श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसवाँ अध्याय ८१३
निवृत्ति होती थी, उस सभा में बैठे वीर अचानक ही 'मारो-मारो' कहकर चिल्लाने लगे। उनका यह भाषण
सुनकर बड़े-बड़े वीरों को झटका लगा। सभा के सारे यादववीर चिंतित हो उठे। यादव सभा में बैठे थे और
उनकी छायाएँ मस्तकविहीन दिखायी दे रही थीं। इस प्रकार 'सुधर्मा' सभा में संकट आ गया। ऐसे दुःख सूचित
करने वाले संकट देखकर यादव उन विघ्नों का विचार करने लगे। द्वारका के विघ्न दूर करने के लिए सुदर्शन की
योजना है, ऐसी स्थिति में द्वारका में विघ्न उत्पन्न होने का क्या कारण है? पलक झपकती है, इस बीच सुदर्शन
२१ बार द्वारका के चारों ओर घूमता है, तिस पर भी द्वारका पर विघ्न आया देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये।
सारे विघ्नों को आकर्षित करता है, इसलिये उसे 'कृष्ण' कहते हैं। वह कृष्ण यहाँ होते हुए ऐसे भीषण उत्पात
क्यों हो रहे हैं? इन विचारों से चिंतांतुर हुए यादवों को श्रीकृष्ण क्या उपाय बताते हैं, सुनें।
एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतवः।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवाः ॥५॥
जो इस संसार का सूत्रधार है, मायायंत्र का चालक है, वह श्रीकृष्ण यादवों के साथ विघ्नों के सम्बन्ध में
विचार करने लगा। यादवकुल का अन्त निकट आ गया यह श्रीकृष्ण को मालूम हो गया, लेकिन उनका विनाश
द्वारका में न हो इसलिये उसने उन्हें प्रभास भेज दिया। कारण यह था कि द्वारका सातवीं मोक्षपुरी होने के कारण
वहाँ की मृत्यु मोक्षदायी होती है; किन्तु सारे यादव 'अधिकारिक' कोटि के थे। उन्हें इतने में मोक्ष न प्राप्त हो
इसलिये श्रीकृष्ण ने उन्हें द्वारका से बाहर किया। कुल नाश का मूल जो पटेर था वह प्रभास में उत्पन्न हुआ था।
उसमें भी कृष्ण का उद्देश्य था इसलिये उसने उन्हें प्रभास भेज दिया। यादवों को भयानक ब्रह्मशाप लगा था
इसीलिये द्वारका में उत्पातरूप में संकट उत्पन्न हुए। अनेक प्रकार के होने वाले वे उत्पात अनर्थ के सूचक हैं,
अतः यदि अब विलम्ब करेंगे तो बहुत बड़े संकट में फँस जाएंगे इसलिये आप लोग यहाँ दो घड़ी के लिये भी न
रहें। बच्चे, स्त्रियाँ, इष्ट मित्र आदि को लेकर शीघ्र यहाँ से निकल जाइये। 'हम यादववीर अत्यन्त बलशाली हैं,
संकट हमारा क्या कर लेंगे?' ऐसा कहेंगे तो उस गर्व का अनिष्ट परिणाम भोगना पड़ेगा ब्राह्मण के शाप के आगे
आपका शौर्य क्या करेगा? इसलिये आगा-पीछा सोचे बिना तत्काल निकल जाइये। आज द्वारका में कोई पानी भी
न पिये, स्त्रियाँ-बच्चे, नाते-रिश्तेदार आदि सब सपरिवार निकल जायें। हमारे कुल को ब्रह्मशाप लगा है, इसलिये
द्वारका पर संकट आया है। कुल के इस पाप को धोने के लिये प्रभास यही पुण्य क्षेत्र है।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च शङ्खोद्धारं व्रजन्वितः।
वयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक्तसरस्वती ॥६॥
शंखोद्धार तीर्थ रहने के लिये अत्यन्त सुरक्षित है, वहाँ स्त्रियों, बच्चों को तथा वृद्धजनों को रखें; और शेष
सारे यादववीरों को तत्काल प्रभास क्षेत्र के लिये कूच करना चाहिये। वहाँ सरस्वती पश्चिमवाहिनी हो गयी है
और समुद्र से मिल गयी है, वहाँ जाकर सब लोग शास्त्रोक्त तीर्थविधि करें।
तत्राभिषिच्य शुचय उपोष्य सुसमाहिताः।
देवताः पूजयिष्यामः स्नपनालेपनार्हणैः ॥७॥
वहाँ वेदोक्त विधि के अनुसार स्नान करें, तीर्थविधि के अनुसार निराहार व्रत करें। सभी लोग सद्भाव से
शुचिर्भूत होकर, शापमुक्त होने के लिये तीर्थ देवताओं का विधिपूर्वक पूजन करें। स्नान, वस्त्र, अलंकार, चंदनादि
पूजा साहित्य अर्पित कर षोडशोपचार से श्रद्धापूर्वक हरिहर का पूजन करें।