज्ञा को काल भी स्वीकार करता है, इतनी सत्ता होते हुए भी श्रीकृष्ण ने कुल
का संरक्षण करने की ममता नहीं की। जो देह से अभिमानरहित है, जिसे कुल की ममता बाधक नहीं होती, वह
देह की अहंकारहीनता श्रीकृष्ण अब स्वयं दिखलाने वाले हैं। वह परिपक्व ज्ञान निर्वाण का अत्यन्त मधुर
निरूपण, अगले दो अध्यायों में श्री शुक्राचार्य स्वयं करेंगे। ज्ञान-रहस्य की वह निजकथा जनार्दन की कृपा से
एकाजनार्दन सुना रहा है। श्रोतागण कृपया मुझे अवधान दें क्योंकि जिस कथा की ओर संत अवधान देते हैं, वह
कथा परमार्थ में श्रेष्ठ बन जाती है। इसलिये एकाजनार्दन की प्रार्थना है कि ग्रंथार्थ निर्दोष होने के लिये मुझे
अपना अवधान प्रदान करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे भगवदुद्धव संवादे एकाकार टीकायां
परमार्थप्राप्तिसुगमोपायकथनोद्धवबद्रीकाश्रमप्रवेशो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय
हे अनादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वसिद्धि सद्गुरु ! तुम्हारी
जय हो। हे कृपालु, हे कृपानिधि ! तुम्हारी जय हो। हे वेदवक्ता ! तुम्हारी जय हो, हे वेदार्थ प्रकट करने वाले !
तुम्हारी जय हो। हे वेद प्रतिपालक तुम्हारी जय हो। हे वेदात्मक ! हे वेदज्ञ ! तुम्हारी जय हो। हे विश्व
प्रकाशक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वप्रतिपालक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वनिवासक ! हे अकर्त्तात्मक अव्यय !
तुम्हारी जय हो तुम्हारी स्थिति अक्षर और अव्यय है। तुम्हें नाम, रूप, वर्ण और व्यक्तित्व नहीं है, फिर भी तुम
जाति गोत्र में, लोकव्यवहार के अनुसार विचरण करते हो। संसार में तुम्हारा कोई नहीं है, फिर भी तुम गृहस्थ
धर्म के अनुसार घरबार बसा कर रहते हो। तुम सचमुच नपुंसक, स्त्री-पुरुष स्थिति विरहित हो फिर भी स्त्रियों
तथा बच्चों के साथ रहते हो। तुम अजन्मा होते हुए भी पिता का वन्दन करते हो, उसी प्रकार माता को भी
नमस्कार करते हो। संसार में तुम्हें सब एक समान हैं फिर भी शत्रु-मित्र का चुनाव करते हो। तुम जगन्नाथ होते
हुए जगच्चालक हो, लेकिन एक के सेवक भी बनते हो। तुम पूर्णात्मा परिपूर्ण हो लेकिन रंक बनकर भीख भी
माँगते हो। तुम निष्ठावंत ब्रह्मचारी होकर व्यभिचारी स्त्रियों का उद्धार भी करते हो। तुमने सर्वज्ञ होकर गुरु के
घर मस्तक पर घास और लकड़ी भी ढोयी है। कलिकाल का भी संहार करने वाले तुम हौवे के भय से छिप
कर भी बैठते हो। हे श्रीकृष्ण ! तुम माया के नियंता होते हुए भी अन्त में माया ने ही तुम्हें ओखली से बाँधा।
तुम नित्यतृप्त आत्माराम होते हुए गोपालों का भात खाते थे। तुम्हारा अंत ब्रह्मादि देवतागण भी नहीं जानते।
फिर भी तुम यशोदा के पास रोते हुए खड़े रहते थे। अपने पेट में पूरे त्रैलोक्य का दर्शन कराने वाले तुम गोपियों
की गोद में बैठा करते थे। तुम संसार के चालक श्रीहरि हो, तुम्हें लड़के चलना सिखाते थे। सर्ववंद्य और
सर्वेश्वर हो तुम फिर भी तुम सफेद सुअर (वराह अवतार) बने थे। सारांश, तुम्हारे बारे में वेद भी कोई निर्णय
नहीं कर सकते। वेद पूरी तरह मौन हो गये। बड़े-बड़े ज्ञाता आये लेकिन वे भी तुम्हारा पता-ठिकाना नहीं लगा
सके। योगी जंगल में जाकर बैठे, लेकिन वे भी तुम्हारी महिमा नहीं समझ सके। मुख्यत: जब कृष्ण को जन्म
ही नहीं है तो उसकी मृत्यु कैसे दिखायेंगे ? इससे सम्बन्धित निरूपण सुनने के लिये परीक्षित के मन में उत्कंठा
लगी हुई थी। प्रथमाध्याय में वैराग्य के लिये शापयुक्त मूसल का उल्लेख किया था। वही बात अब ग्रन्थ के
अन्त में परीक्षित पूछ रहा है।
राजोवाच
ततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम्।
द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥
पाण्डव कुल का रत्न अथवा कौरवकुल का भूषण, जिसने धर्म की रक्षा के लिये कली का निग्रहण किया,
ऐसा राजा परीक्षित, धीर, वीर और उदार कीर्ति के रूप से प्रसिद्ध है, उसने स्वमुख से अत्यन्त श्रद्धापूर्वक श्री
शुक्राचार्य से विनती की। पूछा कि उद्धव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने के बाद जब वह बदरिकाश्रम गया तो उसके
बाद द्वारका में श्रीकृष्ण ने क्या किया ? उत्पत्ति, स्थिति और लय जो अपनी इच्छा के अनुसार किया करता है,
उस श्रीकृष्ण ने अपने देह का विसर्जन किस प्रकार किया ?
