श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 832, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें८१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादयः सहस्रजिच्छतजिद्भानुमुख्याः।
अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिता जघ्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भृशम् ॥१७॥
यादवकुल के महाबली निशठ, उल्मुकादिक, तथा शतजित्, सहस्रजित्, भानुप्रभृति आदि युद्ध में क्रोध में
उबल रहे थे। मद्यपान के कारण गर्व से फूले हुए तथा कृष्ण की माया से मोहित वे यादव अपने सुहृद
सम्बन्धियों का विनाश करने लगे। ब्रह्मशाप का प्रहार कितना प्रखर होता है। भाई ही भाई को जान से मारने
लगा। कृष्ण की माया से भ्रमित होकर उन्होंने जाति में ही युद्ध प्रारम्भ कर दिया।
दाशार्हवृष्ण्यन्धकभोजसात्वता मध्यर्बुदा माथुरशूरसेनाः।
विसर्जर्नाः कुकुराः कुन्तयश्च मिथस्ततस्तेऽथ विसृज्य सौहृदम् ॥१८॥
यादवों की प्रमुख जाति तो एक ही थी किन्तु उनमें बड़े बारह भेद थे। वे बारहों जातियाँ युद्ध में सम्मिलित
हो गयीं। हे परीक्षित् ! उनके नाम सुनो। दाशार्ह, सात्वत, अंधक, अर्बुद, माथुर, शूरसेन, कुंती, कुकुर, विसर्जन,
मधुद्व भोग और वृष्णव ये बारह जातियाँ थीं। पहले यादवों की ऐसी प्रतिज्ञा थी कि यदि वे किसी दूसरे से अपनी
जाति के बारे में अच्छा या बुरा सुनते तो अपने प्राण तक दे देते थे और अपनी जाति का संरक्षण करते थे। लेकिन
इस समय वे ही यादव आत्मीयता को भूलकर, जिनके चरणों पर मस्तक रखना चाहिये उनके भी प्राण लेने के
लिये उद्यत हो गये थे।
पुत्रा अयुध्यन् पितृभिर्भ्रातृभिश्च स्वस्त्रीयदौहित्रपितृव्यमातुलैः।
मित्राणि मित्रैः सुहृद्द्रार्तींस्त्वहञ्ज्ञातय एव मूढाः ॥१९॥
उनका चित्त कृष्ण की माया ने हर लिया था, जिससे वे नितांत बेसुध हो गये थे। उनमें अपने और पराये
का अन्तर समाप्त हो गया था। रण में वे इतने अधिक उन्मत्त हो गये थे। भक्तिभाव से जिनके चरणों का तीर्थ
लेना चाहिये, ऐसे अपने पिता के मस्तक पर प्रहार करने के लिये भी पुत्र तत्पर हो गये थे। जहाँ अपने भाई को
युद्ध में संकट से बचाने के लिये उसका भाई दौड़कर युद्ध में जाता था, वही भाई इस युद्ध में प्रखर बाणों से
एक-दूसरे को पीड़ा पहुँचाने लगे। जिन्होंने बड़े लाड़-प्यार से अपने शरीर पर खेलाया वह चाचा पिता की तरह
है, लेकिन उसके ही गर्दन पर तलवार रखकर भतीजा उसका प्राण लेने चल पड़ा। लड़की का पुत्र जो नाती है
और जिसे मातामह का श्राद्ध करने का अधिकार है वह नाना पर निर्दयता से प्रहार कर उसके प्राण लेने लगा।
मामा और भांजा परस्पर मारपीट करने लगे और प्रिय मित्र भी तेज शस्त्रों से एक-दूसरे के प्राण लेने लगे। मित्रों
की मैत्री में वे एक-दूसरे पर प्राण देने में भी नहीं हिचकिचाते; लेकिन वही मित्र अब दाँत-होंठ चबाकर प्राण
लेने के लिये उद्यत हो गये। उनका आयुष्य समाप्त हो गया था, इसलिये कालसर्प का विष चढ़ गया। सभी मूर्ख
बनकर स्वजाति का वध करने लगे।
शरेषु क्षीयमाणेषु भज्यमानेषु धन्वसु।
शस्त्रेषु क्षीयमाणेषु मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः ॥२०॥
घनघोर युद्ध हुआ; भाते में के बाण भी समाप्त हो गये। फिर वे धनुष्य के डंडे से ही एक-दूसरे को मारने
लगे। जोर-जोर से प्रहार करने के कारण उनके धनुष भी टूट गये और उनके टुकड़े-टुकड़े हो गये। सारे शस्त्र
समाप्त हो जाने के बाद शस्त्रों का युद्ध समाप्त हो गया। तब ब्रह्मशाप से उपजा हुआ पटेर मुट्ठी में भरकर वे
उससे एक-दूसरे को मारने लगे।