तीसवाँ अध्याय ८९१
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मशाप से अपने कुल का निःशेष विनाश किस प्रकार किया ? इसे निश्चित रूप से बतायें।
लोगों के नेत्रों को आह्लाद देने वाली कृष्ण की छवि अत्यन्त सुन्दर थी। उसे देखकर शंकर भी स्वानंद से झूमने
लगते थे। इतने मनोरम शरीर का श्रीकृष्ण ने कैसे त्याग किया ? ब्रह्मशाप के भय से उन्होंने अपना शरीर
किसलिये छोड़ा ? कृष्ण परिपूर्ण ब्रह्म था। उसे शाप बन्धन की बाधा होने लायक नहीं थी; लेकिन उसने भी
यादववंश का शरीर त्याग कर ब्रह्मशाप सच कर दिखाया। श्रीकृष्ण को केवल देखने भर से जीवप्राण आनन्द से
भर जाता था, उसके सौन्दर्य का वर्णन राजा स्वयं कर रहा है।
प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति ततो यत् सतामात्मलग्नम्।
यच्छ्रीर्वाचां जनयति रतिं किं नु मानं कवीनां दृष्ट्वाजिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥
जिसकी ग्यारहों इन्द्रियों को निरन्तर माधुर्य लगा रहता था और जिसे भोगते हुए उसकी माधुरी बढ़ती ही
जाती थी, जिससे कभी भी अरुचि या उकताहत नहीं होती थी, ऐसी उस कृष्ण की माधुरी असीम थी। बाला,
मुग्धा, प्रौढ़ा तथा प्रगल्भा ये चार प्रकार की स्त्रियाँ, एक बार श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने पर उनकी दृष्टि पीछे की
ओर नहीं मुड़ती थी। जो स्त्रियाँ धार्मिक, धैर्यवान तथा पतिव्रता साध्वी थीं वे भी यदि एक बार कृष्ण की मूर्ति
देख लेतीं तो उनकी दृष्टि पीछे नहीं मुड़ती थी। जिन स्त्रियों ने काम को भोगा ही नहीं है या जो अत्यन्त वृद्ध हो
जाने के कारण अतिनिष्काम हो गयी हैं; वे भी यदि श्यामसुन्दर हरि का स्वरूप देखती हैं तो उनकी आँखें भी
हरिरूप में लुब्ध हो जाती हैं। पानी और नमक से एक बार मेल हो जाय, उसी प्रकार श्रीकृष्ण के प्रति स्त्रियों की
दृष्टि एक बार आकृष्ट हो जाय तो फिर वह टूटती ही नहीं थी। आँखों को श्रीकृष्ण दर्शन का पागलपन हो जाता
था। लेकिन बेचारी स्त्रियाँ ही क्यों ? जो संत, विरक्त और परमार्थी होते, उनके कान पर भी यदि कृष्ण कीर्ति की
बात आती थी तो उसकी मूर्ति उनके मन में भी बस जाती थी। कृष्ण की कीर्ति चित्तवृत्ति को इतना अधिक
आकर्षित कर लेती थी कि पूरा चित्त ही कृष्णस्वरूप हो जाता था। कृष्ण की कीर्ति संतों को आकर्षित कर लेती
थी, इसमें विशेष आश्चर्य नहीं है क्योंकि असंत भी उसकी कीर्ति सुनकर तद्रूप हो जाते थे। चन्दन की हवा
लगने से खैर तथा सागवान भी चन्दन हो जाते हैं उसी प्रकार कृष्ण कीर्ति सुनकर सभी का समानरूप से समाधान
हो जाता था। श्रीकृष्ण की कीर्ति भक्तिभाव से श्रवण करने से असंत भी संत का पद प्राप्त कर लेते हैं और फिर
संत और असंत ये भेद नष्ट होकर दोनों एक जैसे हो जाते हैं। महाकवि कृष्ण की कीर्ति का वर्णन कर परम
भाग्यशाली हो गये; ऐसी कृष्णकीर्ति का जो वर्णन करते हैं, वे भी वैसी ही शोभा प्राप्त करते हैं। महाकवियों को
नवरस में रँगने वाला एक ही पुरुष श्रीकृष्ण दिखायी देता है। वे जिस विशिष्ट रस का वर्णन करने लगते हैं, वह
रस कृष्ण स्वयं ही हो जाते हैं। महाकवि आदि से लेकर काव्यकर्त्ताओं की स्फूर्ति की जननी कृष्णकीर्ति ही है।
जो हरिकीर्तन में रंग जाते हैं, उनकी वाणी वंद्य हो जाती है। श्रीकृष्ण का गुणानुवाद गाते समय यदि कोई त्रुटि भी
हो जाती है तो भी उस वाणी को शंकर नमन करते हैं। यम और काल भी उनके चरण छूते हैं। जहाँ श्रीकृष्ण
कीर्ति का कीर्तन चलता है, वहाँ कर्माकर्म की समाप्ति होकर जन्म-मरण के साथ संसार की विदाई होती है। इस
प्रकार कीर्ति की महिमा सभी दृष्टियों से अगाध है। कृष्णकीर्ति का काव्य भी तीनों लोकों में अत्यन्त पावन है।
बड़े-बड़े कवियों द्वारा वर्णन की हुई कृष्ण की कीर्ति सुनने से श्रद्धा और प्रेम की वृद्धि होती है। इसकी कृष्ण
८१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
की भक्ति में वृद्धि होती है। कविता का ऐसा अद्भुत सामर्थ्य है। कृष्ण की कीर्ति अगाध है। फिर उसी कृष्णमूर्ति
का जो अखण्ड ध्यान करते हैं, वे तद्रूप हो जाते हैं यह कहना आवश्यक नहीं है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है
क्योंकि जो उसकी ओर द्वेष से देखते हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं। मेघश्याम श्रीकृष्ण रथ पर सारथी बना था,
इसीलिये अर्जुन का पराक्रम 'विजय' नाम से विख्यात है। वह सदा पूर्ण विजय प्राप्त करता था इसलिये अर्जुन
को 'जिष्णु' यह नाम मिला है। युद्ध में उसकी प्रतिज्ञा कितनी ही कठिन क्यों न हो लेकिन श्रीकृष्ण उसे पूर्ण
करता था। अर्जुन के रथ पर बैठकर रणभूमि में भ्रमण करते समय जिसने भी उसकी मूर्ति देखी वे उसके स्वरूप
तक पहुँच गये। जहाँ भी कृष्ण की चरणरज पड़ती थी वहाँ चारों मुक्तियों का उत्सव हो जाता था। ऐसे उस परम
पवित्र श्रीकृष्ण का शरीर उसने कैसे छोड़ा ? आप कहेंगे कि ब्रह्मशाप के भय से श्रीकृष्ण ने शरीर का त्याग किया
होगा, लेकिन यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि कृष्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म है। किसी को भी ब्राह्मण की
अवहेलना, छल, निन्दा अथवा अपमान नहीं करना चाहिये। उनका सम्मान बढ़ाना चाहिये, इसीलिये श्रीकृष्ण ने
शरीर त्याग कर ब्राह्मण का शाप सच कर दिखाया कृष्ण परिपूर्ण परमात्मा थे, उन्होंने अपने पूरे कुल का संहार
कर ब्राह्मण की बात सच की और उसके शाप के लिये अपने देह का त्याग किया। देह त्याग का वह सारा वृत्तांत
योगेश्वर शुक सविस्तार बता रहे हैं और राजा परीक्षित संकल्प का उदक छोड़कर उसे सुन रहा है। पाण्डव कुल
में कुलदीपक एक परीक्षित ने ही जन्म लिया था। वह उदक छोड़कर भागवत का परिपाक सेवन कर रहा था।
ब्रह्मदेव नारद-व्यास तक भागवत का उपदेश गुह्य और गुप्त ही था। दीनजनों का उद्धार हो इसलिये परीक्षित के
बहाने शुक्राचार्य ने उसे प्रकट किया। धर्मराज के वंश में अत्यन्त धार्मिक एक परीक्षित ही था। वह भागवतामृत
का अत्यन्त रसिक था और उसे श्रवण करने की अत्यन्त उत्कंठा थी। उस परीक्षित ने इस प्रकार विनती की। तब
शुक्राचार्य ने मन में संतुष्ट होकर उससे क्या कहा, सुनें।
ऋषिरुवाच
दिवि भुव्यंतरिक्षे च महोत्पातान् समुत्थितान्।
दृष्ट्वाऽऽसीनान् सुधर्मायां कृष्णः प्राह यदूनिदम् ॥ ४ ॥
शुक्राचार्य बोले, हे परीक्षित ! उद्धव बदरीवन में जाने के बाद द्वारका में अनेक विघ्न आये। वह तीन प्रकार
के उत्पातों से घिर गयी। पृथ्वी पर, अंतराल तथा आकाश में उत्पातों से घिर गयी। पृथ्वी पर, अंतराल तथा
आकाश में अर्थात् भूर-भुवर स्वर्लोक में बड़े-बड़े उत्पात उत्पन्न हो गये। दिन में आकाश से तारे टूटकर गिरने
लगे और अंतरिक्ष में भूतों ने हाहाकार करना शुरू किया। आकाश में लाठी की तरह सीधे, पीछे फौवारा लगा
हुआ तथा आगे चुटिया इस प्रकार तीन तरह के धूमकेतु उत्पन्न हो गये और दिन में सबको दिखायी देने लगे।
भीषण आवाज के साथ भूमि कंपायमान हुई। द्वारका नगरी के द्वार में बहुत बड़ा विस्फोट हुआ। तीन दिन तक
उस भूकम्प के झटके लगते रहे और उससे सारे मकान हिल गये। आँधी से वृक्ष समूल जमीन पर गिर पड़े।
द्वारका में इतने जोर का अंधड़ चला कि उससे लोगों को आँख खोलने में कठिनाई होने लगी। आकाश में नग्न
अवस्था में भूत चिल्लाने लगे। आकाश साफ था तभी रक्त की वृष्टि होने लगी। सूर्य और चन्द्रमा में गड्ढ़े बन
गये। ग्रह ग्रहमण्डल से बाहर आ गये। शत्रु के घर में सारे ग्रह एकत्र हो गये। सामने आकाश में दिशाएँ चलती
हुई दिखायी दीं। बादल न रहते हुए भी आकाश में जोर की गड़गड़ाहट शुरू हो गयी और बिजली गिरने लगी।
जोर-शोर से चीलें मँडराने लगीं और भोजन करने वालों के सामने से थालियाँ ले जाने लगीं। दिनदहाड़े उल्लू
बोलने लगे और राजमहल के सामने कुत्तों कां रुदन शुरू हो गया। जिस 'सुधर्मा' सभा में संकल्प-विकल्पों की
तीसवाँ अध्याय ८१३
निवृत्ति होती थी, उस सभा में बैठे वीर अचानक ही 'मारो-मारो' कहकर चिल्लाने लगे। उनका यह भाषण
सुनकर बड़े-बड़े वीरों को झटका लगा। सभा के सारे यादववीर चिंतित हो उठे। यादव सभा में बैठे थे और
उनकी छायाएँ मस्तकविहीन दिखायी दे रही थीं। इस प्रकार 'सुधर्मा' सभा में संकट आ गया। ऐसे दुःख सूचित
करने वाले संकट देखकर यादव उन विघ्नों का विचार करने लगे। द्वारका के विघ्न दूर करने के लिए सुदर्शन की
योजना है, ऐसी स्थिति में द्वारका में विघ्न उत्पन्न होने का क्या कारण है? पलक झपकती है, इस बीच सुदर्शन
२१ बार द्वारका के चारों ओर घूमता है, तिस पर भी द्वारका पर विघ्न आया देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये।
सारे विघ्नों को आकर्षित करता है, इसलिये उसे 'कृष्ण' कहते हैं। वह कृष्ण यहाँ होते हुए ऐसे भीषण उत्पात
क्यों हो रहे हैं? इन विचारों से चिंतांतुर हुए यादवों को श्रीकृष्ण क्या उपाय बताते हैं, सुनें।
एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतवः।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवाः ॥५॥
जो इस संसार का सूत्रधार है, मायायंत्र का चालक है, वह श्रीकृष्ण यादवों के साथ विघ्नों के सम्बन्ध में
विचार करने लगा। यादवकुल का अन्त निकट आ गया यह श्रीकृष्ण को मालूम हो गया, लेकिन उनका विनाश
द्वारका में न हो इसलिये उसने उन्हें प्रभास भेज दिया। कारण यह था कि द्वारका सातवीं मोक्षपुरी होने के कारण
वहाँ की मृत्यु मोक्षदायी होती है; किन्तु सारे यादव 'अधिकारिक' कोटि के थे। उन्हें इतने में मोक्ष न प्राप्त हो
इसलिये श्रीकृष्ण ने उन्हें द्वारका से बाहर किया। कुल नाश का मूल जो पटेर था वह प्रभास में उत्पन्न हुआ था।
उसमें भी कृष्ण का उद्देश्य था इसलिये उसने उन्हें प्रभास भेज दिया। यादवों को भयानक ब्रह्मशाप लगा था
इसीलिये द्वारका में उत्पातरूप में संकट उत्पन्न हुए। अनेक प्रकार के होने वाले वे उत्पात अनर्थ के सूचक हैं,
अतः यदि अब विलम्ब करेंगे तो बहुत बड़े संकट में फँस जाएंगे इसलिये आप लोग यहाँ दो घड़ी के लिये भी न
रहें। बच्चे, स्त्रियाँ, इष्ट मित्र आदि को लेकर शीघ्र यहाँ से निकल जाइये। 'हम यादववीर अत्यन्त बलशाली हैं,
संकट हमारा क्या कर लेंगे?' ऐसा कहेंगे तो उस गर्व का अनिष्ट परिणाम भोगना पड़ेगा ब्राह्मण के शाप के आगे
आपका शौर्य क्या करेगा? इसलिये आगा-पीछा सोचे बिना तत्काल निकल जाइये। आज द्वारका में कोई पानी भी
न पिये, स्त्रियाँ-बच्चे, नाते-रिश्तेदार आदि सब सपरिवार निकल जायें। हमारे कुल को ब्रह्मशाप लगा है, इसलिये
द्वारका पर संकट आया है। कुल के इस पाप को धोने के लिये प्रभास यही पुण्य क्षेत्र है।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च शङ्खोद्धारं व्रजन्वितः।
वयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक्तसरस्वती ॥६॥
शंखोद्धार तीर्थ रहने के लिये अत्यन्त सुरक्षित है, वहाँ स्त्रियों, बच्चों को तथा वृद्धजनों को रखें; और शेष
सारे यादववीरों को तत्काल प्रभास क्षेत्र के लिये कूच करना चाहिये। वहाँ सरस्वती पश्चिमवाहिनी हो गयी है
और समुद्र से मिल गयी है, वहाँ जाकर सब लोग शास्त्रोक्त तीर्थविधि करें।
तत्राभिषिच्य शुचय उपोष्य सुसमाहिताः।
देवताः पूजयिष्यामः स्नपनालेपनार्हणैः ॥७॥
वहाँ वेदोक्त विधि के अनुसार स्नान करें, तीर्थविधि के अनुसार निराहार व्रत करें। सभी लोग सद्भाव से
शुचिर्भूत होकर, शापमुक्त होने के लिये तीर्थ देवताओं का विधिपूर्वक पूजन करें। स्नान, वस्त्र, अलंकार, चंदनादि
पूजा साहित्य अर्पित कर षोडशोपचार से श्रद्धापूर्वक हरिहर का पूजन करें।
८१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मणांस्तु महाभागान् कृतस्वस्त्ययना वयम्।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गजाश्वरथवेश्मभिः ॥ ८॥
तदुपरान्त शांति के लिये वेदवेदांग परांगत शमदमादि तप से युक्त तथा स्वधर्म में तत्पर ब्राह्मणों की पूजा
करें। अरिष्ट की शान्ति के लिये जो स्वस्तिवाचन करें उन ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान दें, अत्यन्त श्रद्धा से
गोदान, भूमिदान, गजदान, अश्वदान, सुवर्णदान, तिलदान, वस्त्रदान, गृहदान आदि दान दें। रथ में घोड़े जोड़कर
वे रथ दान में दें; जिससे ब्राह्मणों को संतोष हो, वह सब कार्य करें। ब्राह्मणों को जो भी चाहिये, वह सब
श्रद्धायुक्त बुद्धि से अर्पण करें। ब्राह्मण जहाँ सन्तुष्ट रहते हैं, वहाँ विघ्न प्रवेश नहीं करते।
विधिरेष ह्यरिष्टघ्नो मङ्गलायनमुत्तमम्।
देवद्विजगवां पूजा भूतेषु परमो भवः ॥ ९॥
जहाँ हरि का देवतार्चन होता है; जहाँ शालिग्राम शिलार्चन होता है, जहाँ साधु संतों का सम्मान होता है;
वही अरिष्टनाशक महापूजा है। जहाँ श्रद्धा भक्ति से ब्राह्मणों की पूजा होती है, जहाँ श्रद्धापूर्वक गौ की पूजा होती
है; जहाँ पूर्ण भूतदया का वास होता है; वहाँ विघ्न कभी प्रवेश नहीं करते। अन्धे, अपाहिज, दुर्बल लोगों को जहाँ
अन्न मिलता है; जहाँ दीन-दुखी सुखी होते हैं, वहाँ विघ्नों की कभी बाधा नहीं होती। अलौकिक भूत दया यह
सकल अरिष्टों का निवारण करती है, तथा परम मंगलप्रकाशक तथा सभी दृष्टियों से सुखदायी है।
इति सर्वे समाकर्ण्य यदुवृद्धा मधुद्विषः।
तथेति नौभिरुत्तीर्य प्रभासं प्रययू रथैः ॥ १०॥
इस प्रकार मधुकैटभ का संहार करने वाले मधुसूदन मुरारी, परमात्मा श्रीकृष्ण ने सबको प्रभास जाने के
लिये कहा। यादवों में जो वृद्ध, ज्ञानी, पुत्र, मित्र, संबंधी और इष्ट लोग थे, उन्होंने श्रीकृष्ण का वचन बड़े आदर
से शिरसावंद्य किया। सारी सामग्री लेकर स्त्रियाँ, वृद्ध, बच्चे नौकाओं में बैठ कर शंखोद्धार की ओर चल पड़े।
रथ, हाथी आदि तैयार कर तथा चतुरंगी सेना के साथ कृष्ण के साथ सारे यादववीर चल पड़े।
तस्मिन् भगवताऽऽदिष्टं यदुदेवेन यादवाः।
चक्रुः परमया भक्त्या सर्वश्रेयोपबृंहितम् ॥ ११ ॥
यादव प्रभास गये और जितना श्रीकृष्ण ने बताया था उससे भी विशेष स्नान, दान आदि किया। सारे यादवों
ने मिलकर भोजन किया और विधिपूर्वक पारन किया। फिर मूल्यवान मद्य मँगवाकर मद्यपान करना प्रारम्भ
किया।
ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मतिः ॥ १२॥
तीर्थविधि करके अरिष्टों का निवारण करना था, लेकिन प्रारब्ध की गति कैसी विचित्र थी। इधर उन्होंने
मद्यपान शुरू किया। एक बार उसमें रुचि जगने पर लोग उस पर टूट पड़ते हैं। इसमें अत्यधिक उन्माद बढ़ता है।
ऐसा मद्य बच्चे और बड़ों ने साथ-साथ पीना शुरु किया। 'मैरेयक' नाम का अत्यन्त मधुर मद्य एक बार मुँह में
लगते ही सज्ञान को भी पागल कर देता है। उस मद्य का यादववीर डट कर पान करने लगे। छोटे-बड़े सभी
एक-दूसरे को आग्रह करके पीने लगे।
तीसवाँ अध्याय ८१५
महापानाभिमत्तानां वीराणां दृप्तचेतसाम्।
कृष्णमायाविमूढानां संघर्षः सुमहानभूत्॥ १३॥
पहले के अंतरंग मित्र थे लेकिन मद्यपान से मदोन्मत्त होकर अत्यन्त गर्व से एक-दूसरे की निन्दा करने
लगे। कृष्णमाया ने उनका ज्ञान नष्ट कर दिया, इससे सभी की बुद्धि मंद हो गयी। उन्होंने आत्मीयता का सम्बन्ध
तोड़कर युद्ध ही प्रारम्भ कर दिया। एक-दूसरे को बुरा-भला कहने से दोनों में ही क्रोध जगा और वे हाथ में
शस्त्र लेकर आपस में लड़ने लगे।
युयुधुः क्रोधसंरब्धा वेलायामाततायिनः।
धनुर्भिरसिभिर्भल्लैर्गदाभिस्तोमरर्ष्टिभिः ॥ १४॥
क्रोध से आँखें लाल करते हुए उन्होंने तत्काल शस्त्र निकाल लिये और वे महान वीर समुद्र तट पर घनघोर
युद्ध करने के लिये उद्यत हो गये। धनुष्य की प्रत्यंचा खींच कर एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे। अपने
ही आत्मीय-स्वजनों के प्राण लेने के लिये तलवार से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। कोई भाला उठाकर एक-
दूसरे पर मार करने लगे तो कोई जोर-
८१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादयः सहस्रजिच्छतजिद्भानुमुख्याः।
अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिता जघ्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भृशम् ॥१७॥
यादवकुल के महाबली निशठ, उल्मुकादिक, तथा शतजित्, सहस्रजित्, भानुप्रभृति आदि युद्ध में क्रोध में
उबल रहे थे। मद्यपान के कारण गर्व से फूले हुए तथा कृष्ण की माया से मोहित वे यादव अपने सुहृद
सम्बन्धियों का विनाश करने लगे। ब्रह्मशाप का प्रहार कितना प्रखर होता है। भाई ही भाई को जान से मारने
लगा। कृष्ण की माया से भ्रमित होकर उन्होंने जाति में ही युद्ध प्रारम्भ कर दिया।
दाशार्हवृष्ण्यन्धकभोजसात्वता मध्यर्बुदा माथुरशूरसेनाः।
विसर्जर्नाः कुकुराः कुन्तयश्च मिथस्ततस्तेऽथ विसृज्य सौहृदम् ॥१८॥
यादवों की प्रमुख जाति तो एक ही थी किन्तु उनमें बड़े बारह भेद थे। वे बारहों जातियाँ युद्ध में सम्मिलित
हो गयीं। हे परीक्षित् ! उनके नाम सुनो। दाशार्ह, सात्वत, अंधक, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, कुंती, कुकुर, विसर्जन,
मधुद्व भोग और वृष्णव ये बारह जातियाँ थीं। पहले यादवों की ऐसी प्रतिज्ञा थी कि यदि वे किसी दूसरे से अपनी
जाति के बारे में अच्छा या बुरा सुनते तो अपने प्राण तक दे देते थे और अपनी जाति का संरक्षण करते थे। लेकिन
इस समय वे ही यादव आत्मीयता को भूलकर, जिनके चरणों पर मस्तक रखना चाहिये उनके भी प्राण लेने के
लिये उद्यत हो गये थे।
पुत्रा अयुध्यन् पितृभिर्भ्रातृभिश्च स्वस्त्रीयदौहित्रपितृव्यमातुलैः।
मित्राणि मित्रैः सुहृद्द्रार्तींस्त्वहञ्ज्ञातय एव मूढाः ॥१९॥
उनका चित्त कृष्ण की माया ने हर लिया था, जिससे वे नितांत बेसुध हो गये थे। उनमें अपने और पराये
का अन्तर समाप्त हो गया था। रण में वे इतने अधिक उन्मत्त हो गये थे। भक्तिभाव से जिनके चरणों का तीर्थ
लेना चाहिये, ऐसे अपने पिता के मस्तक पर प्रहार करने के लिये भी पुत्र तत्पर हो गये थे। जहाँ अपने भाई को
युद्ध में संकट से बचाने के लिये उसका भाई दौड़कर युद्ध में जाता था, वही भाई इस युद्ध में प्रखर बाणों से
एक-दूसरे को पीड़ा पहुँचाने लगे। जिन्होंने बड़े लाड़-प्यार से अपने शरीर पर खेलाया वह चाचा पिता की तरह
है, लेकिन उसके ही गर्दन पर तलवार रखकर भतीजा उसका प्राण लेने चल पड़ा। लड़की का पुत्र जो नाती है
और जिसे मातामह का श्राद्ध करने का अधिकार है वह नाना पर निर्दयता से प्रहार कर उसके प्राण लेने लगा।
मामा और भांजा परस्पर मारपीट करने लगे और प्रिय मित्र भी तेज शस्त्रों से एक-दूसरे के प्राण लेने लगे। मित्रों
की मैत्री में वे एक-दूसरे पर प्राण देने में भी नहीं हिचकिचाते; लेकिन वही मित्र अब दाँत-होंठ चबाकर प्राण
लेने के लिये उद्यत हो गये। उनका आयुष्य समाप्त हो गया था, इसलिये कालसर्प का विष चढ़ गया। सभी मूर्ख
बनकर स्वजाति का वध करने लगे।
शरेषु क्षीयमाणेषु भज्यमानेषु धन्वसु।
शस्त्रेषु क्षीयमाणेषु मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः ॥२०॥
घनघोर युद्ध हुआ; भाते में के बाण भी समाप्त हो गये। फिर वे धनुष्य के डंडे से ही एक-दूसरे को मारने
लगे। जोर-जोर से प्रहार करने के कारण उनके धनुष भी टूट गये और उनके टुकड़े-टुकड़े हो गये। सारे शस्त्र
समाप्त हो जाने के बाद शस्त्रों का युद्ध समाप्त हो गया। तब ब्रह्मशाप से उपजा हुआ पटेर मुट्ठी में भरकर वे
उससे एक-दूसरे को मारने लगे।
तीसवाँ अध्याय ८१७
ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृताः ।
जघ्नुर्द्विषस्तैः कृष्णेन वार्यमाणास्तुतं च ते ॥ २१ ॥
यादवों ने पटेर हाथ में लेते ही वे वज्र की दहकने लगे। फिर अत्यन्त प्रखर होकर उन्होंने 'परिधि' की
आकृति धारण कर ली। फिर वे उसी से एक-दूसरे को मारने लगे। पहले अन्य शस्त्रों का उन पर कोई प्रभाव नहीं
होता था लेकिन पटेर की मार से वे तत्काल मर जाते थे। उस पटेर की मार के आगे यादवों की चल नहीं पा रही थी
और वे एक-दूसरे का शिरच्छेद कर गिराने लगे। रण में शेष यादवों को मारने के बाद जो महावीर यादव थे वही
बच गये। ये यादव हाथी की तरह उन्मत्त थे और किसी के वश में आने लायक नहीं थे, इसलिये उनका निश्चित
रूप से निर्दलन करने के लिये श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा पूरी करने की दृष्टि से दौड़ कर गये। उसने उनसे कहा, यह पटेर
ब्रह्मशाप से उत्पन्न हुआ है, उसे हाथ भी मत लगाइये, युद्ध की इच्छा छोड़िये, मेरी बात मानिये। इस प्रकार धर्मनीति
सुनाकर श्रीकृष्ण उनका निवारण करने लगा लेकिन शेष बचे हुए यादव उसे मारने के लिये उसकी ओर दौड़ पड़े।
यह सब कृष्ण की माया की ही लीला थी। उन्हें अचूक मृत्यु प्राप्त हुई। किसी ने कहा, पहले इस कृष्ण की ही
पिटाई करें, यह हमें ठगने आया है, कहकर वे हाथ में पटेर लेकर दौड़े। किसी ने कहा, देखते क्या हो, उसका झोंटा
पकड़ो, उससे इतना डरते क्यों हो ? किसी ने कहा, श्रीकृष्ण को मैं एक ही झटके में गिरा दूँगा।
प्रत्यनीकं मन्यमाना बलभद्रं च मोहिताः ।
हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिनः ॥ २२ ॥
किसी ने कहा, अरे उसे देखो ! उधर बलराम खड़ा हे वही हमारा मुख्य शत्रु है। पहले इसे ही मारें और
इस प्रकार यादवों का एक झुण्ड उस पर चढ़ गया। उन दुष्टों में अत्यन्त तेज नशा चढ़ने के कारण वे वज्र सरीखा
पटेर हाथ में लेकर बलराम पर चढ़ गये। तब उसका रक्त भी उबलने लगा।
अथ तावपि संक्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन ।
एरकामुष्टिपरिधौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि ॥ २३ ॥
शुक्राचार्य परीक्षित से बोले, यादवों पर मृत्यु ने अधिकार जमाया, इसलिये वे आततायी लोग रामकृष्ण को
ही मारने के लिये उद्यत हो उठे। वे हमें ही मारने आये हैं यह देख उन्हें भी क्रोध आ गया और वे भी युद्ध करने
लगे। उन्होंने भी वह दहकता हुआ परिधि हाथ में लेकर यादवों को अपना पराक्रम दिखाया। रामकृष्ण का
विनाश करने के लिये सभी जातियों और सभी गोत्र के लोग उन दोनों पर टूट पड़े। तब कृष्ण कालशक्ति से क्षुब्ध
हो गया। अपने सारे कुल का संहार हुआ देख श्रीकृष्ण को अपने कर्तव्य पूर्ण होने का विश्वास हुआ।
ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम् ।
स्पर्धाक्रोधःक्षयं वैणवोऽग्निर्यथा वनम् ॥ २४ ॥
प्रारब्ध के अनुसार वे ब्रह्मशाप से ठगे गये। कृष्ण की माया से उनकी बुद्धि का भ्रंश हो गया। मद्यपान के
उन्माद और क्रोध से उनका क्षय हुआ। बाँस के द्वीप में बाँस ही एक-दूसरे पर रगड़ कर आग की चिनगारी
निकलती है जिससे पूरा जंगल जलकर खाक हो जाता है, उसी प्रकार यादवकुल का विनाश हो गया।
एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः ।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषितः ॥ २५ ॥
८१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार चक्रधारी श्रीकृष्ण ने जब अपने स्वकुल का विनाश किया, तो शेष बचा पृथ्वी का भार भी कम
हो गया होगा ऐसा उसे लगा और इससे उसे अत्यन्त समाधान हो गया। जिस प्रकार माली जमीन में अदरक बोता
है, पानी डालकर उसकी सेवा करता है और अन्त में उसे खन कर निकाल लेता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी
अपने यादववंश की हालत कर दी। यादवों का उसने ही अपने सामर्थ्य से संरक्षण किया था और उसी ने उन्हें मार
भी डाला। इससे मैं ममत्त्व से कितना दूर हूँ इसका उसने दिग्दर्शन कर डाला। कृष्ण समस्त यादवों का प्रतिपालक
था; उनके प्रति उसने आज तक ममत्व प्रकट किया था और अन्त में कुल का नाश कर उसने अभिमानरहित होना
भी प्रकट किया। अपने साथ-साथ स्त्री-बच्चों का और पूरे कुल नाश करने पर भी ज्ञाता को मोह नहीं उत्पन्न
होता। इस नित्यमुक्तता का श्रीकृष्ण ने आचरण कर दिखाया। ज्ञाता के मन में अहंकार तथा ममता नहीं होती, पूरे
कुल के साथ पुत्रनाश होने पर भी ज्ञाता को जरा भी दुःख नहीं होता यह श्रीकृष्ण ने दिखला दिया। ब्राह्मण के
भयंकर-शाप को उसने झूठ सिद्ध नहीं होने दिया। कुलक्षय का काम करने से श्रीकृष्ण को सुख प्राप्त हुआ। यह
देखकर बलराम ने भी अपने मन में विचार किया कि मेरा अवतार कार्य समाप्त हो गया।
रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।
तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६ ॥
फिर बलराम ने भी समुद्रतट पर अटल आसन लगाया और निर्वाण ध्यान प्रारम्भ किया। देह में प्राण को
आकृष्ट कर सारा देहाभिमान छोड़ दिया और परम पुरुष का ध्यान करते ही वह भी तद्रूप हो गया। घट का
आकाश जिस प्रकार सहज ही महदाकाश हो जाता है, उसी प्रकार देहाभिमान का त्याग करते ही बलराम
संकर्षणस्वरूप हो गया। मनुष्यधारी का जो रूप लिया था वह देह निःशेष छोड़ दिया और अपने पहले के स्वरूप
में रह लिया। समुद्र तट पर उसने अपना निर्जीव देह त्याग दिया। बलराम का यह निर्वाण देखकर श्रीकृष्ण ने भी
अपनी तैयारी प्रारम्भ की।
रामनिर्याणमालोक्य भगवान् देवकीसुतः।
निषसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥ २७॥
बलराम ने देह त्याग किया यह देखकर श्रीकृष्ण ने भी स्वयं निजधाम जाने की तैयारी की। पृथ्वीपालक,
श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण चुपचाप अश्वत्थ के नीचे वीरासन लगाकर बैठ गया। जिसके स्वरूप के माधुर्य से ब्रह्मदेव
और शंकर भी पागल हो गये, जिसके दर्शन को छोड़ दृष्टि आधे क्षण के लिये भी दूर नहीं जाती, दृष्टि से स्वाद
चखा यह देख रसना मन ही मन तड़फड़ाने लगी। वह उसके कीर्तन रस का स्वाद चटखारे लेकर लेने लगी।
बिना प्राशन किये ही अत्यन्त मधुर कृष्णरस जिह्वा चखने लगी तब विषय रस अपने आप ही फीका पड़ गया
और संसार नीरस हो गया। श्रीकृष्ण की कीर्ति जब कान में पड़ती है तब त्रिविध तापों की शान्ति होती है और
उसके गुणनाम की कीर्ति का वर्णन करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती हैं। जिसके चरण कमलों का
तुलसी से सुगन्धित हुए मकरंद को नाक से ग्रहण करने से बाकी सारे गन्ध तुच्छ लगने लगते हैं, जिसके देह का
स्पर्श होने से देहबुद्धि का नाश हो जाता है, ऐसे आनन्द की मूर्ति जो श्रीकृष्ण है वह शरीर में प्रत्येक अंग को
सुखद मालूम होता है। इच्छापूर्वक जिसके चरणों का वन्दन करने से समाधि भी लजा जाती है, वह श्रीकृष्ण
अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था। श्रीकृष्ण का वह आखिरी ध्यान शुक्राचार्य को बहुत
अच्छा लगा और वे प्रसन्नता से उसके ध्यान का वर्णन करने लगे।
तीसवाँ अध्याय ८१९
विभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः॥ २८॥
वह अन्तिम ध्यान पाँच श्लोकों में निरुपित है। ध्यान देकर सुनने वाला श्रोता था परीक्षित और वक्ता था
ज्ञानमूर्ति श्रीशुक योगीन्द्र। उस समय पीपल के वृक्ष के नीचे बैठी हुई वह मूर्ति अत्यन्त तेजःपुंज तथा देदीप्यमान
थी और उससे दसों दिशाएँ प्रकाशित थीं। न धुआँ, न कोयला और जिसका रंग भी लाल न हो, ऐसी अग्नि की
ज्वाला की तरह श्रीकृष्ण के शरीर की कांति सतेज और प्रखर दिखायी दे रही थी। कृष्णमूर्ति की प्रभा से सूर्य
और चन्द्रमा का तेज भी फीका पड़ गया। शून्य के कारण आकाश के लिये भी स्थान नहीं बचा क्योंकि
सच्चिदानंद का पूरा स्वरूप ही साकार हो गया था। वह मूर्ति चैतन्य तेज और शान्ति रस से ढली हुई थी तथा
चतुर्भुज स्वरूप में व्यक्त हुई थी। इससे सभी दिशाओं से कालिमा दूर हो गयी।
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम्।
कौशेयाम्बरयुग्मेन परवीतं सुमङ्गलम्॥ २९॥
सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम्।
पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३०॥
श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वच्छ और स्वयंभू, उसके प्रत्येक अवयव में आकाश प्रतिबिम्बित है; जिससे उसकी
नीलमेघ जैसी कांति अत्यन्त तेजःपुंज और सुन्दर दिखायी देने लगी है। श्रीकृष्ण पहले ही मनोहर हैं, तिस पर
मेघ श्याम वर्ण और भी खिल उठा है। उसके कारण उसे विशेष सौन्दर्य प्राप्त हो गया था और इसीलिये स्त्री-
पुरुषों का ध्यान उसमें लगा रहता था। बेचारे साधारण स्त्री-पुरुषों की कथा का क्या वर्णन किया जाय? परमार्थ
के मार्ग पर लगे हुए विरक्त संन्यासी भी उस पर मोहित हो उठते थे। कृष्ण की मूर्ति देखकर वे पागल हो जाते
थे। श्रीकृष्ण का दर्शन होते ही शिवा को उसका नित्य ही ध्यास लगा रहता था। पार्वती ने भी अपना मन कृष्ण
को ही अर्पण कर दिया था। इस प्रकार मूल से ही अप्रतिम सौन्दर्य, उसमें सुहास्य वदन और कमल जैसे रक्तिम
वर्ण के आकर्ण सुशोभित आँखें। मस्तक पर काले केश और उसमें सुन्दर और सुवासिक फूल गुँथे हुए; और उस
पर कृष्णरूप अर्थात् काले भ्रमर उन काले बालों में लुब्ध होकर बैठे हुए। कान में मकराकार कुण्डल थे, ऐसी
छवि का वर्णन कवि करते हैं; लेकिन वह साकार में भी निर्विकार ही थे क्योंकि उस श्रवण से विकार नष्ट होते
हैं। कृष्ण श्रवण प्राप्त होने पर आकार और विकार का विलयन ही होता है। उस कृष्ण के श्रवण में वे पूर्ण
देदीप्यमान कुंडल थे। तप्तसुवर्णकांति दो पीताम्बर शोभायमान थे; एक परिधान किया हुआ और दूसरा प्रावरण
के रूप में ओढ़ा हुआ। ब्राह्मण को ही देवता मानने वाला श्रीकृष्ण लक्ष्मी को भी एक ओर रखकर दाहिनी ओर
ब्राह्मण के चरण श्रीवत्सलांछन को सुशोभित करता था।
कटिसूत्रब्रह्मसूत्र किरीटकटकाङ्गदैः।
हरिनूपुरमुद्राभिः कौस्तुभेन विराजितम्॥ ३१॥
वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधैः।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम्॥ ३२॥
गले में चमकने वाला कौस्तुभमणि, कमरे में सुशोभित रत्नजड़ित मेखला; गले में लटकने वाला यज्ञोपवीत
८२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
और पैरों पर लटकने वाली शोभायमान वनमाला; मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट; उसमें चमकने वाले मूल्यवान रत्न
कीर्तिमुख के बाहुभूषण और अनेक रत्नों के हार, उपासक के यंत्र जैसी उँगलियों में अँगूठियाँ, उनमें त्रिकोण,
षट्कोण के आकार के हीरे जड़े हुए, गले में वैजयंती माला तथा मोतियों की एक लड़ी की माला और उसमें
पदक; नानाप्रकार के रत्नों के हार और सुगन्धयुक्त तुलसी की मालाएँ; पीताम्बर रत्नों से जड़ा हुआ जिसके दोनों
छोरों में मोतियों की जाली टंकी हुई; कमर में चित्रविचित्र नूपुर शोभायमान हो रहे थे, पैरों में नूपुर की झंकार
तथा पैंजनी आदि शोभा दे रहे थे। कमल से भी नाजुक श्रीकृष्ण के चरण थे। इस प्रकार देदीप्यमान कृष्ण
अप्रतिम रूप से शोभायमान था। शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध लेकर वह पीपल के आश्रय में वीरासन
लगाकर बैठा था। वह वीरासन इस प्रकार था कि दाहिना पैर नीचे रखकर उस जाँघ पर बायाँ आरक्त चरण रखा
हुआ था। सायंकाल के संधि प्रकाश को लज्जित करने वाली तथा बालसूर्य को न्यूनता दिखलाने वाली अत्यन्त
देदीप्यमान और कोमल आरक्त कांति श्रीकृष्ण के पैरों की थी।
मुसलावशेषायः खण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया ॥ ३३॥
अपने कुल की होली खेल सरस्वती के तट पर श्रीकृष्ण पीपल से टेक कर बैठा था, दाहिने पैर पर रखे
बायें पैर का उसका आरक्त तलुवा दिखायी दे रहा था। उसे मृग का मुख समझ कर 'जरा' नामक बहेलिये ने
उसका निशाना साधा और तीव्र गति से उसके पैर को छेद दिया। ब्राह्मण के शाप से जो लोहे का मूसल तैयार
हुआ था उसका चूर्ण करने के बाद यादवों ने लोहे का जो छोटा-सा टुकड़ा बच रहा था उसे समुद्र में फेंक दिया
था। समुद्र में एक मछली ने उसे निगल लिया था। उस मछली को 'जरा' नामक बहेलिये ने अपने जाल में फाँस
लिया। उसने उस मछली को चीरा, तो उसके पेट में से वह लोहे का टुकड़ा निकला। उस लोहे के टुकड़े का
बहेलिये ने बाण बनाया और उस बाण ने श्रीकृष्ण के चरण को भेद दिया। मछली के पेट में से निकले लोहे का
बाण तैयार करने से मनचाहा शिकार अवश्य प्राप्त होता है, इस विचार से बहेलिये ने उसका बाण तैयार किया
था। श्रीकृष्ण के पैर भेदने का प्रमुख कारण ब्राह्मण का शाप ही था। इसीलिये 'जरा' बहेलिया का वह बाण कृष्ण
के पैर में घुसा। लेकिन कृष्ण जरा भी नहीं चौंका। इसके विपरीत, बाण लगते ही उसे प्रसन्नता ही हुई।
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्विषः।
भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विषः ॥ ३४॥
श्रीकृष्ण के पैर में बाण पूरी तरह घुसते ही 'जरा' बहेलिया का हाथ तृप्त हो गया। उसने कहा, आज मैंने
बहुत बड़ा मृग मारा और वह मृग को पकड़ने के लिये दौड़ा। सामने चतुर्भुज पुरुष को देखकर 'जरा' बहेलिया
को अत्यन्त भय लगा। उसने मन ही मन कहा, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया, मैंने एक महान पुरुष को मार
दिया। हाय! हाय रे मेरा प्रारब्ध। तुमने मुझसे कितना दुष्ट कृत्य कराया। अब मुझ जैसे महापापी के असाध्य
दुःख का कौन निवारण करेगा? संसार का परमात्मा जो श्रीकृष्ण है उस पर मैंने प्रहार किया। मुझ जैसा पाप
किसी का नहीं होगा। भय से उसके शरीर में सिहरन होने लगी। उसने कहा, मेरे हाथ से बहुत बड़ा पाप हो
गया। संसार को जो ध्येयस्वरूप है, उसे ही मैंने ताप दिया। देवता भी जिसके चरणों का वंदन करते हैं, संत जिसे
साक्षात दण्डवत करते हैं, उस श्रीकृष्ण को ही मैंने बाणों से घायल कर दिया। इससे मुझे भयानक पातक लग
गया। कभी आत्महत्या करने पर वह पाप कभी नहीं गिरता और सारे संसार का प्रिय आत्मा जो श्रीकृष्ण है,
तीसवाँ अध्याय ८२१
उसकी हत्या याने कितनी बड़ी आत्महत्या का पाप मुझ पर लग गया ? सारे संसार की आत्महत्या करने वाला मैं
पूर्णरूप से पातकी हूँ। इस पाप से निवृत्त होने का कोई प्रायश्चित्त मुझे नहीं दिखायी देता। गलती से ब्रह्महत्या
होने पर, उस पाप में समूल डूब जाता है, और मैं मूर्ख पूर्ण ब्रह्म को ही तीव्र बाणों से घायल कर बैठा। मैं
मूलतया पापी बहेलिया हूँ; उसमें मैंने एक अपरिमित पाप जोड़ लिया। चित्स्वरूप जो कृष्ण परमात्मा है, उसे भी
मैंने दुःख दिया। इस पश्चात्ताप से वह इतना अधिक व्याकुल हो उठा कि उसने दौड़कर कृष्ण को साष्टांग
दण्डवत किया और उसके चरण मस्तक से लगा लिये। दैत्यों का अभिमान दूर करने वाले, मधु दैत्य का नाश
करने वाले मधुसूदन के पैर कस कर पकड़कर वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने उनके पैर कस कर पकड़
लिये, उसे उठाने का प्रयत्न करने पर भी वह नहीं उठा; और कृपादृष्टि से मुझे क्षमा करें, संसार में दयालु केवल
तुम हो, इस प्रकार विनती करने लगा।
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन।
क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमश्लोक मेऽघ ॥ ३५ ॥
अत्यन्त भयभीत हुआ वह जरा बहेलिया बोला, मैं अत्यन्त दुष्ट पापात्मा हूँ, यह अपराध मुझसे अनजाने में
हुआ। मेरे हाथ से ईश्वर लिंग भंग हुआ। जो ईश्वर प्रतिमा का उच्छेद करता है, वह मूर्तिभंग करने वाला
महापापी है। दुर्भाग्य से तुझ ईश्वर को मुझ दुष्ट ने बाण से मारा। ऐसा मैं पापकर्ता महापापी हूँ। मेरे पाप जैसा
अन्य कोई उदाहरण नहीं है। अतः हे पुरुषोत्तम! हे कृपालु! मेरा अपराध क्षमा करें। त्रिभुवन में तुम ही सच्चे
कृपालु हो। तुमने परीक्षित का गर्भ में संरक्षण किया और हे कृपामूर्ति! गजेन्द्र के आतंक के समय तुम ही रक्षार्थ
कूद पड़े थे। जब पाण्डव लाक्षागृह में थे, उस समय विवर के द्वार से तुमने ही उन्हें बाहर निकाला। अन्त में
अर्जुन का पक्ष लेकर तुमने ही भीष्म से युद्ध किया। द्रौपदी के असाध्य संकट में तुमने ही दौड़कर उसे तिल भर
भी नग्न नहीं दीखने दिया। उसकी पहनने वाली साड़ी तुम बने। तुम्हारी कृपालुता की कहानियाँ वेद और पुराण
भी वर्णन करते हैं। बड़े-बड़े सिद्ध महर्षि उत्तम श्लोक में तुम्हारी कीर्ति का गायन करते हैं। अनजाने में मैंने
दुष्कर्म किया, उसके लिये मुझे क्षमा करें। हे पुरुषोत्तम ! तुम परमात्मा होने के साथ ही कृपालु और क्षमाशील
हो। अजामिल दुराचारी था। उसने केवल तुम्हारे नाम का उच्चार किया, तभी उसका पाप भस्म हो गया। निष्पाप
करने के सम्बन्ध में तुम्हारे नाम का इतना अधिक महत्त्व है। दुर्बुद्धि लोग नाम से ही निष्पाप हो जाते हैं।
पितृघाती भी नाम से निष्पाप होते हैं; दुराचारी भी नाम से तर जाते हैं। तुम्हारे नाम की इतनी अधिक ख्याति है।
यस्यानुस्मरणं नृणामज्ञानध्वान्तनाशनम्।
वदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृतं प्रभो ॥ ३६ ॥
जिस विष्णु का नामस्मरण कोटि-कोटि जन्मों का अज्ञान नष्ट कर सभी प्रकार का कल्याण करता है, इतनी
जिसके नामस्मरण की योग्यता है, उसके शरीर को मैंने अपने हाथ से निर्वाण बाण से विद्ध किया। यह पूर्णरूप
से मेरा अपराध है। साधु-सज्जन जिसके महात्म्य का निरन्तर वर्णन करते हैं, जो स्वरूप से सच्चिद्धन है, ऐसा
वह श्रीकृष्ण सारे जगत का स्वामी है। श्रीकृष्ण का अर्थ है संसार का जीवन, ऐसे कृष्ण को भी मैंने निर्वाण बाण
से घायल किया। मेरा यह बहुत बड़ा अपराध है। कृष्ण तो पूरे त्रैलोक्य का समर्थ राजा है, मेरे हाथ से यह
राजघात हुआ। उसी प्रकार श्रीकृष्ण संसार का होने के कारण मैंने आत्मघात भी किया। श्रीकृष्ण संसार का पिता
है, अतः मैंने पितृघात भी किया। संसार का प्रतिपालन करने के कारण श्रीकृष्ण इस संसार की माँ है, अर्थात् मैंने